Tuesday, December 30, 2014

दुःख दूर करने वाला धर्म

हिंदुस्तान के हर शहर की तरह रामपुर के गंज इलाके में भी एक पंडित जी हैं जो दुख दूर करने के लिए ग्रहों के उपचार और टोटके बताते हैं।
पते की बात ये है की उनके पास सभी धर्मो के लोग आते है। जितने हिन्दू आते है उतने ही दुसरे भी।

हिन्दू धर्म में और भी बाते हैं जो दुसरे धर्म के लोग सीख सकते हैं पर वो सिर्फ उन्ही बातो में उत्सुक हैं की जो दुःख दूर करें।
कोई भी धर्म के पास भगवान,शांति या निर्वाण की तलाश में नहीं जाता, असल में सब दुखी हैं या तो दुःख से दुखी है या कुछ पाने के लिए दुखी हैं। वो बस दुःख से छुटकारा चाहते हैं ,वो 'कुछ" पाना चाहते हैं जो सिर्फ उनके अपने करने से नहीं मिलेगा,इसीलए वो उस "कुछ" को पाने की चाह में धर्म की तरफ मुड़ जाते है और उम्मीद करते है की उनसे तो नहीं होगा शायद  धर्म ही उन्हें उनके सुख लाकर दे दे,शायद धर्म में वो दैविक और अद्रश्य शक्ति हो की उनका काम बन जाए....यही सच है की लोग परेशान है और बस अपना काम बनाने की उम्मीद में धर्म के चक्कर लगा रहे हैं। । ऐसे में अगर आमिर खान भी दुःख से निजाद दिला दें तो लोग आमिर खान के पीछे भी चलने लगेंगे,आमिर भी भगवान  कहलाने लगेंगे। 

गरीबो को न बाँट कर दूध शंकर जी को चडाना बहुत शुरुवाती मसला है , सिर्फ शंकर जी को दूध चडाने से ही अगर दुःख दूर हो जाते होते तो भी तो कोई बाबा या कोई मंदिर अरबपति न हो गया होता। बस दूध ही पर बात ख़त्म हो जाती। तब कोई रामपाल या आसाराम जी के पीछे न जाता।

समस्या ये भी है की लोग पडकर या खुद जानकर समझने को राजी नहीं है। बाबा या पंडित करते है पर कोई सही धर्म की किताब दुःख दूर करने का दावा नहीं करती। सभी धर्म यही कहते है की हुकुम रजाई चलना, बिना शिकायत।जीसस सूली पर चड़ने के बाद भी कहते है की  "thy will be done".

Friday, December 26, 2014

एसिड अटैक करने वालो से मन की बात।

एसिड अटैक करने वालो अगर तुमने सही में और पूरा प्यार किया होता तो तुम उसकी हर बात , हर ढंग से प्यार करते,उसकी हाँ से भी प्यार करते ,उसकी न से भी प्यार करते, उसके किसी और को चाहने से भी प्यार करते। तुम्हारा प्यार तो तुमपर निर्भर है न की दुसरे पर,तुम करते थे ये काफी था तुम्हारे जीवन में खुशियाँ भरने के लिए।

पर चलो अगर तुम्हे पूरा प्यार नहीं था। कच्चा पक्का ही था। तुम्हारा प्यार ,अभी ऐसा न था जो सिर्फ दिए चले जाने में ही खुश रहे की जिसे ये ख्याल भी न आये की बदले में कुछ लेना भी है। तुम्हारा प्यार अगर कुछ कच्चा पक्का भी होता जो सिर्फ बदले में कुछ चाहता था तो भी तो उसके न मिलने पर तुम देवदास हो जाते। कही अपना सर्वस्त्र और अपनी जान भी दे देते उसकी याद में। खो देते खुद को ,मिटा देते अपनी हस्ती।

पर चलो तुम्हे कच्चा पक्का भी प्यार न था ,मान लेते हैं की बस अपनी सांसारिक और इगोस्टिक जरूरते पूरी करने के लिए ही कोई चाहिए था , जरूरते पूरी न हुई ,तो तुम पागल होकर गुस्से से भर गए, तो भी तो तुम बस मार ही देते , हद से हद गुस्सा भी था तो भी तो बस मार ही देते उसे।

पर तुमने उसे मारा नहीं, तुमने उसे जिन्दा रखा और रोज रोज हर पल  मरने के लिए छोड़ दिया। एक बार में मरता देख तुम्हारी आग शांत न होती , होती भी कैसे ,हवस और अहम् की जरूरत जितनी बड़ी थी ,आग भी तो उतनी ही बड़ी होगी।

मैं बहुत शर्मिंदा हूँ की तुम मेरे समाज का हिस्सा हो। तुम्हे तो मारकर तुरंत खत्म कर ही देना चाहिए। पर तुम्हे जिस समाज ने जन्म दिया है वो तुम्हारे जैसे औरो को भी जन्म देता रहेगा। यही सोच कर मैं शर्मिंदा भी हूँ और डरा भी हूँ।

Monday, December 1, 2014

विवाह-प्रेम-भारत

सुना  है मैंने की राधा जी  का नाम श्रीमद्भागवत कथा में एक बार आता है और किसी भी दुसरे हिन्दू ग्रन्थ में कहीं नहीं आता ! इसकी वजह भी सुनी की राधा जी कृष्ण के साथ इतनी एक हो गयी थी की अलग से नाम की जरूरत ही नहीं थी ..जब कृष्ण कहा जा रहा हो तो राधा भी उसीमे शामिल हैं ... हम हिन्दू  भी कृष्ण के  साथ राधा को ही पूजते हैं उनकी सोलह हज़ार रानीओ में से किसी को भी नहीं ..... राधा का विवाह कृष्ण से नहीं हुआ और कृष्ण का विवाह राधा से नहीं हुआ .....पर इस प्रेम को हिन्दुओ का विवाह से कहीं अधिक सम्मान है, जिन्होंने इस सरल बात को समझा होगा वो सचमुच खुद भी कितने सरल रहे होंगे ....
पर आज के लोग सरल नहीं हैं .. वो राधा को पूजने को तैयार हैं ..राधा के आगे झोली फ़ैलाने को भी तैयार हैं पर उन्हें तलाश रुकमनी की ही हैं !  कुछ समय से ऐसा लग रहा है की भारत एक शादी प्रधान देश है! यहाँ माता पिता के लिए बच्चो  शादी सबसे महत्वपूर्ण और  समाज में इज्ज़त  से जुडा सबसे महत्वपूर्ण  विषय हो गया है ! मैंने आज तक नहीं सुना की किसी के भाइयो ..या पिता ने ही उसे इसलिए मार डाला की उसने चोरी की ..या डकैती की ..या किसी की हत्या ही कर दी हो ! पर ऐसा बहुत सुना है की किसी के अपने सगे रिश्तेदारों ने ही उसे इसलिए  मार दिया की उसने किसी से प्रेम कर लिया!  आपने कोई भ्रष्टाचार का काम कर दिया है तो कोई बात नहीं आपके घर वाले आपके खिलाफ कोर्ट नहीं जायेंगे , आपने लोगो का शोषण कर रुपया इकठ्ठा किया है तो भी कोई बात नहीं आपका समाज आपके रूपए के लिए  आपको  सलाम ही करेगा ! पर कहीं आपने कोई प्रेम  कर लिया तो जरा सावधान रहे ..सब आपके खिलाफ हो सकते हैं ..राधा के भक्तो के देश में राधा दूंदना या या राधा हो जाना दोनों ही राधा के भक्तो को सिरे से अस्वीकार  है !
शादी प्रधान देश में समाज के हिसाब से शादी करना जरूरी है,  अगर आपको कोई ऐसा मिलता हैं जो आपको खुशी दे जिसके लिए आप राधा की तरह  खुद के अस्तित्व को ख़त्म कर उसीमे शामिल हो जाने को तैयार हों ... पर  वो समाज के बिना किसी मतलब के फर्जी नियमो (जैसे जाती ,रुतबा ) के मानक में सही  नहीं बैठता हो , तो सारा समाज आपके छोड़ देने के लिए तुरंत तैयार हो जाएगा मानो  की परीक्षा ले रहा हो की जाओ आब उसीके रहो ..बाकी समाज से क्या मतलब ?
और अगर आपको अभी कोई ऐसा न मिला हो जीससे आप ऐसा प्रेम कर सके की जिसमे सिर्फ देना ही देना  हो ..मांग कुछ भी  नहीं.. ऐसा प्रेम जो बस देने में खुश है जिसे कुछ लेने का ख्याल भी नहीं  ..जो अपने अस्तित्व को मिटा देने को तैयार  है ...तो भी तथाकथित राधा भक्त समाज यही मानता है की कोई भी दो लोग....जी हाँ कोई भी दो लोग १० दिन साथ रहेंगे तो प्रेम होगा ही !. बड़ी अजीब बात है ये और दिल में सब जानतें की ये पागलपन वाली बात ही होगी की कोई भी दो लोग १० दिन साथ रहेंगे तो प्रेम होगा ही ! पर यही करते आये हैं समाज वाले, की किन्ही भी  दो लोगो को साथ रख दो बस वो  समाज के  बेमतलब और बिना सिर  पैर के नियमो में सही बैठते हो ! इसके खतरनाक  परिणाम भी हुए हैं , जितनी असहजता भारत के परिवारों में है उतनी कही भी नहीं ...यहाँ के  जोड़े आपस में खुद को कभी समझ नहीं पाते , जीवन जीते नहीं बस गुजारते हैं ! अधिकतर घर ऐसे ही हैं की जब तक पुरुष घर के बाहर होता है घर में एक आजादी और चैन महसूस होता है स्त्री खुद को सहज महसूस करती है , और पुरुष के के घर में आते ही असहजता और औपचारिकताये घर को तनाव पूर्ण कर देती है यही बात पुरुष के लिए घर के बाहर सही है वो घर के बाहर ज्यादा सहज है !.. सभी दो लोगो को साथ रख देने के परिणाम जानते है पर अपनी संतानों  से यही चाहते हैं की वो भी ऐसी ही रहे !
भारत में न किसी बॉस को ऐसा मुलाजिम पसंद है की जिसके पार विचारशक्ति हो ..जो सोच सकता हो ,सवाल खड़े कर सकता हो और न ही किसी परिवार के मुखिया को ही ऐसा सदस्य पसंद होता हे जिसके पास सवाल हो ..सबकी ख्वाइश है ऐसा व्यक्ति जो सिर्फ अनुशरण करे ! कहा है इसके साथ रहो तो रहो ..नहीं पसंद क्यूं नहीं पसंद ..क्या ख़राब है ? बड़ी नौकरी वाली/वाला  चाहिए ..नौकरी से क्या होता है ? असली बात  तो संस्कार है फिर सुन्दर भी तो है ही ! अरे सुन्दर चाहिए ..तो सुन्दरता से क्या होता है ..उसकी नौकरी देखो कितने रूपए हैं उसके पास !  ..रूपए ,नौकरी ,रुतबा  यही सब जो दीखता है वही समझ में आता है समाज  को ..प्रेम ,भावनाए , विचार , आपसी समझ जो दिखती नहीं वो समाज समझ में भी नहीं आती ! समाज लेन देन , नफा नुकसान के तराजू में तौल कर दो लोगो को साथ मिला उन्हें ये आदेश देते रहना चाहता है की वो प्रेम करें पर प्रेम की तो परिभाषा ही ऐसी है  की आप जिस प्रेम  में गिरे उसमे सच्चाई तभी होती है की  अगर ये आपने खुद से किया ही नहीं,कब हुआ आपको बिलकुल पता भी नहीं, न आपने प्रेम  के होने जाने के लिए कोई कोशिश की और न कोई व्यवस्था और न कोई कृत्य। अरे आपने इस तरफ जरा विचार भी नही किया, बस नज़रे मिली कुछ हुआ जिसमे आप कुछ भी करने वाले नहीं बने, बस बिना प्रयास ऐसे ही गिर पड़े। यहीं तक और यही प्रेम  सच है।
इसके अलावा जो भी है वो झूठ का अभ्यास है। समाज झूठ का अभ्यास कराते रहना चाहता है ! उसे इसीमे सुरक्षा दिखती है , क्यूंकि प्रेम जरा अस्थायी है , ये गुलाब का फूल है आज है  कल नहीं भी हो सकता है ! आज आपके साथ है कल किसी और से भी हो सकता हैं | इसिलए समाज ने स्थायी चीज़ की व्यवश्था की है शादी | प्रेम न रहे ..जीवन में आनंन्द न रहे फिर भी शादी तो रहेगी ही ..कागज के फूल की तरह है कोई खुशबु न हो पर जिन्दा रहेगा हमेशा ! पर इस व्यवश्था में किसी का किसी के लिए कोई समर्पण नहीं  है बस परतंत्रता है ..कोई सिर्फ मिट कर राजी नहीं है वो समझौता चाहता है ..ये समझौते एक परतंत्रता को जन्म देते है और परतंत्रता गुस्से को ..भारतीय समाज के अधिकतर घर इस गुस्से से भरे हुए हैं ! फिर मेरी बुद्धि में ये समझ नहीं पड़ता की कैसे कोई नारी उस पुरुष को प्रेम कर सकती है की जो उसकी स्वतंत्रता ही छीन ले? स्त्री की स्वतंत्रता अपने माता पिता के घर को अपना घर कहने की ,स्त्री की स्वतंत्रता पुरुष के माता पिता की सेवक बनने से इंकार करने की , स्त्री की स्वतंत्रता फिर किसी और पुरुष से प्रेम करने की , स्त्री की स्वतंत्रता अपने सभी निर्णय पूरी स्वतंत्रता से लेने की...
इतनी परतंत्रताओ में भी कोई किसी को कैसे प्रेम दे सकता है? समाज ने शादी बना कर उसके मानक इतने अधिक ऊपर कर दिए , की उन्हें पूरा किया जाना असंभव ही है  | यही व्यव्श्था के बुरी तरह विफल होने का कारण भी है ! दो लोग जो लालच में हैं  ..आराम  के लालच में , वासनाओ के लालच में , रूपए के लालच में ..जो इर्ष्या और अभिमान से भरे हुए हैं उन्हें समाज एक साथ रख देता है फिर वो प्रेम का अभिनय करते हैं ..एक दुसरे से प्रेम की उम्मीद करते हैं , प्रेम देता कोई नहीं हैं क्यूंकि प्रेम है ही नहीं देने के लिए , वो  फिर भी प्रेम मिलने की उम्मीद करते हैं और शादी जंग जैसी हो जाती है ,जंग अपनी बात ऊपर रखने की |
सभी सब समझ सकते  है, सभी रुकमनी को छोड़ राधा को पूजते है   पर फिर भी  समाज की  ऐसी व्यवस्था है की घर वाले आपके चोर निकल जाने , या एग्जाम में फ़ैल हो जाने , या नौकरी नहीं लग पाने  पर भी ऐसे दुःख नही मानते जितना उनकी पसंद की लड़की/लड़के को मना  कर देने में गम और गुस्सा मनाते हैं ! 

 अभी हम बस इंतज़ार ही कर सकते हैं उस स्वतंत्र व्यवस्था  का जब शादी की व्यवश्था ख़त्म कर सिर्फ  प्रेम का राज हो !



Thursday, October 2, 2014

भारतीय समाज और सफाईवाला



सफाई की बात दो घटनाओ से शुरू करना चाहूंगा :
हमारे पड़ोस में एक छोटा  बच्चा अपने नाना के घर घुमने आया हुआ था, उसकी उम्र कुछ पांच या छः साल रही होगी  | एक दिन अपने नाना के साथ हमारे घर भी आया | एक घंटे खेल कूद करता रहा जैसे सभी बच्चे करते ही  हैं फिर मुझे भी बच्चो के साथ बच्चा हो जाना अच्छा  लगता है ! खेलते खेलते ही बातों बातों में बच्चा मुझसे पूछ बैठा की भैया आप क्या करते हैं ? मैंने भी बच्चो की तरह मोहब्बत  से जवाब दिया की यार मैं रोड साफ़ करता हूँ ... बच्चे ने पुछा क्या सही में आप रोड साफ़ करने वाले हो ? मैंने फिर कहा की हाँ मेरा यही काम है रोड साफ़ करना !  इसके बाद वो छः साल का बच्चा जो अभी मासूमियत से भरा है जिसकी अपनी खुद की  समझ अभी पैदा ही नहीं हुई है ,उसे उसके आस पास के समाज ने जो कुछ भी सिखाया है उसने वो ही पूरे विश्वाश के साथ ग्रहण कर लिया है , वो मासूम बच्चा धीमी आवाज में मुझसे कहता है की ..रोड साफ़ करने वाले तो गंदे लोग होते हैं!  अब क्यूंकि वो बच्चा है कुछ छुपाना अभी उसने सीखा नहीं होगा, जैसा दिल में आता है वैसा जुबान पर कह देता है ,शायद इसीलिये इस बात को इतने विश्वाश से और बिना डरे बिना किसे हिचक के कह गया पर उसके इस ज्ञान को सुन मुझे हैरानी  होना स्वाभाविक ही था ! मैंने बच्चे से  पुछा  की किसने सिखया तुम्हे ये की रोड साफ़ करने वाले गंदे लोग होते हैं ? इसका बच्चे के पास कोई साफ़ साफ़ उत्तर नहीं था ..निश्चित ही उसे किसी एक व्यक्ति विशेष  ने ये नहीं सिखाया की  जिसका नाम वो ले सके |सारे समाज की व्यवस्था ने उसे ये सिखाया है | उसने ये किसी व्यक्ति विशेष से  सुनकर नहीं  बल्कि अपने चारो और देखकर सीखा होगा !
दूसरी घटना एक किराना  की दुकान की है ,घर के पास एक दुकान पर मैं कुछ जरूरत की चीज़े लेने गया ,दुकान पर कहा की एक किलो चीनी , एक चाय पत्ती और एक झाडू दे दो , दुकान के बाल मजदूर सेवक ने तुरन तीनो चीज़े मुझे ला दी और मैंने तीने चीज़े दुकान के काउंटर पर रख दुकानदार से कहा की भाई साहब कितने रूपए हुए इस सब के ? दुकानदार मेरे द्वारा काउंटर पर  रखी  नयी झाड़ू देख उलझन में आ गया और तुरन्त  कहा की हटाओ इसे काउंटर से ,पीछे रखो ! जैसे झाड़ू कोई ऐसी चीज़ हो जिससे उसके काउंटर का सम्मान गड़बड़ा जाता हो ! जैसे झाडू जो सबकुछ साफ़ करती है वो अगर काउंटर पर रखी गयी तो काउंटर के सम्मान में कमी कर देगी  !
बच्चा सही कह रहा है .हम ऐसे समाज में जी रहे हैं की जहाँ सफाई करने वाले का कोई सम्मान नहीं है ..सफाई करने वालो को  छोटे दर्जे का नागरिक ही समझा जाता है .... जब गली की नाली साफ़ करने वाला गली के किसी घर को खटकटा  कर ठंडा पानी मांगता है तो लोग सोच में पढ़  जाते हैं की उसे किस गिलास में पानी दें ? उस बच्चे ने कभी भी जब किसी रोड या नाली साफ़ करने वाले को अपने टीचर या घर वालो से बात करते देखा होगा तब उनके बात करने के लहजे ने ही  समझा दिया होगा , की जिस व्यक्ति से बात हो रही है वो कितने सम्मान या अपमान के काबिल है !  कईं  बार  लगता है की भारत की वर्ण व्यवस्था जो की शायद  कभी किसी भले के लिए रही हो हो पर  अंत में अभिशाप ही साबित हुई ..वर्ण व्यवस्था ने भारतीयों को उनका सम्मान  करना सिखाया जिनके पास  सत्ता है , जिनके पार व्यापार है  और रुपया है , जिनके पास ज्ञान है.!...... पर जिनके पास समाज की गंदगी साफ़ करने का काम है उनका सम्मान  करना भारतीय समाज ने कभी सीखा ही नहीं ! अभिशाप ही रही है ये वर्ण व्यवश्था की जिस शुद्र वर्ग को सफाई और सेवा का सबसे जरूरी काम दिया गया ,उस वर्ग को ही सम्मान नहीं दिया गया! आज वर्ण व्यवश्था तो टूट चुकी है ,पर फिर भी हम ऐसा समाज नहीं बन पाए की हमारे घर के सामने की नाली साफ़ करने वाले व्यक्ति को घर के अन्दर  सम्मान से बैठा चाय पिला सकें ! चाय बन तो जायेगी ,पर डिस्पोजल में बाहर  पेड़ के नीचे ही चाय पिएगा अभी वो !

निश्चित ही हम अगर दूसरे  सफाई करने वालो को सम्मान देना सीख पाएं  तभी तो खुद बाहर  निकलकर गली और शहर की सफाई खुद से कर पायेंगे ! जिसको  हम खुद ही ईमानदारी से इज्ज़त नहीं दे सकते ,वो हम खुद कैसे हो  पायेंगे ?

 सफाई अभियान की सफलता इसी बात पर निर्भर करती है की जो असल में सफाई कर रहे हैं उन्हें हम कैसी नज़र से देखते हैं ?


Monday, September 22, 2014

क्यूं भाई औरत का जॉब करना जरूरी है क्या?

मित्र प्रेम की एक आदत है की जब भी उसे कोई ऐसी महिला मित्र मिलती है जो अभी घर में गृहणी की जिम्मेदारी का निर्वहन कर रही हो ,उससे हमेशा ही कोई जॉब करने के लिए प्रेरित करता है। ऐसा ही वार्तालाप एक ऐसी महिला से चल रहा है जिसकी शादी को अभी 3.5 बरस हुए है और उनका अभी 2 साल का बेटा भी है । कई दिनों की गुजारिश के बाद भी प्रेम उस महिला को जॉब के लिए फॉर्म भरने को तय्यार नहीं कर पाया । कईं दिनों टालने और घुमा फिरा कर गोल मोल जवाब देने के बाद आज महिला ने साफ़ साफ़ सवाल पुछा है की क्यूं भाई औरत का जॉब करना जरूरी है क्या? क्या घर का काम काम नहीं लगता तुम्हे?

इस सवाल के जवाब में प्रेम का उत्तर-
नहीं एक महिला का जॉब करना बिलकुल जरूरी नहीं है,घर का काम भी तो बड़ा और जरूरी काम है। पर मेरे कहने की वजह दूसरी है। आपको गलत न लगे तो ही कहूँगा। बुरा लगे तो इग्नोर कर देना।
महिला -ठीक है ..कहो

प्रेम-समय गुजरता जाएगा ,समय की गती बहुत तेज है, रोज आपके पति काम पर बाहर जाते रहेंगे,दुनिया भर के अनुभव करेंगे और हर महीने कमा कर लाते रहेंगे ,आपकी गुजर बसर कराएंगे ही..आप उनके बेटे और उनका खयाल रखना..5 साल..10 साल...15 साल... 20 साल...सिर्फ सेवा, पति की सेवा और पति के बच्चो की सेवा... फिर एक दिन अचानक आपके मन में ये सवाल आयेगा की आपका जीवन तो व्यर्थ मे ही गुजर गया...किस तरह आपको एक.. सिर्फ एक जीवन मिला और वो किसी मर्द और उसके बच्चो की सेवा मे ही गुजर गया..कोई भी आपकी पहचान ना बनी..बस दुनिया मे आये और "मिसेज ........" बनकर चले गये...भगवान के दूत जब आपकी जिंदगी का हिसाब लिखेंगे की इसने दुनिया मे क्या किया ,इसकी दुनिया मे क्या अचीवमेंट है तो सिर्फ दो बाते लिखी जाएंगी एक इसने पति की सेवा की और दूसरा की अपने बच्चो को सेवा करके अच्छे से बड़ा किया...बस।

और जब आप 60 की होगी और आपका बेटा आपको छोड़ के अपनी गर्लफ्रेंड के साथ रहेगा.. जो की होगा ही..हमारी जनरेशन ही अपने माता पिता की नही सुनती तो अगली जेनरेशन क्या सुनेगी...आपका बेटा आपको छोड़ कर अमेरिका चला जायेगा तो खुद ही ये अहसास करोगी की अपनी तो लाइफ ही ऐसे ही चली गयी...जीवन बस बच्चो को दे दिया और वो भी साथ ना रहे...

इसलिये कहता हू की जब आप 70 की हो और मैं 70 का हो आपसे मिलने आऊँ तो प्लीज़ ये ना कहना की आप सही कहते थे..मेरा जीवन बस पति और उनके बच्चे की सेवा में ही गया...
अपना कुछ करती तो अपने फैसले लेती..अपना एंजाय करती...कही घूमती, कही निकल जाती.. सारी दुनिया की अच्छाईयाँ और बुराइयां देखती, मेरे पास भी सारे जहान का अनुभव होता..मेरे पास भी दुनिया की समझ और कला होती.....मेरा तो ऐसा ही जीवन है भगवान...भगवान मुझे माफ रखना..जो आपने मेरे भाग्य मे दिया वो ही मैने ईमानदारी से किया..उससे ज्यादा नही कर पायी दुनिया मे कुछ  , पर भगवान तुम मेरी सही दशा और मेहनत समझना. भगवान तुम तो मुझे समझते ही होगे ना...।

Saturday, September 13, 2014

कश्मीर की त्रासदी , भारतीय मन और अलगाववादी




सही ही कहा है किसी ने की इंसान में विचार पहले आता है  है और तर्क  बाद में! हम तर्क लगाकर किसी विचार तक नहीं पहुचते बल्कि जो हमारा विचार पहले से है ही ,उसे सहारा देने के लिए तर्क का उपयोग करते  हैं !
कश्मीर की भयानक बाढ़  के बाद जो पहले से ही कश्मीर को भारत का अटूट हिस्सा मानते है उन सभी ने अपनी महानता समझाने के तर्क शुरू कर दिए है सेना के अच्छे कार्यो की प्रशंसा के तर्क दिए जा रहे हैं यहाँ तक तो  ठीक है ,पर ये लोग ये अहसान जोड़ना नहीं भूलते की देखा हम कितने महान दयालु और कृपालु है ,वो हमारी सेना को पत्थर मारते थे फिर भी अब हमारी सेना  उनकी जाने बचा रही है!  इस व्यर्थ तर्क का क्या मतलब है ? क्या  आप जिनकी जान बचा रहे हैं उन्हें अपना नहीं मानते? क्या उनकी जान बचाकर आप कोई अहसान कर रहे हैं ? क्या आप अन्हे अभी भी किसी  शक से देखते हैं ? या आप उनसे इतने नाराज़ है की उनकी मदद कर तो देंगे पर तभी जब वो इसे आपकी महानता माने और आपके अहसानमंद रहे !  क्यूं आप इस त्रासदी में भी कश्मीरियों को क्यूं ये याद दिलाना चाहते है की उनके और आपके बीच में अपनेपन में कुछ कमी है  ?
कश्मीर की इसी भयानक  बाढ़ के बाद जो अलगाववादी पहले से ही कश्मीर को भारत हिस्सा नहीं मानते हैं उनके भी अजीब तर्क है अलगाववादी लोग इस समय दो तरह के तर्क दे रहे है, पहला की आर्मी ने जो कुछ भी थोडा बहुत किया है वो अहसान नहीं है, बल्कि ये तो शासन करने वाले का दयित्व ही है की वो जिन पर राज कर रहा है उनकी रक्षा करे ! ऐसे  तर्क को देने वाले एक हुर्रियत नेता का ट्विटर अकाउंट आप पड़ सकते हैं !

अलगाववादियों और कुछ आम कश्मीरियों की तरफ से दूसरा तर्क ये है की सेना ने कोई ख़ास मदद नहीं पहुचाई इस बाढ़  के बचावकार्य  के असली हीरो कश्मीर के आम लोग है जिन्होंने खुद के बाढ़ में डूबे हुए घरो की चिंता न कर दूसरो के घरो की चिंता की है, बहुत सारे राहत कैम्प  ऐसे चल रहे है जो सिर्फ कश्मीर के लोगो की  मदद के  रुपयों से चल रहे है जहाँ सरकार ने अभी तक कोई मदद नहीं पहुचायी ! कश्मीरी लोग जहाँ भी है जिस भी देश में है अमेरिका , अरब , सिंगापूर ... सभी जगह से अपने भाइयो को मदद पंहुचा रहे हैं और बन पा रहा है तो खुद सब छोड़ कर आ रहे है अपने साथियो की मदद करने ! और गज़ब बात ये है की विदेशी मीडिया भी इस तर्क का समर्थन करते ही दिख रहा है ! कुछ जुडी खबरे ऐसी है :
क्या ऐसी ही चलता रहेगा की हम इतनी आपदा में भी तठस्थ नहीं हो पायेंगे क्या अब  भी हम जो सोचते है उसे और मजबूत करने के लिए तर्क दूंदते रहेंगे क्या कश्मीर को अभिन्न अंग मानने वाले हिन्दुस्तानी फेसबुक  पर सिर्फ वही फोटो शेयर करते रहेंगे जिसमे मुस्लिम लोगो ने गुरूद्वारे में शरण ली है और अलगाववादी सिर्फ वो फोटो शेयर करते रहेंगे जिसमे सिक्खों ने मस्जिद में शरण ली है .. हम कब दुसरे के नजरिये को अपने नजरिये में शामिल करेंगे .. क्यूं भारतीय मीडिया जहाँ लोग सेना की मदद न पहुच पाने से नाराज़ हो उन मुद्दों को नहीं सामने ला सकता ? क्यूं भारतीय मीडिया राहत कार्य की सफलता की  गाथा  में आम कश्मीरियों की सहभागिता का महिमा मंडन नहीं कर सकता ? कब तक अलगाववादी भारत से दी जा रही मदद भी लेते भी रहेंगे और ये भी कहते रहेंगे की ये तो भारत का उत्तरदायित्व है अहसान नहीं ! क्यूं ? जो सैनिक जान पर खेल कर आपकी जान बचा रहे है वो अल्लाह के भेजे हुए  हुए  नहीं है क्या ? या वो जो आपको आपके डूबे हुए घर से बाहर निकाल कर आपको राहत कैम्प में सुरक्षित पंहुचा कर आपके भोजन ,पानी , दवा का इंतजाम कर रहे है और फिर आपको अपना घर वापस बनाने के लिए रूपए भी दे रहे है वो अल्लाह के भेजे फ़रिश्ते नहीं है क्या ? या  जो आपकी  मदद कर रहा है उससे आप सिर्फ इसलिए नफरत  करते रहेंगे की कल उसीने आपको दुःख  भी दिए थे या मिलकर आगे बढेंगे और प्रेम के जवाब में बीते दिनो की नफ़रत का जहर नहीं  मुहब्बत का शहद दिया जायेगा !
आखिर कब ऐसा होगा की हम अपने पुराने विचारो के लिए नए तर्क न दूंद कर नए तर्क से नए विचारो को बनाने के लिए तैयार होंगे !