मथुरा स्टेशन पर ट्रेन में पेठा बेचने वाला आवाज लगा रहा था। आगरा का पेठा ...आगरा का पेठा..... इस आवाज को सुन हमारे केबिन में बैठा एक नौजवान हैरान होने लगा। और हैरत भरी कुछ अजीब सी नज़रो से पेठा बेचने वाले को केबिन के साइड से झाँक कर देखने लगा। बाकी किसी यात्री को चलती ट्रेन में किसी प्राइवेट आदमी के पेठा बेचने पर कोई हैरानी नहीं थी। क्यूंकि मथुरा आगरा के पास ट्रेन में बाहर के लोग पेठा बेचने आते ही हैं। पर ये नौजवान बहुत हैरान भी था और कुछ परेशान भी। फिर भी हम में से कोई भी ये नहीं सोच रहा था की कही इसकी परेशानी सिर्फ इस बात से तो नहीं होगी ,की सरकारी ट्रेन में ये प्राइवेट आदमी किसकी परमिशन से पेठा बेच रहा है? ऐसा सवाल तो मन की गहराइयो में तभी दफ़न हो जाता है की जब हम किसी गुमनाम कंपनी की पानी की बोतल किसी गरीब मजदूर बच्चे से बीस रूपए में खरीदते हैं।
खैर जैसे ही पेठा बेचने वाला हमारे केबिन पर आया। नौजवान उसे देख गुस्से में बोला ,कौन है तू,कहाँ से आया है?
पेठे वाला- क्यों तुझे क्या?
नौजवान-तेरा मालिक कौन है,किसके यहाँ का पेठा है?
पेठे वाला-तुझे क्या मतलब है भाई? बढ़िया पेठा है|
नौजवान- ....... नाम क्या है बे तेरा , तेरी बात कराता हूँ अभी यादव जी से।
पेठे वाला- कौन यादव जी।
नौजवान- आर पी ऍफ़ वाले यादव जी।
पेठे वाला- कर ले जिसे फ़ोन करना है। विजय नाम है मेरा ... संजय जी के यहाँ से पेठा आया है।
नौजवान यादव जी को फ़ोन करता है।
नौजवान- साहब ये जम्मू मेल में संजय के यहाँ का पेठा बिक रहा है। कोई विजय लड़का बेच रहा है बात करो जरा इससे।
यादव जी ने उधर से कुछ कहा होगा ।
नौजवान- पर साहब ये वेस्टर्न लाइन की ट्रेन है। और निजामुद्दीन भी जायेगी।
खैर जैसे ही पेठा बेचने वाला हमारे केबिन पर आया। नौजवान उसे देख गुस्से में बोला ,कौन है तू,कहाँ से आया है?
पेठे वाला- क्यों तुझे क्या?
नौजवान-तेरा मालिक कौन है,किसके यहाँ का पेठा है?
पेठे वाला-तुझे क्या मतलब है भाई? बढ़िया पेठा है|
नौजवान- ....... नाम क्या है बे तेरा , तेरी बात कराता हूँ अभी यादव जी से।
पेठे वाला- कौन यादव जी।
नौजवान- आर पी ऍफ़ वाले यादव जी।
पेठे वाला- कर ले जिसे फ़ोन करना है। विजय नाम है मेरा ... संजय जी के यहाँ से पेठा आया है।
नौजवान यादव जी को फ़ोन करता है।
नौजवान- साहब ये जम्मू मेल में संजय के यहाँ का पेठा बिक रहा है। कोई विजय लड़का बेच रहा है बात करो जरा इससे।
यादव जी ने उधर से कुछ कहा होगा ।
नौजवान- पर साहब ये वेस्टर्न लाइन की ट्रेन है। और निजामुद्दीन भी जायेगी।
फिर यादव जी ने उधर से कुछ कहा होगा और फ़ोन रख दिया गया। अब पेठा बेचने वाले का सीना और चौड़ा हो गया।
पेठा बेचने वाला- क्यों हो गयी तसल्ली। क्या कहा यादव जी ने............ वो क्या कहेगा ........रोज के हमारे 1500 रूपए जाते हैं थाने में, संजय साहब के माल को ट्रेन में कोई नहीं रोकता । तू कहाँ से आया रोकने|
अब नौजवान कुछ नरम और अचरज में पड़ा। फिर बोला माफ़ करो भाई हमारी तुमसे लड़ाई नहीं है पर यहाँ दो ही लाइन है। ईस्टर्न लाइन और वेस्टर्न लाइन , ईस्टर्न लाइन पर पेठे का काम शर्मा जी के पास है और वेस्टर्न लाइन के लिए हमारे यहाँ से भी रोज 1000 रूपए यादव जी के यहाँ जाते है आगे थाने में देने के लिए। मैं ही रोज शाम पेठे बेचने आता हूँ। आज काम से दिल्ली जाना था। तुम अभी बेच लो ...हमारे लोग बात कर लेंगे थाने में ।
कुछ सोचते सोचते पेठा बेचने वाला भी आगे चला गया |
कहानी के नाम झूठे हैं पर सभी जानते हैं की कहानी ऐसी हज़ारो कहानियो की तरह ही झूठी नहीं ,इतने छोटे छोटे करप्शन भी हमारी व्यवश्था का अटूट हिस्सा हैं , जहाँ करप्शन करने वाले सौ , हज़ार रूपए को अपना अधिकार ही समझते हैं ! .... सिस्टम में जब सौ हज़ार रूपए के लालची लोगो की भीड़ हो तो ला एंड आर्डर सही होने की उम्मीद ही बेईमानी लगती है !
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