Tuesday, June 18, 2013

केदारनाथ के पहलू !

केदारनाथ के पहलू !
मानव की इच्छाओं का अम्बार बहुत अधिक है और जरूरतों की संख्या असीमित ! केदारनाथ में  इतने लोगो की मौत भी वहां जाने वाले की संख्या कम नहीं कर पायेगी | जाते रहेंगे लोग वहां कुछ न कुछ मांगने | मांगते रहो ,मांगते रहो, और जब मिल जाये तो बदले मैं भगवान से जो  देना तय किया था वो दे दो , समाज मैं लेन देन  करते करते हमें विश्वाश हो चला है कि भगवान  भी कोई लेन देन  करने वाला ही है जहाँ जितना ज्यादा देंगे  उतना ज्यादा मिलेगा | भारत देश का छात्र भी भगवान से इतना भ्रष्टाचार करने में कुछ असहज महसूस नही करता कि  , जब परीक्षा की तय्यारी  पूरी मेहनत से न की हो और फिर भी अच्छा  परिणाम चाहिए तो भगवान ५ रुपये के प्रसाद और ५ मंगलवार की हाजरी के बदले अच्छा परिणाम दिला सकते है | यही प्रसाद  देना  और जी हजूरी अगर शिक्षक के साथ की जाती तो भ्रष्टाचार और भगवान के साथ की गयी तो भक्ति | क्या भगवान ऐसा है , भ्रष्ट  अद्ध्यापक जैसा जो मिठाई के डिब्बे के बदले किसी भी छात्र को पास करवा  दे ?
समाज के बड़े लोगो द्वारा सिर्फ उनके जानने-मानने वाले  लोगो की मदद किये जाते देख   हमें ये भी लगने लगा है की ,भगवान भी पक्षपाती  ही होगा  ,मतलब कि  जो लोग  भगवान  के दरबार मैं माथा टेकने जायेंगे उन पर भगवान की अलग से  कृपा होगी,  और  भगवान  के दरबार में माथा नहीं टेकने वाले व्यक्ति को अपनी इमानदार मेहनत का उचित फल दिलवाने  में भी भगवान कोई विशेष सहयोग नहीं करेंगे |   क्या भगवान ऐसा है, यू पी के किसी  नेता जी जैसा , सिर्फ अपने वोट बैंक की चिंता करने वाला  ?
मांगते रहो मागते रहो और जब जो माँगा था वो न मिले तब ,  तब क्या करें ? मान लो तुम्हारी भक्ति में कमी थी और भगवान पर कोई सवाल खड़ा न करो , मत पूछो की भगवान हैं भी या नहीं क्यूंकि भगवान नाराज हो सकते हैं , कुछ गलत न कहो कुछ  गलत न करो , भगवान से डरो , भगवान से डरो| , ...समाज में उच्च पदों पर आसीन लोगो के व्यवहार को देख कर हम ये भी सीख गये  हैं की भगवान कोई डराने वाला ही होगा  , जिसे  खुश रखने के लिए हमेशा प्रयासरत रहना  चाहिए, जैसे भगवान भी बदला लेता हो, भगवान भी लोगो को डराने और सजा देने में आनंद  पाता हो | क्या भगवान ऐसा  है सरकारी  संश्था के निदेशक जैसा ,सबको डराकर  अपनी इज्जत करवाने  वाला ?
किसकी लाशें हैं जो बिछी है केदारनाथ के मंदिर मैं, भगवान से मिलने आये प्रेमियों की या इच्छाओं और सांसारिक मांग से भरे भिखारिओं की | कहां पड़ी हैं ये लाशें किसी निरंकार अनदेखे  अप्रत्यक्ष असीमित बल और आनंद देने  वाले परमात्मा के दरबार में , या महज़ ईट पत्थर की चारदीवारी मे ! अगर मरने वाले भगवान के प्रेमी थे और  प्रेमी के रूप में ही  मिलने आये थे, पर  भगवान के स्थान पर म्रत्यु  मिली तो भी कोई शिकायत न करेंगे क्यूंकि प्रेम तो हिसाब किताब रखता ही नहीं , बस देता ही चला जाता है , जाओ दे दी जान अपने प्रेमी के लिए ,अगर  प्रेमी कहीं है तो उनका  जीवन स्वीकार करे और प्रेमी कहीं है ही नहीं तो सारा जीवन ही व्यर्थ है किसके लिए जियें ? 
हाँ अगर मरने वाले ख्वाइशों का कटोरा लेकर भगवान से कुछ बहुत मांगने  आये थे, तब मांगने आये थे सांसारिक चीज़ और मिली मौत तो बड़ी कठिनाई हो गयी, अब भगवान हो भी तो वो सांसारिक चीज़े किसे देगा ? जिस शरीर से सांसारिक चीजों को भोगते वो तो अब रहा ही नहीं |, और भगवान नहीं है और वो सिर्फ साधारण चारदीवारी के बीच कुछ मांगते मांगते मर गए तो भी तो वो ही गलत रहे , इतनी उर्जा मांगने  के स्थान पर इच्छित वस्तु को अर्जित करने में लगाते तो अच्छा होता |
पर  कठिन सवाल ये हैं  की  क्या मरने वाले भगवान के दरबार में भगवान की मौजूदगी मैं भगवान के द्वारा ही मारे  गए? क्या उनके मरने में भगवान का हाथ है?  नहीं भी है तो भगवान ने अपने दरबार में  ऐसा होने ही कैसे दिया ?क्य्यों  उसने अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर उन लोगो को बचाया नहीं ?, क्य्यों सबके  सामने अपनी महानता सिद्ध करने का एक अवसर जाने दिया और लोगो को मरने दिया?... इन सब सवालो का  एक ही जवाब है अभी हमारे पास    पता नहीं

Sunday, June 16, 2013

कार्य और सरकारी संस्था


सरकारी संस्था में आज भी रोजाना कर्मचारी  अपनी आधी से अधिक  उर्जा सिर्फ ये समझाने में खर्च कर देते है कि जो काम उन्हें कहा जा रहा है वो असल में उनका नहीं है ! किसी भी नए काम की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेना अपने पैर  पर कुल्हाड़ी मारने के सामान समझा जाता है , क्यूंकि आप एक बार जोश में किसी नए  काम को करेंगे और अगली बार आपके ही  सभी साथी चिल्ला चिल्ला कर कहेंगे कि ये आपका  ही काम है | इस तरह आपके द्वारा कभी संस्था की भलाई या किसी की मदद के लिए किया गया कोई भी  नया कार्य  आपकी हमेशा की  मजदूरी  बन सकता है |
मेहनत और ईमानदारी से किये गए काम से न  तो पदोन्नति का कोई सम्बन्ध होता है और न ही वेतन में वृद्धि का | बने रहो पगला ,काम करेगा अगला की नीति का अनुशरण करने वाले भी वेतन और पदोन्नति के बराबर  अधिकारी होते हैं  साथ ही  उन्हें अपना स्थानान्तरण करवाने  में भी कोई बेवजह की  कठिनाई नहीं होती | 
ये भी मजाक ही है की पूरी लगन और ईमानदारी से संस्था  के लिए १० साल से भी ज्यादा तक कार्य करने के बाद पदोन्नति मांगने पर संस्था आपसे एक ऐसी  परीक्षा पास करने को कहती है की जिसका आपके द्वारा संस्था  के लिए १० साल तक  किये गए  कार्य से कोई सम्बन्ध नहीं होता, वो परीक्षा काम न करने वाले व्यक्ति के लिए अधिक सुगम हो जाती है क्यूंकि वह अपना सारा मस्तिष्क और समय सिर्फ उस परीक्षा की तय्यारी में ही लागाता  है | 
अधिकतर मैनेजर शभ्य और शालीन होते है, कुछ मैनेजर मेहनती भी होते है पर लगभग सभी  सरकारी मैनेजरों  के पास इतनी ही संभावनाएं होती हैं  कि  वो  सिर्फ उन्ही कर्मचारिओं से ही  काम ले सकते है कि  जो अपने आप से ही काम करते हों | काम करने का इनाम सिर्फ काम और काम न करने की सजा  सिर्फ आराम मिलती हैं |
कर्मचारी खुद से सोचे तो सोच ले पर संस्था कभी नहीं सोचती की कर्मचारी द्वारा लिए गए वेतन और उसके द्वारा किये गए कार्य  की कोई तुलना भी है या नहीं, मसलन इंजीनियर का वेतन लेने वाले बहुत से कर्मचारी  सिर्फ माइक्रोसॉफ्ट वर्ल्ड ,माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल पर पत्र और रिपोर्ट्स टाइप करने का कार्य ही करते है जो की आजकल के  १२वीं दर्जे के छात्र भी आसानी से कर सकते हैं | मजाक यह भी है की माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस को यहाँ ऐसा टेक्निकल कार्य समझा जाता है की जिसके लिए एक इंजिनियर की आवश्यकता होगी ही |
समय पर आना नियम तो  हो गया है और जरूरी भी पर ऐसे लोगो की कमी नहीं है की जो मानते है की सिर्फ समय पर आने और समय पर जाने मात्र से ही  वो नैतिक रूप से अपना पूरा वेतन पाने के अधिकारी हो जाते हैं! ये बहुत आम बात है की ठीक सुबह १०:१५ पर ही लोग सारे काम छोड़ कर लोग ये चर्चा करते पाए जाते हैं की हमारी संस्था फायदे में कैसे आये | कुल मिला कर ज्यादातर कर्मचारी दो तरह के कार्य ही करते हैं एक वो जो सिर्फ सुबह ऑफिस आकर शाम को समय से चले जाने का कार्य करते हैं और दुसरे वो जो ईटें उठाकर रखने जैसा कार्य करते है , कुछ इनोवेटिव, प्रोडक्टिव, फ्रूटफुल कार्य करने वाले  कर्मचारी न के बराबर होते है |
गम ये है कि बहुत उच्च पदों पर बैठे लोग कभी जान ही नहीं पाते  की क्या सही है और क्या गलत क्यूंकि उन्होंने अपने आस पास रहने वालो को अपनी  बात काटने की कोई इज़ाज़त नहीं दी होती ,चाटुकारिता में ही सारा जीवन जीने वाले  उनके नीचे कार्यरत व्यक्ति हमेशा उनके हर कथन से सहमती ही जताते हैं , न खाता न बही जो साहब कहें वही सही |
अलग अलग दर्जे की अलग अलग यूनियन भी  होती हैं | जिनका मूल उद्धेश्य होता हे की किस तरह हमें कम से कम काम करना पड़े और साहब हमारी  किसी भी गलती पर हम से कुछ न कह सकें  तथा  किस तरह हम अधिक से अधिक धन और आराम  संस्था से ले सके | संस्था की भलाई के लिए किसी भी यूनियन द्वारा किया गया कोई भी संघर्ष देखने का अवसर मुझे प्राप्त नहीं हुआ क्यूकी यूनियन तो बनती ही संस्था के खिलाफ है |
फिर भी हर संस्था  में हर दर्जे  पर कुछ प्रतिशत ऐसे लोग होते ही हैं , जो सिर्फ काम करने के लिये काम करते हैं ! कर्म जिनके लिए आनंद है और हमेशा निश्वार्थ है , ऐसे व्यक्तियों के की वजह से ही संश्था में गति बनी रहती है |