उसके पुरे कपडे मैले थे और धुल भरे बुरी तरह उलझे हुए बाल देख कर ऐसा लग
रहा था की जैसे महीने से न नहाया हो। हाथ में एक बड़ा पहिये वाला का बेग भी
था जिसकी चैने खराब होने की वजह से उसने उसे रस्सी से बाँध रखा था। बैग की
हालात भी उसके कपड़ो जैसी ही थी,मैला और काला।उसे देख कोई भी यह अंदाज लगा
सकता था की वो भिखारी है। आज उसका कसूर ये था की वो रेल के रिजर्वेशन वाले
डिब्बे के दरवाजे के पास जमीन पर बैठने की कोशिश कर रहा था| पर क्या
हिन्दुस्तान में रूपए वालो की भीड़ के बीच भिखारी को इंसान जैसा
समझा जाएगा? या उसके साथ होने वाले व्यवहार में कुछ वैसा ही अंदाज होगा जो
किसी जानवर के साथ किया जाए? उसकी जरूरत थी एक ऐसे डिब्बे में जमीन पर
बैठके फ्री में सफ़र करने की की जिसमे संपन्न लोग रूपए देकर सफ़र करते हैं।
इसलिए वो भी समाज के निचले से निचले संभव प्राणी की तरह ही व्यवहार कर रहा
था। किसी ने दुतकारा तो पीछे हट गया। किसी ने गाली दी तो चुपचाप सुन ली।
किसी ने धक्का दिया तो धक्का सह लिया। समाज के न्यूनतम में भी सबसे न्यूनतम
जैसा उसका व्यवहार था। किसी डिब्बे में चढ़ता तो लोग दुत्कार कर भगा देते
...हट बे ..जा यहाँ से...कहाँ चला जा रहा है? ...डंडा मँगाओ दीवान साहब
से... फेंक दो इसे ट्रेन से, जा कही और जा...
वो भी सुनता रहा और डिब्बे बदलता रहा और जैसे ही ट्रेन चली एक डिब्बे में
दरवाजे से चिपककर उसने दरवाजा बंद कर दिया।अपने बेग से फटा मैला कम्बल
निकाला। बैग को सर के नीचे रखा और कम्बल से पूरा शरीर ढक कर सो गया। लोग
अभी भी कुछ देर तक कुछ कहते रहे वो अनसुना करता रहा। जब भी कोई वाशरूम के
लिए उसके पास से गुजरता वो कम्बल हटा कर खाने के लिए कुछ मांगता और लोग या
तो उसकी तरफ नज़र को जाने ही नहीं देते या नाक मुह सिकोड़कर उसे न कह देते।
खाने की मांग जवाब में उसे चल बे ...हट बे...नहीं है...ये सब सुनना होता
,और वो भी सुनता रहता।
फिर स्टेशन आया और लोगो को उसकी जरूरत पड़ी की वो दरवाजा खाली कर दे जिससे दरवाजा खोला जा सके और लोग उतर सके। लोगो ने फिर उसे वैसे ही उसी व्यवहार के साथ कहना शुरू किया की चल बे दरवाजा छोड़...हट जा जरा...अरे सुन रहा है की बहरा है...हटता है की फेक दें....हट यहाँ से....
और वो जो अभी तक न्यूनतम से न्यूनतम था अब अचानक अपना स्वाभिमान खोजना लगा। और उसने लोगो की बातो को वैसे ही अनसुना कर दिया जैसा पहले वो उन्हें अनसुना कर रहा है। लोग कहते रहे की पागल है क्या... सुनता क्यों नहीं...कौन इन्हें चढ़ने देता है...फेक दो इसे....और वो अनसुना करता रहा और मजबूर होकर लोग अगले डिब्बे के दरवाजे की तरफ चले गए। आगे जाते जाते भीड़ में कोई कह रहा था की ये सब समझता है पर पागल होने का नाटक कर रहा है।
पर सब तो वो भिखारी तब भी समझता होगा जब उसे डिब्बे में चढ़ने से रोका जा रहा था, जब उससे कहा जा रहा था की यहाँ क्यों बैठा है आगे जा.....
फिर स्टेशन आया और लोगो को उसकी जरूरत पड़ी की वो दरवाजा खाली कर दे जिससे दरवाजा खोला जा सके और लोग उतर सके। लोगो ने फिर उसे वैसे ही उसी व्यवहार के साथ कहना शुरू किया की चल बे दरवाजा छोड़...हट जा जरा...अरे सुन रहा है की बहरा है...हटता है की फेक दें....हट यहाँ से....
और वो जो अभी तक न्यूनतम से न्यूनतम था अब अचानक अपना स्वाभिमान खोजना लगा। और उसने लोगो की बातो को वैसे ही अनसुना कर दिया जैसा पहले वो उन्हें अनसुना कर रहा है। लोग कहते रहे की पागल है क्या... सुनता क्यों नहीं...कौन इन्हें चढ़ने देता है...फेक दो इसे....और वो अनसुना करता रहा और मजबूर होकर लोग अगले डिब्बे के दरवाजे की तरफ चले गए। आगे जाते जाते भीड़ में कोई कह रहा था की ये सब समझता है पर पागल होने का नाटक कर रहा है।
पर सब तो वो भिखारी तब भी समझता होगा जब उसे डिब्बे में चढ़ने से रोका जा रहा था, जब उससे कहा जा रहा था की यहाँ क्यों बैठा है आगे जा.....