केदारनाथ के पहलू !
मानव की इच्छाओं का अम्बार बहुत अधिक है और जरूरतों की संख्या असीमित ! केदारनाथ में इतने लोगो की मौत भी वहां जाने वाले की संख्या कम नहीं कर पायेगी | जाते रहेंगे लोग वहां कुछ न कुछ मांगने | मांगते रहो ,मांगते रहो, और जब मिल जाये तो बदले मैं भगवान से जो देना तय किया था वो दे दो , समाज मैं लेन देन करते करते हमें विश्वाश हो चला है कि भगवान भी कोई लेन देन करने वाला ही है जहाँ जितना ज्यादा देंगे उतना ज्यादा मिलेगा | भारत देश का छात्र भी भगवान से इतना भ्रष्टाचार करने में कुछ असहज महसूस नही करता कि , जब परीक्षा की तय्यारी पूरी मेहनत से न की हो और फिर भी अच्छा परिणाम चाहिए तो भगवान ५ रुपये के प्रसाद और ५ मंगलवार की हाजरी के बदले अच्छा परिणाम दिला सकते है | यही प्रसाद देना और जी हजूरी अगर शिक्षक के साथ की जाती तो भ्रष्टाचार और भगवान के साथ की गयी तो भक्ति | क्या भगवान ऐसा है , भ्रष्ट अद्ध्यापक जैसा जो मिठाई के डिब्बे के बदले किसी भी छात्र को पास करवा दे ?
समाज के बड़े लोगो द्वारा सिर्फ उनके जानने-मानने वाले लोगो की मदद किये जाते देख हमें ये भी लगने लगा है की ,भगवान भी पक्षपाती ही होगा ,मतलब कि जो लोग भगवान के दरबार मैं माथा टेकने जायेंगे उन पर भगवान की अलग से कृपा होगी, और भगवान के दरबार में माथा नहीं टेकने वाले व्यक्ति को अपनी इमानदार मेहनत का उचित फल दिलवाने में भी भगवान कोई विशेष सहयोग नहीं करेंगे | क्या भगवान ऐसा है, यू पी के किसी नेता जी जैसा , सिर्फ अपने वोट बैंक की चिंता करने वाला ?
मांगते रहो मागते रहो और जब जो माँगा था वो न मिले तब , तब क्या करें ? मान लो तुम्हारी भक्ति में कमी थी और भगवान पर कोई सवाल खड़ा न करो , मत पूछो की भगवान हैं भी या नहीं क्यूंकि भगवान नाराज हो सकते हैं , कुछ गलत न कहो कुछ गलत न करो , भगवान से डरो , भगवान से डरो| , ...समाज में उच्च पदों पर आसीन लोगो के व्यवहार को देख कर हम ये भी सीख गये हैं की भगवान कोई डराने वाला ही होगा , जिसे खुश रखने के लिए हमेशा प्रयासरत रहना चाहिए, जैसे भगवान भी बदला लेता हो, भगवान भी लोगो को डराने और सजा देने में आनंद पाता हो | क्या भगवान ऐसा है सरकारी संश्था के निदेशक जैसा ,सबको डराकर अपनी इज्जत करवाने वाला ?
किसकी लाशें हैं जो बिछी है केदारनाथ के मंदिर मैं, भगवान से मिलने आये प्रेमियों की या इच्छाओं और सांसारिक मांग से भरे भिखारिओं की | कहां पड़ी हैं ये लाशें किसी निरंकार अनदेखे अप्रत्यक्ष असीमित बल और आनंद देने वाले परमात्मा के दरबार में , या महज़ ईट पत्थर की चारदीवारी मे ! अगर मरने वाले भगवान के प्रेमी थे और प्रेमी के रूप में ही मिलने आये थे, पर भगवान के स्थान पर म्रत्यु मिली तो भी कोई शिकायत न करेंगे क्यूंकि प्रेम तो हिसाब किताब रखता ही नहीं , बस देता ही चला जाता है , जाओ दे दी जान अपने प्रेमी के लिए ,अगर प्रेमी कहीं है तो उनका जीवन स्वीकार करे और प्रेमी कहीं है ही नहीं तो सारा जीवन ही व्यर्थ है किसके लिए जियें ?
हाँ अगर मरने वाले ख्वाइशों का कटोरा लेकर भगवान से कुछ बहुत मांगने आये थे, तब मांगने आये थे सांसारिक चीज़ और मिली मौत तो बड़ी कठिनाई हो गयी, अब भगवान हो भी तो वो सांसारिक चीज़े किसे देगा ? जिस शरीर से सांसारिक चीजों को भोगते वो तो अब रहा ही नहीं |, और भगवान नहीं है और वो सिर्फ साधारण चारदीवारी के बीच कुछ मांगते मांगते मर गए तो भी तो वो ही गलत रहे , इतनी उर्जा मांगने के स्थान पर इच्छित वस्तु को अर्जित करने में लगाते तो अच्छा होता |
पर कठिन सवाल ये हैं की क्या मरने वाले भगवान के दरबार में भगवान की मौजूदगी मैं भगवान के द्वारा ही मारे गए? क्या उनके मरने में भगवान का हाथ है? नहीं भी है तो भगवान ने अपने दरबार में ऐसा होने ही कैसे दिया ?क्य्यों उसने अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर उन लोगो को बचाया नहीं ?, क्य्यों सबके सामने अपनी महानता सिद्ध करने का एक अवसर जाने दिया और लोगो को मरने दिया?... इन सब सवालो का एक ही जवाब है अभी हमारे पास “पता नहीं”