सही
ही कहा है किसी ने की इंसान में विचार पहले आता है है और तर्क बाद में! हम तर्क लगाकर किसी विचार तक नहीं
पहुचते बल्कि जो हमारा विचार पहले से है ही ,उसे सहारा देने के लिए तर्क का उपयोग
करते हैं !
कश्मीर
की भयानक बाढ़ के बाद जो पहले से ही कश्मीर
को भारत का अटूट हिस्सा मानते है उन सभी ने अपनी महानता समझाने के तर्क शुरू कर
दिए है सेना के अच्छे कार्यो की प्रशंसा के तर्क दिए जा रहे हैं यहाँ तक तो ठीक है ,पर ये लोग ये अहसान जोड़ना नहीं भूलते की
देखा हम कितने महान दयालु और कृपालु है ,वो हमारी सेना को पत्थर मारते थे फिर भी अब
हमारी सेना उनकी जाने बचा रही है! इस व्यर्थ तर्क का क्या मतलब है ? क्या आप जिनकी जान बचा रहे हैं उन्हें अपना नहीं
मानते? क्या उनकी जान बचाकर आप कोई अहसान कर रहे हैं ? क्या आप अन्हे अभी भी किसी शक से देखते हैं ? या आप उनसे इतने नाराज़ है की
उनकी मदद कर तो देंगे पर तभी जब वो इसे आपकी महानता माने और आपके अहसानमंद रहे ! क्यूं आप इस त्रासदी में भी कश्मीरियों को क्यूं
ये याद दिलाना चाहते है की उनके और आपके बीच में अपनेपन में कुछ कमी है ?
कश्मीर
की इसी भयानक बाढ़ के बाद जो अलगाववादी पहले
से ही कश्मीर को भारत हिस्सा नहीं मानते हैं उनके भी अजीब तर्क है अलगाववादी लोग इस
समय दो तरह के तर्क दे रहे है, पहला की आर्मी ने जो कुछ भी थोडा बहुत किया है वो
अहसान नहीं है, बल्कि ये तो शासन करने वाले का दयित्व ही है की वो जिन पर राज कर
रहा है उनकी रक्षा करे ! ऐसे तर्क को देने
वाले एक हुर्रियत नेता का ट्विटर अकाउंट आप पड़ सकते हैं !
अलगाववादियों
और कुछ आम कश्मीरियों की तरफ से दूसरा तर्क ये है की सेना ने कोई ख़ास मदद नहीं पहुचाई
इस बाढ़ के बचावकार्य के असली हीरो कश्मीर के आम लोग है जिन्होंने खुद
के बाढ़ में डूबे हुए घरो की चिंता न कर दूसरो के घरो की चिंता की है, बहुत सारे
राहत कैम्प ऐसे चल रहे है जो सिर्फ कश्मीर के लोगो की मदद के रुपयों से चल रहे है जहाँ सरकार ने अभी तक कोई
मदद नहीं पहुचायी ! कश्मीरी लोग जहाँ भी है जिस भी देश में है अमेरिका , अरब ,
सिंगापूर ... सभी जगह से अपने भाइयो को मदद पंहुचा रहे हैं और बन पा रहा है तो खुद
सब छोड़ कर आ रहे है अपने साथियो की मदद करने ! और गज़ब बात ये है की विदेशी मीडिया
भी इस तर्क का समर्थन करते ही दिख रहा है ! कुछ जुडी खबरे ऐसी है :
क्या
ऐसी ही चलता रहेगा की हम इतनी आपदा में भी तठस्थ नहीं हो पायेंगे क्या अब भी हम जो सोचते है उसे और मजबूत करने के लिए
तर्क दूंदते रहेंगे क्या कश्मीर को अभिन्न अंग मानने वाले हिन्दुस्तानी फेसबुक पर सिर्फ वही फोटो शेयर करते रहेंगे जिसमे मुस्लिम
लोगो ने गुरूद्वारे में शरण ली है और अलगाववादी सिर्फ वो फोटो शेयर करते रहेंगे
जिसमे सिक्खों ने मस्जिद में शरण ली है .. हम कब दुसरे के नजरिये को अपने नजरिये
में शामिल करेंगे .. क्यूं भारतीय मीडिया जहाँ लोग सेना की मदद न पहुच पाने से
नाराज़ हो उन मुद्दों को नहीं सामने ला सकता ? क्यूं भारतीय मीडिया राहत कार्य की सफलता
की गाथा में आम कश्मीरियों की सहभागिता का महिमा मंडन
नहीं कर सकता ? कब तक अलगाववादी भारत से दी जा रही मदद भी लेते भी रहेंगे और
ये भी कहते रहेंगे की ये तो भारत का उत्तरदायित्व है अहसान नहीं ! क्यूं ? जो
सैनिक जान पर खेल कर आपकी जान बचा रहे है वो अल्लाह के भेजे हुए हुए नहीं है क्या ? या वो जो आपको आपके डूबे हुए घर
से बाहर निकाल कर आपको राहत कैम्प में सुरक्षित पंहुचा कर आपके भोजन ,पानी , दवा
का इंतजाम कर रहे है और फिर आपको अपना घर वापस बनाने के लिए रूपए भी दे रहे है वो
अल्लाह के भेजे फ़रिश्ते नहीं है क्या ? या जो आपकी मदद कर रहा है उससे आप सिर्फ इसलिए नफरत करते रहेंगे की कल उसीने आपको दुःख भी दिए थे या मिलकर आगे बढेंगे और प्रेम के जवाब
में बीते दिनो की नफ़रत का जहर नहीं मुहब्बत का शहद दिया जायेगा !
आखिर
कब ऐसा होगा की हम अपने पुराने विचारो के लिए नए तर्क न दूंद कर नए तर्क से नए
विचारो को बनाने के लिए तैयार होंगे !

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