Monday, November 30, 2015

भिखारी ...आगे चल ...

उसके पुरे कपडे मैले थे और धुल भरे बुरी तरह उलझे हुए बाल देख कर ऐसा लग रहा था की जैसे महीने से न नहाया हो। हाथ में एक बड़ा पहिये वाला का बेग भी था जिसकी चैने खराब होने की वजह से उसने उसे रस्सी से बाँध रखा था। बैग की हालात भी उसके कपड़ो जैसी ही थी,मैला और काला।उसे देख कोई भी यह अंदाज लगा सकता था की वो भिखारी है। आज उसका कसूर ये था की वो रेल के रिजर्वेशन वाले डिब्बे के दरवाजे के पास जमीन पर बैठने की कोशिश कर रहा था| पर क्या हिन्दुस्तान में रूपए वालो की भीड़ के बीच भिखारी को इंसान जैसा समझा जाएगा? या उसके साथ होने वाले व्यवहार में कुछ वैसा ही अंदाज होगा जो किसी जानवर के साथ किया जाए? उसकी जरूरत थी एक ऐसे डिब्बे में जमीन पर बैठके फ्री में सफ़र करने की की जिसमे संपन्न लोग रूपए देकर सफ़र करते हैं। इसलिए वो भी समाज के निचले से निचले संभव प्राणी की तरह ही व्यवहार कर रहा था। किसी ने दुतकारा तो पीछे हट गया। किसी ने गाली दी तो चुपचाप सुन ली। किसी ने धक्का दिया तो धक्का सह लिया। समाज के न्यूनतम में भी सबसे न्यूनतम जैसा उसका व्यवहार था। किसी डिब्बे में चढ़ता तो लोग दुत्कार कर भगा देते ...हट बे ..जा यहाँ से...कहाँ चला जा रहा है? ...डंडा मँगाओ दीवान साहब से... फेंक दो इसे ट्रेन से, जा कही और जा...
वो भी सुनता रहा और डिब्बे बदलता रहा और जैसे ही ट्रेन चली एक डिब्बे में दरवाजे से चिपककर उसने दरवाजा बंद कर दिया।अपने बेग से फटा मैला कम्बल निकाला। बैग को सर के नीचे रखा और कम्बल से पूरा शरीर ढक कर सो गया। लोग अभी भी कुछ देर तक कुछ कहते रहे वो अनसुना करता रहा। जब भी कोई वाशरूम के लिए उसके पास से गुजरता वो कम्बल हटा कर खाने के लिए कुछ मांगता और लोग या तो उसकी तरफ नज़र को जाने ही नहीं देते या नाक मुह सिकोड़कर उसे न कह देते। खाने की मांग जवाब में उसे चल बे ...हट बे...नहीं है...ये सब सुनना होता ,और वो भी सुनता रहता।
फिर स्टेशन आया और लोगो को उसकी जरूरत पड़ी की वो दरवाजा खाली कर दे जिससे दरवाजा खोला जा सके और लोग उतर सके। लोगो ने फिर उसे वैसे ही उसी व्यवहार के साथ कहना शुरू किया की चल बे दरवाजा छोड़...हट जा जरा...अरे सुन रहा है की बहरा है...हटता है की फेक दें....हट यहाँ से....
और वो जो अभी तक न्यूनतम से न्यूनतम था अब अचानक अपना स्वाभिमान खोजना लगा। और उसने लोगो की बातो को वैसे ही अनसुना कर दिया जैसा पहले वो उन्हें अनसुना कर रहा है। लोग कहते रहे की पागल है क्या... सुनता क्यों नहीं...कौन इन्हें चढ़ने देता है...फेक दो इसे....और वो अनसुना करता रहा और मजबूर होकर लोग अगले डिब्बे के दरवाजे की तरफ चले गए। आगे जाते जाते भीड़ में कोई कह रहा था की ये सब समझता है पर पागल होने का नाटक कर रहा है।
पर सब तो वो भिखारी तब भी समझता होगा जब उसे डिब्बे में चढ़ने से रोका जा रहा था, जब उससे कहा जा रहा था की यहाँ क्यों बैठा है आगे जा.....

बारात की लाईट

बारात का जश्न जारी था ,लोग जमकर नाच रहे थे ,कुछ लोगो के लिए पीने पिलाने का इंतज़ाम भी था। बैंड वाला बिना सुर के लोगो की फरमाइश के गाने गा और बजा रहा था।कोई फरमाइश 2 मिनट से ज्यादा नहीं चलती थी क्यूंकि फिर नयी फरमाइश आ जाती थी। कुछ उम्रदराज लोग बरात को तेज चलाना चाहते थे और जश्न मनाते नौजवान आगे जाते बैंड को रोक लेते थे और नाच फिर फिर शुरू हो जाता था। नाचने वालो पर कुछ लोग रूपए लुटाते थे जिन्हें लूटने के लिए कई बच्चे भी मौजूद थे। ये बरात में आये बच्चे नही थे बल्कि बेढंग साधारण कपडे पहने आस पड़ोस के बच्चे लगते थे। और इन रूपए लूटते बच्चों को वो बहुत गौर से देख रहा था। वो भी उन्ही की उम्र का बच्चा ही था। उसकी उम्र भी 12 -13 साल रही होगी। उसने अपनी हाइट से भी बड़ी बैंड की लाइट अपने सर पर रख रखी थी। बमुश्किल ही वो सीधा खड़ा हो पा रहा था। लाइट पकड़ने वाले और भी बच्चे ही थे पर उसकी उम्र शायद सबसे कम थी। कुछ उसकी तबियत भी ठीक नहीं थी, इतनी ठण्ड में उसने एक पुराना हाल्फ स्वेटर ही पहन रखा था,और हर दो मिनट में खांस रहा था। मैं बहुत देर तक उसे देखता रहा। वो बड़ी सी लाइट को अपने सर पर रखा उसे दोनों हाथो को ऊपर कर पकड़ा हुआ पिछले आधे घंटे से खड़ा था। स्कूल में टीचर अगर 10 मिनट भी हाथ ऊपर करा दे तो वो कितनी भारी सजा लगती थी।पर इस बच्चे को किस बात की इतनी कड़ी सजा मिल रही थी? ये बच्चा तो शायद जानता भी नहीं हो की खाली हाथ ऊपर करना भी सजा होती है। खैर वो बच्चा उन बच्चों को रुक रुक कर देख रहा था जो लुटाए गए रूपए लूट रहे थे। मुझे उस बच्चे पर कुछ दया आई, और मैं उस बच्चे को कुछ रूपए देने के लिए आगे बड़ा।
मैं उसके पास पहुचने वाला था की भीड़ में से एक रूपए लूटने वाला बच्चा उस बच्चे के पास आया, बच्चे के सर पर रखी लाईट भीड़ में से आये नए बच्चे ने अपने सर पर ले ली और जिस बच्चे को मैं दया से देख रहा था वो मुस्कुराते हुए भीड़ में रूपए लूटने चला गया। अब रूपए लूटने की बारी उसकी थी।

Sunday, November 8, 2015

आगरा का पेठा

मथुरा स्टेशन पर ट्रेन में पेठा बेचने वाला आवाज लगा रहा था। आगरा का पेठा ...आगरा का पेठा..... इस आवाज को सुन हमारे केबिन में बैठा एक नौजवान हैरान होने लगा। और हैरत भरी कुछ अजीब सी नज़रो से पेठा बेचने वाले को केबिन के साइड से झाँक कर देखने लगा। बाकी किसी यात्री को चलती ट्रेन में किसी प्राइवेट आदमी के पेठा बेचने पर कोई हैरानी नहीं थी। क्यूंकि मथुरा आगरा के पास ट्रेन में बाहर के लोग पेठा बेचने आते ही हैं। पर ये नौजवान बहुत हैरान भी था और कुछ परेशान भी। फिर भी हम में से कोई भी ये नहीं सोच रहा था की कही इसकी परेशानी सिर्फ इस बात से तो नहीं होगी ,की सरकारी ट्रेन में ये प्राइवेट आदमी किसकी परमिशन से पेठा बेच रहा है? ऐसा सवाल तो मन की गहराइयो में तभी दफ़न हो जाता है की जब हम किसी गुमनाम कंपनी की पानी की बोतल किसी गरीब मजदूर बच्चे से बीस रूपए में खरीदते हैं।
खैर जैसे ही पेठा बेचने वाला हमारे केबिन पर आया। नौजवान उसे देख गुस्से में बोला ,कौन है तू,कहाँ से आया है?
पेठे वाला- क्यों तुझे क्या?
नौजवान-तेरा मालिक कौन है,किसके यहाँ का पेठा है?
पेठे वाला-तुझे क्या मतलब है भाई? बढ़िया पेठा है|
नौजवान- ....... नाम क्या है बे तेरा , तेरी बात कराता हूँ अभी यादव जी से।
पेठे वाला- कौन यादव जी।
नौजवान- आर पी ऍफ़ वाले यादव जी।
पेठे वाला- कर ले जिसे फ़ोन करना है। विजय नाम है मेरा ... संजय जी के यहाँ से पेठा आया है।
नौजवान यादव जी को फ़ोन करता है।
नौजवान- साहब ये जम्मू मेल में संजय के यहाँ का पेठा बिक रहा है। कोई विजय लड़का बेच रहा है बात करो जरा इससे।
यादव जी ने उधर से कुछ कहा होगा ।
नौजवान- पर साहब ये वेस्टर्न लाइन की ट्रेन है। और निजामुद्दीन भी जायेगी।
फिर यादव जी ने उधर से कुछ कहा होगा और फ़ोन रख दिया गया। अब पेठा बेचने वाले का सीना और चौड़ा हो गया।
पेठा बेचने वाला- क्यों हो गयी तसल्ली। क्या कहा यादव जी ने............ वो क्या कहेगा ........रोज के हमारे 1500 रूपए जाते हैं थाने में, संजय साहब के माल को ट्रेन में कोई नहीं रोकता । तू कहाँ से आया रोकने|
अब नौजवान कुछ नरम और अचरज में पड़ा। फिर बोला माफ़ करो भाई हमारी तुमसे लड़ाई नहीं है पर यहाँ दो ही लाइन है। ईस्टर्न लाइन और वेस्टर्न लाइन , ईस्टर्न लाइन पर पेठे का काम शर्मा जी के पास है और वेस्टर्न लाइन के लिए हमारे यहाँ से भी रोज 1000 रूपए यादव जी के यहाँ जाते है आगे थाने में देने के लिए। मैं ही रोज शाम पेठे बेचने आता हूँ। आज काम से दिल्ली जाना था। तुम अभी बेच लो ...हमारे लोग बात कर लेंगे थाने में ।
कुछ सोचते सोचते पेठा बेचने वाला भी आगे चला गया |
कहानी के नाम झूठे हैं पर सभी जानते हैं की कहानी ऐसी हज़ारो कहानियो की तरह ही झूठी नहीं ,इतने छोटे छोटे करप्शन भी हमारी व्यवश्था का अटूट हिस्सा हैं , जहाँ करप्शन करने वाले सौ , हज़ार रूपए को अपना अधिकार ही समझते हैं ! .... सिस्टम में जब सौ हज़ार रूपए के लालची लोगो की भीड़ हो तो ला एंड आर्डर सही होने की उम्मीद ही बेईमानी लगती है !

अच्छे दिन

घर के पास एक मेडिकल की दुकान है जिसे ३०-३५ साल का एक इंसान चलता है ! क्यूंकि दुकान इंडस्ट्रियल एरिया में है जहाँ बहुत सारे मजदूर काम करते हैं तो लिहाज़ा ये मजदूर ही मेडिकल की दूकान के सबसे बड़े खरीददार हैं | मैं भी कभी कभी उस दूकान पर एक दो आम दवाइयां लेने चला जाता हूँ | और हर बार ही दूकान पर दुःख में भरने वाला नज़ारा मिलता है | दूकान पर भीड़ रहती है क्यूंकि मजदूर लोगो को अच्छे दिनों में भी इतनी तनख्वाह नहीं मिलती की वो डॉक्टर को दिखा कर दावा ले सके , डॉक्टर सब समाज सेवक है और कोई २०० -३०० से कम का परचा नहीं बनाता ,फिर वो जो दावा लिखता है वो इनती महंगी होती है की मजदूर की ४ -५ दिन की कमाई एक बुखार में ही चली जायेगी | इसलिए गरीब मजदूर मेडिकल पर दुःख बता कर ही दवा ले लेता है ! मेडिकल की दुकान पर कुछ ऐसा नज़ारा ओता है !
पहला ग्राहक - कितने रूपए की दावा हुई मेरी ?
मेडिकल वाला - ५० रूपए की ..
पहला ग्राहक - तो ३० रूपए की कर दो ..एक दो दिन कम कर दो ...
मेडिकल वाला - तो पूरी नहीं होगी ...सही नहीं होगे ..
पहला ग्राहक - तो फिर दो दिन बाद और ले जाऊंगा . अभी तीस की ही दे दो ..
दूसरा ग्राहक - चार दिन से बुखार है ..बिलकुल उठा नहीं जा रहा ..बहुत कमज़ोरी है ..
मेडिकल वाला - चार दिन की दावा दे देता हूँ ..सही हो जाओगे ..
दूसरा ग्राहक - सही है दे दो अपने हिसाब से .
मेडिकल वाला - १०० रूपए बनेंगे |
दूसरा ग्राहक - कम नहीं हो सकता क्या ?
मेडिकल वाला - नहीं ..,ऐसा करो तुम इंजेक्शन लगवा लो ,वो सही रहेगा | ३० रूपए का है ..एक कल लगवा लेना |
दूसरा ग्राहक - हाँ लगा दो ...
मेडिकल वाला- तो अन्दर आ जाओ ..मैं इंजेक्शन लगा देता हूँ |
तीसरा ग्राहक : इन्हें देखना ये मेरी वाइफ हैं ..इन्हें पीठ में कुछ दाने से हो गए हैं ..कई दिनों से खुजली है ?
मेडिकल वाला - इन्हें अन्दर भेजो ...
मेडिकल वाला परदे के पीछे चेक करता है और कुछ दवाइया और क्रीम देता हैं | फिर १५० रूपए मांगता है
ग्राहक - क्रीम काफी नहीं है ..ये गोली किसलिए ? ऐसा करो बस क्रीम ही दे दो |
ऐसे ही कितने हिन्दुस्तानी रोजाना इस मेडिकल से दावा लेते हैं | एक दिन वहां मैंने एक गर्भवती महिला को भी देखा , पूछने पर पता चला की वो ७ महीने के गर्भ से है और मेडिकल वाले से नियमित इलाज कराती है |
फिर सोचा की ये सब बिना अच्छे दिनों में होता तो कोई बात नहीं पर अच्छे दिनों में इन मजदूरों की ज़िन्दगी में क्या फर्क पड़ा ? क्या अच्छे दिनों का मतलब ये नहीं था की मजदूरों की तनख्वाह बढेगी ? क्या अच्छे दिनों का मतलब ये नहीं था की मजदूरों गरीबो के लिए और नए सरकारी अस्पताल बनेगे ? क्या अच्छे दिनों का मतलब ये नहीं था की गरीब की थाली में अब और खाना आएगा ..महंगाई कम हो जायेगी ? क्या अच्छे दिनों का मतलब ये नहीं था की जरूरी दवाईया सस्ती मिलेंगी ? क्या अच्छे दिनों के मतलब ये नहीं था की आम इंसान को जो रोज मर्रा की जिन्दगी में सरकारी आफिसो में भ्रस्टाचार झेलना पड़ता है उसे कम करने के लिए बड़े कदम उठाये जायेंगे ( जो कदम उठते नहीं दिखे ),क्या अच्छे दिनों का ये मतलब नहीं था की मजदूरों को गरीबो नए रोजगार मिलेंगे , क्या अच्छे दिनों का ये मतलब नहीं था की कॉन्ट्रैक्ट लेबर के नाम पर होने वाले शोषण को छोड़कर क्लास सी और डी की स्थायी नौकरिया निकाली जायेंगी ? आखिर क्या था अच्छे दिनों का मतलब ? अच्छे दिनों में किसान की फसल के एम् एस पी ( मिनिमम सपोर्ट प्राइस ) कितने बदाये गए ? इस साल सिर्फ ५ परसेंट तक दाम बड़े और पिछले साल इससे भी कम | दो साल में १० % , और ये १० % भी आउटपुट पर मिलने वाली रकम का बदना है ..इनपुट का खर्चा कही ज्यादा बढता है तो कमाई १० % से भी कम बड़ी होगी दो सालो में शायद ७-८ %! जबकि सरकारी कर्मचारियों का डी ए ही ६ महीने में १० % बड़ा दिया जाता है ..बेसिक अलग ३ % बदती है | एम् एन सी में कार्यरत भारतीयों का अगर कम्पनी द्वारा डीए न बढाया जाए और दो साल में सिर्फ ५-५ % से भी कम हाइक हो, मेडिकल फैसिलिटी ,एजुकेशन फैसिलिटी, अच्छी ग्रोथ कुछ अलग से न मिले तो वो भी कम्पनी बदल देते हैं ....... बिहार में जनता ने भी नेता बदल दिए ..१.५ साल पहले जो सब बीजे पी के साथ थे ,उनमे से बहुत से उनके साथ नहीं रहे ! मुझे १.५ साल पहले बी जे पी के जीतने की जितना ख़ुशी थी उसका १% भी गम आज उसके हारने से नहीं है !

Wednesday, July 22, 2015

व्यापम कल्चर है।

मध्य प्रदेश में कही किसी ट्रेन के स्लीपर कोच में।
अजय-यार कही कोई सरकारी नौकरी का जुगाड़ बता दे । दो लाख रूपए तक तो खर्च कर सकता हूँ।
विजय-अरे भाई मुझे पता होता तो मैंने खुद की नौकरी न लगवा ली होती 2 लाख देके। भाई तू दो लाख कह रहा है यहाँ तो दस दस लाख देने को लोग तैयार है सिपाही की नौकरी के लिए।
अजय- यार तेरे मामा भी तो पुलिस में है उनके थ्रू कोई जुगाड़ निकाल।
विजय- यार मामा जी ने अपने लड़के का कराया तो है सरकारी अस्पताल में बाबू के लिए।
अजय-मोटा पैसा लगा होगा।
विजय-राम जाने, खुद से तो यही कहते हैं की कोई पैसा नही लगा पर सुना यही है की 12 लाख तक रुपया चला है।
अजय-क्या यार गरीब के लिए क्या है। एम् ए करके सिर्फ सिपाही की नौकरी मिलके भी खुश हैं ...कही से जुगाड़ कर दो लाख रूपए देने को तैयार भी है और तू कहता है की 10 लाख चल रहे हैं। अरे मेरे बाप के पास 10 लाख होते तो मैं एम् ए क्यूँ करता किसी प्राइवेट कॉलेज में मैं भी बी टेक कर लेता।
विजय- ये तो है। पर यार जब नौकरी देने वाले ने रूपए देकर ही नौकरी देनी है और लोग 10 लाख खुद ही बिना मांगे देने को तैयार है तो कोई 10 लाख छोड़कर तेरे 2 लाख क्यूँ लेगा?
अजय-वो देख टी टी आ रहा है।
विजय-आने दे ।
टी टी- टिकट दिखाइए।
विजय-पुलिस स्टाफ हैं।
टी टी- आई डी दिखाओ।
विजय- (आस्तीन ऊपर करते हुए) आई डी नहीं है ,फोन पे बात कर लो।
विजय-हैलो मामा जी ...जरा बात करना ये टिकट मांग रहे हैं।
(टी टी ने फ़ोन पर कुछ बात की और आगे चला गया)
अजय-यार ये व्यापम घोटाला क्या है?
विजय-कोई घोटाला नहीं है।
अजय-मतलब।
विजय-अरे व्यापम घोटाला नहीं कल्चर है। व्यापम हिंदुस्तान का कल्चर है। वो कल्चर जहाँ छोटी बड़ी हर नौकरी के लिए रूपए लिए जाते हैं वो कल्चर जहाँ ईमानदार बस वही है की जिसे बेईमानी का मौका नहीं मिला। वो कल्चर जहाँ रूपए देने वाले खुद आगे बढ़कर रूपए खिलाते है ,वो कल्चर जहाँ जिसकी जितनी मांगने की औकात है वो उतना मांग ही रहा है। वो कल्चर जहाँ चपरासी भी फ़ाइल को एक टेबल से उठा दुसरी टेबल पर रखने के लिए रूपए मांगता है और बड़े हक़ के साथ माँगता है ।जैसे रूपए खाना उसका हक़ हो। व्यापम घोटाला नहीं हमारा कल्चर है। फर्क बस ये है की व्यापम में सेंट्रली रिक्रूटमेंट थी तो सारा करप्शन एक नाम के नीचे आ गया और व्यापम बड़ा नाम हो गया।
अजय-इतनी मौत क्यों हो रही है कौन करा रहा है?
विजय-कौन करा रहा है तो पता नहीं पर बचपन में सुना था की एक झूठ बोलने पर उसे छुपाने के लिए 100 झूठ बोलने पड़ते है। शायद इसी तरह एक मर्डर करने पर भी 100 मर्डर करने पड़ते हैं। अभी कितने हो गए......?
अजय- अच्छा जो हमने टी टी को मामा से फोन कराके भगा दिया। क्या ये भी व्यापम कल्चर है।
विजय-...
....
...
...
.हाँ शायद.. :)  :) 

हम जीत गए................ भाईजान !

हम जीत गए................ भाईजान !


बजरंगी भाईजान देख कर ख्याल आ रहा था की क्या ये फिल्म हिट होगी ? क्या इस फिल्म को भारत के लोग पसंद करेंगे ? इसकी गहरी वजह थी , वजह ये की फिल्म में दिखाया था पकिस्तान के लोग अच्छे भी होते हैं , पकिस्तान में इंसानियत  की मदद करने वाले लोग भी रहते है, पर भारत के न्यूज़ चैनल और नेताओ के बयानों की नजरो से देखो तो भारत की जनता के ख्याल कुछ इस तरह के हैं :
भारत के लोगो को न्यूज़ चैनल की नजरो से देखा जाए तो उन्हें सिर्फ पाकिस्तान की बुराई देखना पसंद है , न्यूज़ चैनल वालो की समझ से भारत की जनता बस ये सुनना चाहती है की सरहद पर सारे बम गोले पहले पाकिस्तान वाले ही बरसाते है ,भारतवासी  सीधे सादे लोग तो बस जवाबी कार्यवाही करते  हैं ! भारत की जनता न्यूज़ चैनलो   में पाकिस्तान को  लीग मैच में हरा लेने पर  ही वर्ड कप जीतने के बराबर हे ख़ुशी मनाती दिखती है , आये दिन जनता के नेता अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए  पाकिस्तान को करारे जवाब वाले बयान  जारी करते रहते है  ! जनता के नेताओ को लगता है की उन्होंने पाकिस्तान के साथ अगर बातचीत भी कर ली तो कही हमारी जनता नाराज़ न हो जाए ! नेताओ और मीडिया वालो दोनों को ही ऐसा लगता है की कही उन्होंने पाकिस्तान की हमदर्दी में दो शब्द भी कह दिए तो जनता उन्हें देशद्रोही मानने लगेगी   ! यहाँ सबका सीधा सा उसूल है की देशभक्त कहलाना है तो पकिस्तान की बुराई करते रहना है वहां कोई अच्छाई या हमदर्दी  नहीं दिखनी चाहिए ! तभी तो जनता के  नेता अपने देश के  देशद्रोहियो को पाकिस्तान जाने की सलाहे भरे स्टेज से देते रहते हैं !  जब कोई पकिस्तान का राष्ट्रपति अजमेर की दरगाह पर आता है और भारत का विदेशमंत्री उसके साथ लंच कर लेता है तब जनता  बड़े गुस्से में दिखाई देती है ? और न्यूज़ चेनलो पर पूछती  है की बिरयानी क्यूं खिलाई ? राज्यविदेशमंत्री पाकिस्तान की एम्बेस्सी में किसी कार्यक्रम में चले जाएँ तो सफाई देनी पड़ती है की क्यूं गए थे ?


मुझे शक था की जिस जनता को मैंने मीडिया और नेताओ की नजरो से ऐसा देखा है क्या वो जनता ऐसी फिल्म को पसंद करेगी की जिसका हीरो एंटी सनी देओल है जो पाकिस्तान की कोई बुराई नहीं करता , क्या जनता ऐसी फिल्म को पसंद करेगी की जिसमे ये दिखाया गया हो की सरहद के उस पार  भी इंसानियत में भरोसा करने वाले इंसान ही रहते है , वहां भी अच्छे लोग है , मैं सोचता था की न्यूज़ चैनल वाले घंटो तक  दिखा-दिखा के नहीं थकते की पाकिस्तान के बॉर्डर से पाकिस्तानी जवान  बम गोले फेक रहे है और फिल्म में देखने मिल रहा है की वो जवान भी इंसान हैं  और सलमान को लड़की के साथ बॉर्डर पार करने की परमिसन दे देते हैं , भारत के न्यूज़ चैनल पर जो पाकिस्तान के पत्रकार बुलाये जाते हैं हैं वो सब क्या क्या कहते हैं इंडिया को, लगता ही नहीं की कोई इंसानियत हैं और फिल्म का पत्रकार चाँद नवाब तो बेईमानी से पाकिस्तान में घुसे हिन्दुस्तानी की मदद में लग जाता हैं , इंसानियत के लिए (सलमान को एजेंट बताने की ) एक बड़ी स्टोरी  छोड़ देता हैं अपनी पोलिस से भी पंगा ले लेता है , एक मौलवी साहब भी हैं वो तो धर्म का भी ख्याल नहीं रखते  उनकी मस्जिद के दरवाजे भी कभी किसी के लिए  बंद नहीं होते ! हद है की आम पाकिस्तानी भी सलमान की सपोर्ट में चला आता है ,एक ऐसे इंसान की जो हिंदुस्तान से आया है चोरी छुपे ! पूरी बस में कोई पाकिस्तानी पोलिस की मदद नहीं करता जबकि सलमान बस के ऊपर ही होते हैं !

अब अगर पाकिस्तान के लोगो की इतनी अच्छाई दिखाने वाली फिल्म को जनता पसंद कर ले तो ये न्यूज़ चैनल वालो की हार ही है जिनको मसालेदार एंटी पाकिस्तान स्टोरी चलाने से फुर्सत  नहीं  !

न्यूज़ चैनल और देश के नेता दोनों को ही समझना चाहिए की किसी देश की  हाय हाय के नारे लगाने से उनकी देशभक्ति साबित नहीं होती ! दोनों ही देशो में  में ज्यादातर लोग ऐसे ही हैं जो  दोनों देशो में मोहब्बत चाहते हैं ! दोनों तरफ के लोग ही नफरत से ज्यादा इंसानियत में भरोसा रखते हैं !


बजरंगी भाईजान हिट हुई तो हम भी जीत गए ! भारतीयों की इंसानियत जीत गयी ! बजरंगी भाईजान का हिट होना मोहब्बत की जीत है उन चंद लोगो पर जो सिर्फ नफरत फैलाने  की बात करते हैं ! बजरंगी भाईजान का हिट  होना हम सब में छुपे मोहब्बत भरे दिल की  जीत है !

Saturday, May 2, 2015

लड्डू वाली लड़की ....माँ !

गाँव में एक शादी से पहले लगुन् का कार्यक्रम चल रहा था। कई जगह जिसे तिलक भी कहते हैं। नाम कुछ भी दो असल में ये दहेज़ का कार्यक्रम होता है। और कार्यक्रम में शिरकत करने वालो के दिमाग में एक ही सवाल घूमता है की "कितने लाख ?"
मुझे इस सवाल से मतलब था नहीं तो मैं सबसे पीछे जाकर बैठ गया। पास में एक 3-4 साल की छोटी सी प्यारी सी लड़की बैठी थी वो भी लेन देन की लालची प्रवृत्ति को धार्मिक चादर उड़ा देने वाले इस झूठे तामझाम के वातावरण से अनजान थी। मैं उस लड़की से ही बात करने लगा।
मैं-कहाँ से आई हो?
लड़की-इसी गाँव से|
मैं-कहाँ रहती हो।
लड़की।-वो जमनी का पेड़ है न। उसी के नीचे हमारा घर है।
मैं-जमनी पर तो बहुत फल आते होंगे।मुझे भी देना।
लड़की-नहीं उस पर फूल आते हैं।
मैं-नहीं फल भी आते होंगे।
लड़की- नहीं उस पर फूल ही आते हैं।फूल ही आये हैं बस।

मैं समझ गया की लड़की ने अभी अपने होश में फल उगते देखे ही न होंगे ...शायद अगले बरस ये ऐसा न कहे।
ऐसे ही कुछ कहते सुनते कार्यक्रम ख़त्म हुआ और सबको लड्डुओं का डिब्बा बांटा जाने लगा। एक डिब्बे में चार लड्डू थे।मुझे चार लड्डू खाने नहीं थे तो मैंने उस छोटी बच्ची से कहा ..
मैं-तू मुझे अपने डिब्बे में से एक लड्डू दे दे मैं तुझे अपना पूरा डिब्बा दे दूंगा
लड़की-नहीं चाहिए।
मैं-अरे तेरा घर इसी गाँव में है तू दोनों डिब्बे घर ले जाना ...बाद में खा लेना।
लड़की- नहीं चाहिए।
मैं-अरे देख दूसरे बच्चे भी कितने डिब्बे लिए घूम रहे हैं।सबने पुराने डिब्बे छिपा कर और ले लिये।
लड़की- तुम डिब्बा दोगे ही नहीं।
मैं- नहीं ...मैं दूंगा...तू एक लड्डू तो दे।
लड़की- तुम भाग जाओगे।
मैं -नहीं मैं नहीं भागूंगा।
लड़की-नहीं तुम भाग जाओगे...
लड़की फिर कुछ नहीं बोली।थोड़ी देर में मैंने खुद ही अपना डिब्बा लड़की को देकर कहा की तू ऐसे ही रख ले ...मुझे तेरा लड्डू नहीं चाहिए। लड़की ने मेरा डिब्बा जमीन पर फेका और पैर से ठोकर मारने लगी।मुझे कहा की नहीं चाहिए... मुझे समझ ही नहीं लगा की ऐसा क्या करा मैंने।
उसी पल एक और गाँव की छोटी लड़की उसे बुलाने आई और मुझसे बोली की ....पता है की इसकी तो माँ ही नहीं है...इसकी माँ इसे छोड़कर भाग गयी......
उसने लड़की से कहा की चल तेरे पापा ढूंढ रहे हैं...
मुझे लड़की पर कुछ दया सी आई लगा की शायद माँ के जाने का इतना असर है की लड़की अब किसी से भी कुछ नहीं चाहती इसकी जामुनी के पेड़ पर आये फूल अब जामुनी नही बनते.....मैं खाने के पंडाल की तरफ मुड़ गया।
लड़की के बारे मैं कुछ सोचता हुआ मै पंडाल तक पहुच नहीं पाया था की फिर किसी ने पीछे से मेरा हाथ छुआ। मुड़ कर देखा तो वो ही लड़की थी हाथ में एक लड्डु लिए हुए। सारे विचार खो से गए। हल्की सी नम आँखों से मैंने उस लड्डु को हाथ में लिया और तुरंत वो लड़की ....वापस भाग गयी.....
उस लड़की ने मेरे लड्डु तो लिए नहीं अब मैं उसका लड्डु कैसे खाता..... पर लड़की इतनी मासूम थी की उसका ये कर मैंने रख लिया और इस दुआ के साथ ही लड्डु खाया ....की इसकी माँ वापस आ जाए। कोई तो भगवान से कहे की ये लड़की बिना माँ के खुद ही माँ जैसी हो गयी है। दुसरो के लड्डू नहीं लेती अपने ही बाटें चली जाती है।...