Thursday, October 2, 2014

भारतीय समाज और सफाईवाला



सफाई की बात दो घटनाओ से शुरू करना चाहूंगा :
हमारे पड़ोस में एक छोटा  बच्चा अपने नाना के घर घुमने आया हुआ था, उसकी उम्र कुछ पांच या छः साल रही होगी  | एक दिन अपने नाना के साथ हमारे घर भी आया | एक घंटे खेल कूद करता रहा जैसे सभी बच्चे करते ही  हैं फिर मुझे भी बच्चो के साथ बच्चा हो जाना अच्छा  लगता है ! खेलते खेलते ही बातों बातों में बच्चा मुझसे पूछ बैठा की भैया आप क्या करते हैं ? मैंने भी बच्चो की तरह मोहब्बत  से जवाब दिया की यार मैं रोड साफ़ करता हूँ ... बच्चे ने पुछा क्या सही में आप रोड साफ़ करने वाले हो ? मैंने फिर कहा की हाँ मेरा यही काम है रोड साफ़ करना !  इसके बाद वो छः साल का बच्चा जो अभी मासूमियत से भरा है जिसकी अपनी खुद की  समझ अभी पैदा ही नहीं हुई है ,उसे उसके आस पास के समाज ने जो कुछ भी सिखाया है उसने वो ही पूरे विश्वाश के साथ ग्रहण कर लिया है , वो मासूम बच्चा धीमी आवाज में मुझसे कहता है की ..रोड साफ़ करने वाले तो गंदे लोग होते हैं!  अब क्यूंकि वो बच्चा है कुछ छुपाना अभी उसने सीखा नहीं होगा, जैसा दिल में आता है वैसा जुबान पर कह देता है ,शायद इसीलिये इस बात को इतने विश्वाश से और बिना डरे बिना किसे हिचक के कह गया पर उसके इस ज्ञान को सुन मुझे हैरानी  होना स्वाभाविक ही था ! मैंने बच्चे से  पुछा  की किसने सिखया तुम्हे ये की रोड साफ़ करने वाले गंदे लोग होते हैं ? इसका बच्चे के पास कोई साफ़ साफ़ उत्तर नहीं था ..निश्चित ही उसे किसी एक व्यक्ति विशेष  ने ये नहीं सिखाया की  जिसका नाम वो ले सके |सारे समाज की व्यवस्था ने उसे ये सिखाया है | उसने ये किसी व्यक्ति विशेष से  सुनकर नहीं  बल्कि अपने चारो और देखकर सीखा होगा !
दूसरी घटना एक किराना  की दुकान की है ,घर के पास एक दुकान पर मैं कुछ जरूरत की चीज़े लेने गया ,दुकान पर कहा की एक किलो चीनी , एक चाय पत्ती और एक झाडू दे दो , दुकान के बाल मजदूर सेवक ने तुरन तीनो चीज़े मुझे ला दी और मैंने तीने चीज़े दुकान के काउंटर पर रख दुकानदार से कहा की भाई साहब कितने रूपए हुए इस सब के ? दुकानदार मेरे द्वारा काउंटर पर  रखी  नयी झाड़ू देख उलझन में आ गया और तुरन्त  कहा की हटाओ इसे काउंटर से ,पीछे रखो ! जैसे झाड़ू कोई ऐसी चीज़ हो जिससे उसके काउंटर का सम्मान गड़बड़ा जाता हो ! जैसे झाडू जो सबकुछ साफ़ करती है वो अगर काउंटर पर रखी गयी तो काउंटर के सम्मान में कमी कर देगी  !
बच्चा सही कह रहा है .हम ऐसे समाज में जी रहे हैं की जहाँ सफाई करने वाले का कोई सम्मान नहीं है ..सफाई करने वालो को  छोटे दर्जे का नागरिक ही समझा जाता है .... जब गली की नाली साफ़ करने वाला गली के किसी घर को खटकटा  कर ठंडा पानी मांगता है तो लोग सोच में पढ़  जाते हैं की उसे किस गिलास में पानी दें ? उस बच्चे ने कभी भी जब किसी रोड या नाली साफ़ करने वाले को अपने टीचर या घर वालो से बात करते देखा होगा तब उनके बात करने के लहजे ने ही  समझा दिया होगा , की जिस व्यक्ति से बात हो रही है वो कितने सम्मान या अपमान के काबिल है !  कईं  बार  लगता है की भारत की वर्ण व्यवस्था जो की शायद  कभी किसी भले के लिए रही हो हो पर  अंत में अभिशाप ही साबित हुई ..वर्ण व्यवस्था ने भारतीयों को उनका सम्मान  करना सिखाया जिनके पास  सत्ता है , जिनके पार व्यापार है  और रुपया है , जिनके पास ज्ञान है.!...... पर जिनके पास समाज की गंदगी साफ़ करने का काम है उनका सम्मान  करना भारतीय समाज ने कभी सीखा ही नहीं ! अभिशाप ही रही है ये वर्ण व्यवश्था की जिस शुद्र वर्ग को सफाई और सेवा का सबसे जरूरी काम दिया गया ,उस वर्ग को ही सम्मान नहीं दिया गया! आज वर्ण व्यवश्था तो टूट चुकी है ,पर फिर भी हम ऐसा समाज नहीं बन पाए की हमारे घर के सामने की नाली साफ़ करने वाले व्यक्ति को घर के अन्दर  सम्मान से बैठा चाय पिला सकें ! चाय बन तो जायेगी ,पर डिस्पोजल में बाहर  पेड़ के नीचे ही चाय पिएगा अभी वो !

निश्चित ही हम अगर दूसरे  सफाई करने वालो को सम्मान देना सीख पाएं  तभी तो खुद बाहर  निकलकर गली और शहर की सफाई खुद से कर पायेंगे ! जिसको  हम खुद ही ईमानदारी से इज्ज़त नहीं दे सकते ,वो हम खुद कैसे हो  पायेंगे ?

 सफाई अभियान की सफलता इसी बात पर निर्भर करती है की जो असल में सफाई कर रहे हैं उन्हें हम कैसी नज़र से देखते हैं ?