Sunday, September 7, 2014

प्रेम,पिता,शादी : क्रमश:




प्रेम को कुछ ऐसी बाते अपने पिता को कहने का मन है :
हम कहाँ से आये हैं, पता नहीं , हम आखिर कहा चले जायेंगे ये भी पता नहीं, मुझे हिन्दू पैदा होना है ये किसने चुना  था ? अज्ञात ने ! मेरी यही जाती होगी ये किसने चुना था? अज्ञात ने ! आज मैं जिन्दा हूँ ये किसने  चुना अज्ञात ने ! मैं क्या कल भी जिन्दा रहूँगा ? पता नहीं , आज  मेरे पास जितने रूपए हैं क्या कल भी रहेंगे ? पता नहीं !
जब हम आये अज्ञात से हैं और चले भी अज्ञात मैं जायेंगे तो जीवन के सफ़र में जो कुछ भी हमारे द्वारा अर्जित  हुआ  है वो हमने किया है या अज्ञात ने ?
नादानी की बात जो मैं मानू की ये मेरा अर्जित है , और नादानी की बात जो में अज्ञात के कारण  मिले धर्म , जाती या रूपए ,मान को स्वयं से कारण बनाऊ अपने निर्णयों का !
या अपना कोई निर्णय मैं इस वजह से करू की इसके बाद समाज में लोगो के बीच मेरे अहंकार को बहुत तृप्ति होगी की, देखो  ये देखा मेरा निर्णय ,ये देखी  मेरी सूजबूझ , समाज की नियमो में जिसे सर्वोत्तम कहते हैं वैसा निर्णय है मेरा , आपकी बातो में भी तो समाज में दुसरे व्यक्तियों से बात करते समय एक अलग ही बल आ जायेगा क्यों  की आप जानते हैं की अब आपके सम्बन्ध एक ऐसे व्यक्ति से हैं जिसे समाज उच्च श्रेणी में रखता है , आज आपके  निर्णय के बाद आपके  पास एक ऐसी नौकरी वाला रिश्तेदार है जिसे समाज में अच्छी नौकरी मानते हैं ! 
फिर आपने जीवन भर कई  मित्रो के बच्चो को उनकी मर्जी के खिलाफ विवाह  करते देख जिस डर  का अनुभव भी किया होगा वो भी तो आनंद में बदलने वाला है की देखा वो उसके बच्चे उसके कहने में नहीं और मेरे बच्चे मेरे बाहर नहीं ,  इसमें भी तो आप अपने जीवन की एक और सफलता तलाशते होंगे !
आपने ही  तो कहा है की अगर आपके निर्णय से अलग हो मेरा निर्णय तो तो आपकी बेईज्ज़ती कराने वाली बात हुई , कोई अपने पिता की बेईज्ज़ती कैसे करा सकता है , जो सभी मित्रो रिश्तेदारों में पिता ने कह कहकर अपनी उपलब्धि का तिलिस्म रचा है क्या वो टूट न जाएगा क्या सब उसकी  मजाक न बनायेंगे ! एक पुत्र अपने पिता के इस अहंकार को टूटने का दर्द उसे क्यूं  देगा ,  जबकि पिता ने पुत्र को हर मोड़ पर खुद दुःख झेल कर बिना मांगे मदद पहुचाई हो !
पर क्या मान के लिए मैं निर्णय करू ! अगर किसीका या मेरा भी  मान इतना बड जाए की सारी दुनिया भी मुझे मानने  लगे तो भी क्या इससे मेरे जीवन में कोई सुख बड़ता है? क्या इस बात से मैं और अमीर होता हूँ ? या मेरे जीवन की शान्ति और चैन बढता है ? अगर सारी  दुनिया ही मुझे मानने लगे तो क्या मुझे जीवन के दुखो से कुछ निजाद मिलेगी  या जीवन के प्रति मेरी समझ और विचारशीलता बढेगी ? या मैं और सृजनशील और कलात्मक हो जाऊँगा ? या दुनिया के प्रति मेरी संवेदन शीलता बढेगी और हर सुन्दर चीज़ मुझे और सुन्दर प्रतीत होगी ? ,क्या छोटी छोटी खुशियों में मिलने वाली ख़ुशी बड जायेगी ?
क्या मान एक मुर्खता नहीं है ? पता नहीं !
या मैं निर्णय उन  रुपयों या बहुत सारे सामान के लिए करू जो निर्णय के साथ आ रहा  हैं ? पर जब कोई आराम और भोग का सामान  लेकर आपके पास आये तो क्या ये इस बात की घोषणा नहीं की जो आपके पास है या आप जैसे रहते हैं  उसमे वो संतुष्ट नहीं इसीलिये अपने आराम के व्यवस्था खुद लेकर आ रहा है ?
फिर समाज  में रुपया और सम्पति होनी चाहिए पर क्या रुपया और संपती ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए ? क्या रूपए और संपत्ति को हमारा नजरिया और आंतरिक मन निर्धारित करने का कारण होना चाहिए ? क्या हम इंसानों को छोड़कर रूपए से प्रेम करने लगें ?
सुना है मैंने की अब पैसा ही हमारा प्रेम है, प्रेम वस्तुओं  के लिए , जीवित व्यक्ति से नहीं  ! पैसे/संपत्ति  से प्रेम बहुत आराम दायक है और आसान है क्यूंकि वो निर्जीव है उस पर आप पूरा अधिकार रख सकते हैं वो आपसे अपनी स्वतंत्रता नहीं मांगते वो आपसे कोई विरोध या विद्रोह नहीं करते , जीवित व्यक्ति से प्रेम करना बहुत कठिन है क्यूंकि एक छोटा बच्चा भी तो अपनी  स्वतंत्रता मांग सकता है , वो सवाल खड़ा कर सकता है पर संपती कोई सवाल खड़ा नहीं करती , इसलिए आसान है उसपर आपका अधिकार और प्रेम !
अक्सर ही जो लोग जिन्दा व्यक्तिओं से प्रेम नहीं कर पाते  वो रूपए  से प्रेम करने लगते हैं ! क्यूंकि जितना ज्यादा पैसा होगा उतनी ज्यादा संपत्ति के मालिक आप बन सकते हैं !  पर क्या रूपए का प्यार आपको संतुष्टि दे सकता है ? हां रूपए विद्रोह नहीं करता , वो अपनी स्वतंत्रता नहीं मांगता पर वो आपके प्रेम का  कोई जवाब भी नहीं देता ! बिना प्रतिक्रिया वाला बिना जवाब वाला प्रेम , प्रेम करने वाले को भी निर्जीव बना देता है , रूपए से प्रेम करने वाले लोगो से डरने लगते हैं की कही कोई पास न आ जाए क्यूंकि पास आया तो बाटना पड़ेगा ! जो लोगो पर पूरा अधिकार चाहते है और उनकी स्वतत्रता और उनके सवाल जिनके समझ नहीं आते तो इंसान को छोड़ वस्तुओ के प्रेम में पड़ते ही है और वस्तुओं का प्रेम उन्हें एक दम बंद किताब जैसा बना देता हैं जिसके अन्दर कुछ नहीं नाचता कुछ नहीं गाता , जो खिलखिलाकर हसते नहीं ! !
जो प्रेम जानते है वो किसी के मालिक हो जाना नहीं चाहते उन्हें रूपए से फर्क नहीं पड़ता , अगर है तो ठीक और नहीं है तो ठीक , फिर कोई कहता है की प्यार ऐसी सल्तनत है जिसे किसी रूपए से नहीं खरीदा जा सकता !
ये सब जो रूपए के बारे में कहा गया क्या वो गलत है ? क्या मैं रूपए के लिए ही  निर्णय ले लूं ? पता नहीं !
या मैं सबके  विपरीत  कह दूं की नहीं निर्णय तभी होगा जब किसी प्रेम के पक्ष में हो ! ऐसा  प्रेम जो समाज की किसी जरूरत के लिए न किया गया हो ! वो प्रेम जिसमे किसी पर अधिकार की इच्छा न हो ! वो प्रेम जो सिर्फ और सिर्फ देना चाहता हो लेना कुछ भी नहीं ! वो प्रेम जो भिखारी नहीं सम्राट हो , वो प्रेम जो किसी से बदले म कुछ भी नहीं चाहता हो बस सिर्फ देना चाहता हो और जिसे सिर्फ दिए चले जाने में ही आनंद आता रहे !

मैं जानता हूँ की ये मेरी समझ , आपकी समझ में पागलो  की समझ होगी ! होगी ये पागलो वाली बात ..फिर मैं भी क्या पागल हूँ जो आपकी समझ को गलत कहूं जो आपकी समझ है वो ही सही समझ है , ...और आपकी समझ से ही चलता रहेगा !


No comments:

Post a Comment