खूबसूरत भजन संध्या
कल शाम घर के पास के मैदान में शहर के कुछ व्यापारियो द्वारा श्याम भजन संध्या का आयोजन किया गया | भजन संध्या में देश के एक जानेमाने भजन गायक आमंत्रित थे ,जिस गायक को कई बार टीवी पर देख चुका था और जीवन की कुछ सुबहों का आगाज़ जिसके भजनों को सुनकर किया था उन्हें अपने सामने देखने की जिज्ञासा जागी और एक मित्र के साथ मैं भी भजन संध्या का आनंद लेने पंहुचा |
हमारे पहुचने तक आम्न्त्रित गायक ने स्थान नहीं लिया था और एक स्थानीय गायक पंजाबी भजन गा रहे थे कि “मैनू लागी श्याम दी लगन, मैं दुनिया तो की लेंणा.......
शायद ये दुनिया श्याम की नहीं रही होगी या श्याम इस दुनिया में कहीं नहीं रहे होंगे कि श्याम को रखा और दुनिया को ख़ारिज कर दिया !
हम भी भजन संध्या या मंदिरों में क्यूं जाते होंगे ?शायद हमे दुनिया की कुछ चीजों से इतना ज्यादा लगाव है की उनको पाने या नहीं खोने देने की तय्यारी में हम कोई कमी नहीं छोडना चाहते.....पर हमने बड़ी से बड़ी तय्यारी विफल होती देखी है जब ऊपर वाले की ,अनदेखी ,अनजानी और अनसमझी शक्ति की मर्जी न हो , शायद तय्यारी के इस अनजानी शक्ति वाले हिस्से को पूरा करने या कहें की ऊपर वाले को अपने पाले में रखने के लिए हम भी मंदिरों की सीडी चढ़ रहे हैं.... या फिर इसलिए भी कि अगर इस संसारी दुनिया में बहुत ज्यादा कुछ पा ना पाए ,कुछ बड़ा और साहसिक करने की हिम्मत अब नहीं रही तो चलो भगवान वाले क्षेत्र में कुछ करके दिखाते हैं ,संसार में न सही तो अध्यात्म में तो आगे रहें हम ...
वैसे गीता में भगवान के अनुसार इंसान अगर सिर्फ अपने-पराये ,नफा-नुकसान, जीत-हार के मोह से आजाद हो जाये तो सारा जीवन ही आनंद है कही जाने या वेद शाश्त्रों की जरूरत ही नहीं !
कुछ ऐसे ही नकारात्मक से बेवजह सवाल दिमाग में चक्कर काट रहे थे और सामने एक बड़ी सी टीवी स्क्रीन पर मुख्य आमंत्रित गायक एक मधुर भजन सुना रहे थे| क्यूंकि वी आई पी जिनकी संख्या वहां आम आदमी की संख्या से ज्यादा थी ,उनके आगे बैठने की व्यवस्था की गयी थी ,पीछे बैठे आम नागरिको की सुविधा के लिए टी वी स्क्रीन का इन्तजाम था|
टी वी स्क्रीन पर दिखने वाले कैमरे को चलाने वाले कैमरामैंन की नज़र एक नाचती लड़की पर पड़ी , कैमरामैंन न कैमरा ज़ूम किया ,कुछ छण के लिए लड़की का चेहरा टी वी स्क्रीन पर दिखा और तुरंत हटा लिया गया |
उस अजनबी के चेहरे में त्वचा की गंभीर बीमारी थी पर नाचने की खुशी भी ..ऐसा लगा जैसे ये सारी सभा और भजन संध्या इसी अजनबी लड़की के लिए ही भगवान द्वारा स्वयं आयोजित हो....
शायद कहीं और, अपने कॉलेज में, अपने मित्रो -रिश्तेदारो द्वारा घरो और होटलों में आयोजित होने वाली विभिन्न पार्टियों में उसके कदम थिरकने में एक उलझन महसूस करते हों ,शायद समाज में रहने वालो की नज़रें उसे सुन्दर और आकर्षक मानने से इनकार कर देती हों ,इस दुनिया में उसके सफ़र के करीबी साथी भी शायद उसे करुणा और दया तो दे पाते हों पर वो सम्मान और मन का स्नेह नहीं जिसकी सभी को जरूरत है |
पर यहाँ भगवान के घर में , भगवान के लिए वो खुलकर नाच सकती है और क्यूं नहीं आखिर जिसने उसे ये रूप दिया है वो तो उसे अपनी अपना मानेगा ही ..आखिर कृति का निर्माता अपनी किसी कृति को नहीं ठुकराता ... यहाँ उसका नाचना ऐसे लोगो के लिए नहीं है जिनके लिए किसी को अपनाने से पहले उसकी खूबसूरती की परीक्षा जरूरी है | यहाँ वो अपना दिल रख सकती है, श्याम के लिए तो राधा और उसमे सिर्फ खूबसूरती की वजह से कोई अंतर न होगा |
वो अपने प्रेमी श्याम के लिए नाचती रहेगी रहेगी और हम अपनी राधाकृष्ण की पत्थर की मूर्तियों को तराश तराश कर और खुबसूरत बनाते रहेंगे !