Monday, November 30, 2015

बारात की लाईट

बारात का जश्न जारी था ,लोग जमकर नाच रहे थे ,कुछ लोगो के लिए पीने पिलाने का इंतज़ाम भी था। बैंड वाला बिना सुर के लोगो की फरमाइश के गाने गा और बजा रहा था।कोई फरमाइश 2 मिनट से ज्यादा नहीं चलती थी क्यूंकि फिर नयी फरमाइश आ जाती थी। कुछ उम्रदराज लोग बरात को तेज चलाना चाहते थे और जश्न मनाते नौजवान आगे जाते बैंड को रोक लेते थे और नाच फिर फिर शुरू हो जाता था। नाचने वालो पर कुछ लोग रूपए लुटाते थे जिन्हें लूटने के लिए कई बच्चे भी मौजूद थे। ये बरात में आये बच्चे नही थे बल्कि बेढंग साधारण कपडे पहने आस पड़ोस के बच्चे लगते थे। और इन रूपए लूटते बच्चों को वो बहुत गौर से देख रहा था। वो भी उन्ही की उम्र का बच्चा ही था। उसकी उम्र भी 12 -13 साल रही होगी। उसने अपनी हाइट से भी बड़ी बैंड की लाइट अपने सर पर रख रखी थी। बमुश्किल ही वो सीधा खड़ा हो पा रहा था। लाइट पकड़ने वाले और भी बच्चे ही थे पर उसकी उम्र शायद सबसे कम थी। कुछ उसकी तबियत भी ठीक नहीं थी, इतनी ठण्ड में उसने एक पुराना हाल्फ स्वेटर ही पहन रखा था,और हर दो मिनट में खांस रहा था। मैं बहुत देर तक उसे देखता रहा। वो बड़ी सी लाइट को अपने सर पर रखा उसे दोनों हाथो को ऊपर कर पकड़ा हुआ पिछले आधे घंटे से खड़ा था। स्कूल में टीचर अगर 10 मिनट भी हाथ ऊपर करा दे तो वो कितनी भारी सजा लगती थी।पर इस बच्चे को किस बात की इतनी कड़ी सजा मिल रही थी? ये बच्चा तो शायद जानता भी नहीं हो की खाली हाथ ऊपर करना भी सजा होती है। खैर वो बच्चा उन बच्चों को रुक रुक कर देख रहा था जो लुटाए गए रूपए लूट रहे थे। मुझे उस बच्चे पर कुछ दया आई, और मैं उस बच्चे को कुछ रूपए देने के लिए आगे बड़ा।
मैं उसके पास पहुचने वाला था की भीड़ में से एक रूपए लूटने वाला बच्चा उस बच्चे के पास आया, बच्चे के सर पर रखी लाईट भीड़ में से आये नए बच्चे ने अपने सर पर ले ली और जिस बच्चे को मैं दया से देख रहा था वो मुस्कुराते हुए भीड़ में रूपए लूटने चला गया। अब रूपए लूटने की बारी उसकी थी।

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