Tuesday, December 24, 2013

आप-की सरकार

आप-की सरकार
हम सभी को हर बात में जज बनने  की आदत है ,हम हर तथ्य का जवाब अच्छे या बुरे में ,सही या गलत में तलाश ही लेते  हैं , केजरीवाल जी के साथ भी ऐसा ही है कुछ को वो गलत लगेंगे और कुछ को सही , कुछ को अच्छे और कुछ को बुरे ... पर अगर हम अच्छे और बुरे को जरा दूर  रखें तो कुछ ऐसी बातें भी हैं जिन्हें कोई झुठला नहीं सकता , मसलन आम आदमी पार्टी ने बर्षो से एक व्यवश्था में आंख बंद कर कर जिए चले जा रहे समाज  को सोचने का पर मजबूर किया  हैं , हमने वी आई पी कल्चर को अपने समाज का अभिन्न अंग मान लिया था और हर कोई ये स्वीकारता ही था की बोस इस ऑलवेज राईट . पर आज एक आम आदमी पार्टी आई है जो ये कह रही है की नहीं आदेश सिर्फ ऊपर से नहीं नीचे से भी आ सकता है , सिर्फ बॉस ही नहीं जनता भी अपने फैसले कर सकती है ...हम सभी ये माने ही हुए  थे की पी एम्, सी एम् , एम् पी ये  सब बड़े लोग हैं ,इनका भजन करो ,इनके आगे पीछे घुमो , और इनसे डरो भी, इन्हें वोट भी करो  ..इनकी जितनी चापलूसी करोगे उतने  फायदे में रहोगे ... पर सालो के बाद एक केजरीवाल साहब आये हैं जो कह रहे हैं की नहीं चापलूसी मत करो बल्कि सही व्यक्ति को चुनो जो सरकार चलाने को किसी सम्राट के राज चलाने  जैसा न समझ कर जनता की सेवा माने , अगर तुम्हे लगता है की कोई ऐसा नहीं है जो जनता की सेवा करना चाहता है तो खुद आगे आओ ...केजरीवाल ने सबसे अधिक आम आदमी की चुनाव लड़ने का मौका दिया है ..केजरीवाल सोते लोगो को  जगाने की कोशिश तो कर ही रहा है वो हमे सोचने पर मजबूर भी कर रहा है की नहीं जैसा हम सोचते है की कुछ नहीं हो सकता ..ऐसा ही होता आया है ऐसा ही होगा ,ये सब गलत है ..... वर्षो से चले आ रहे समाज  के नियम समाज के द्वारा बदले भी जा सकते हैं ..केजरीवाल के लाल बत्ती और सी एम् बंगला ठुकरा देने के बाद अब दुसरे मुख्यमंत्री भी अपनी कारो का  काफिला और बड़ा करने में कतरायेंगे , अब वो भी अपने हर छोटे बड़े मंत्री को बड़े बड़े बंगले और नौकर  चाकर देने में कुछ तो परहेज करंगे ही....यहीं से बदलाव सकता है , दिल्ली से.......

कुछ लोग कहते रहेंगे की आप ने कांग्रेस से समर्थन लेकर ये साबित कर दिया है की वो सत्ता की भूखे हैं पर ये वो ही लोग सोच सकते हैं जो सरकार को राज चलाने और दबंगई करने जैसा समझते हैं न की जनता की सेवा जैसा क्यूंकि जनता की सेवा का मौका तो यमराज से भी मिले तो क्या बुरा है हाँ दबंगई का मौका इन्द्रदेव भी दे तो मना कर देना चाहिए ....

भविष्य में पता नहीं क्या हो पर केजरीवाल जो सवाल उठा रहे हैं वो अच्छे हैं !

Friday, November 15, 2013

उसकी मर्जी...

आप कितने ही निर्बल, कितने ही दया के पात्र या मालिक के कितने ही प्रेम प्राप्त क्यूं न हो आपकी मदद तभी तक की जा सकती है की जब तक आप खुद मदद में सहयोग करने को राजी हैं। एक छोटा से सा बच्चा है जो जमीन पर खेलना चाहता है, हम जानते हैं की जमीन बहुत ठंडी है और बीमार हो जाना निश्चित है। आप दो ,चार , दस बार बच्चे को बिस्तर पर बिठाएंगे,पर अगर वो बिना जमीन तक पहुचे रोता ही रहे तो एक समय आ ही जाता है की आपका भी दिल कहता है की जाओ रहो जमीन पर ही । बच्चा नहीं जानता था क्या सही क्या गलत,वो ये भी नहीं जानता की उसका भला कहाँ पर है ,बिस्तर पर या जमीन पर ,पर फिर भी उसे जमीन ही अच्छी लग रही है, उसे पाने के लिए मिन्नतें कर रहा है,हर कोशिश कर रहा है ,उसके रोने से लगता है की मानो उसके साथ बड़ा अनयाय किया जा रहा हो।
शायद हम भी ऐसे ही करते हैं परम पिता के साथ,हमे नहीं पता की हमारा किसमे भला है और किसमे बुरा फिर भी मांगे चले जाते हैं ,मिन्नतें जारी हैं, भगवान् से मांग मांग कर किसी कॉलेज में एडमिशन पाते हैं फिर पता चलता है की अरे यहाँ तो अच्छी जॉब ही नहीं मिलती,,,फिर मांग मांग कर कोई नौकरी पाते हैं,और पता लगता हैं की यहाँ तो हमारे काम करने का कोई माहौल ही नहीं हैं....असल में ये सारी मांगे उस बच्चे के जमीन पर खेलने की मांगो जैसी ही हैं, अधूरे ज्ञान वाली मांगे। अब जमीन पर खेलने की जिद करेंगे तो खिलाने वाले का दोष कहाँ , हाँ अगर खुद को खिलाने वाले की मर्जी से चलने देते तो निश्चित ही किसी आराम भरे बिसतर पर होते।
बच्चे का पिता भी चाहता है की बच्चा आराम से ऊपर खेले ,जिसके लिए उसने कई खिलौनो के इंतजाम ऊपर कर रखे हैं, कई खाने पीने की चीज़े भी हैं जो ठंडी जमीन पर नहीं मिलेंगी ,बच्चे को खिलौने के इशारे भी किये जा रहे हैं,खाने की चीज़े दिखाई जा रही हैं, कई बार बच्चे को उठाकर ऊपर भी रख दिया गया हैं। फिर भी अगर बच्चा ठंडी जमीन में ही सुख की अनुभूती लेना चाहे और कई प्रयासों के बाद भी खुद को जमीन से हुए बेवजह प्रेम को तोड़ने में कोई सहयोग न करे तो शायद बच्चे को जमीन पर ही छोड़ दिया जायेगा। हम भी जब ये जान ही जाते हैं की हम शायद अपने हिसाब से किसी गलत आदत,या गलत नौकरी में फस गए है,पर खुद ही उसका आनंद भी लें ,और हमारी आत्मा को जगाने या सही मार्ग दिखाने वाले परमात्मा के इशारो को नज़रंदाज़ करते रहे ,और नए रास्ते पर चलने की खुद से कोई इमानदार कोशिश या पहल न करें तो निश्चित ही हम भी छोड़ दिए जायेंगे उसी दलदल में जहाँ की हम स्वेच्छा से पहुचे हैं।
पिता हो या परमपिता दोनों की ही मदद पाने के लिए  पहले खुद से सहयोग देना ही होगा ,अगर आप ठंडी जमीन में ही नशा महसूस करते रहेंगे तो परम पिता आपको कब तक बचा बचा कर बिस्तर पर रखेगा, हाँ वो फिर भी करेगा इशारे अच्छे अच्छे खिलोने के ,पर वो भी कुछ समय तक....

Thursday, November 7, 2013

दंगे

शायद अभी ये उम्मीद करना बेईमानी है की हम कभी ऐसी समझ भी पैदा कर पाएंगे की अगर पंडित जी की तबियत ख़राब हो तो हम पड़ोस के मौलवी साहब से ही पूजा करवा लें, अगर मस्जिद बहुत दूर हो और बाइक में पेट्रोल कम , तो पड़ोस के मंदिर में ही नमाज पढ़ लें ! मंदिर की धर्मशाला के हॉल में निकाह पड़ने की भी आजादी हो और मदरसे के आँगन में पड़ोस के हिन्दू बच्चे भी आकर खेलें !
फिर भी इतना तो चाहा ही जा सकता है की दोनों तरफ के धार्मिक लोग परस्पर विवाद न करके , मिलकर मानवता के कठिन सवालो का जवाब ढूंढें , जैसे की जो लोग तथाकथिक धार्मिक दंगो में मारे गए, जिनका घर,व्यवसाय सब जला दिया गया उन्होंने इश्वर का क्या बिगाड़ा था , जिन लोगो ने दंगे करवाए और फिर भी बच गए और सत्ता सुख भोग रहे हैं इश्वर की उनपर ये कृपा क्यूं हैं ?
हर धर्म के जानने वाले आगे आएं और मिलकर समझाएं की क्यूं किसी निर्भया को इतना असहनीय दर्द झेलना पड़ा , क्यूं उसका अपराधी सिर्फ तीन साल की सजा काट कर छोड़ दिया जाएगा, क्यूं केदारनाथ में धर्म की तलाश में गए लोगो को मौत मिली आदि-आदि ....,
जरूरत है की हम विचारो के मेलजोल से धर्मों को समृद्ध करें ! वरना दंगो में सिर्फ लोग ही नहीं मरते धर्म भी मरता है !

आपसी समझ वाला भ्रष्टाचार।

एक बहुत बहुत बड़ा मंदिर,मंदिर के बाहर दूर तक दर्शन के लिए बहुत बहुत लम्बी कतार, मंदिर में कई पुजारी।
मंदिर के दरवाजे पर एक पुजारी खड़ा होकर बस लाइन को देख रहा है, इस उम्मीद में की कोई भक्त आये और जल्दी दर्शन करवाने के लिए कुछ दक्षिणा दे दे। साथ ही उसके मन में ये ख्याल भी है की वो और पुजारियो जैसा भ्रष्ट नहीं, वो खुद ही किसी भक्त के पास नहीं जाता,वो खुद तो किसी को रूपए देने के लिए मजबूर नहीं करता,पर कोई भक्त खुद ही आकर दक्षिणा दे रहा है तो इसमें तो कुछ आपतिजनक नहीं,फिर कुछ भक्त तो सचमुच जल्दी में हो सकते है कुछ के पास सचमुच समय की कोई मजबूरी हो सकती है, वो ऐसे भक्तो की मदद भी तो कर रहा है।

वही कतार में एक भक्त खुद चल कर उस पुजारी के पास आता है और जल्दी दर्शन के बदले कुछ दक्षिणा का सौदा पुजारी से तय करता है। अब ये भक्त भी विचार कर रहा है की वो दुसरे कुछ भक्तो की तरह गैरकानूनी नहीं की अपने रसूख या रिश्तेदारों के रसूख का इस्तेमाल कर नियम तोड़े , फिर वो और भक्तो जैसा भ्रष्ट भी नहीं की किसी पंडित से जबरदस्ती करे या किसी पंडित को उसकी मर्जी के खिलाफ गलत करने पर मजबूर करे,उसने तो पंडित जी से व्यवस्था के बारे में पुछा है अगर पंडित जी न कर देते तो वो भी कतार में खड़ा रहता, अरे वो तो भ्रष्टाचार के खिलाफ है इसीलिये तो उसने उस किसी पुजारी से बात भी नहीं की जो भक्तो के पास अपने आप दक्षिणा के बदले जल्दी दर्शन का प्रस्ताव लिए घूम रहे थे,उसने तो अपनी समझ से ऐसा ईमानदार पुजारी ढूँढा है जो अकेला दरवाजे पर खड़ा था।

ऐसा ही हो गया है भारत का अधिकतर भ्रष्टाचार ,- आपसी समझ वाला भ्रष्टाचार।

Saturday, August 24, 2013

रेप !



रेप !
विदेश में शिक्षित भारत के पहले कानून मंत्री बाबा साहब अम्बेडकर और देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरु की नई और स्वच्छ सोच का धन्यवाद् की अधिकतर जनसँख्या  पुरानी पुरुषवादी विचारधारा की  होने के बावजूद  भी भारत के कानून में स्त्री और पुरुषो को सामान कानूनी अधिकार मिल सके | पर भारत जैसे , कानूनी रूप से स्त्री और पुरुष को सामान अधिकार देने वाले देश में हर घंटे २ से अधिक बलात्कार हो रहे हैं  |  क्या  कानूनी बदलाव कोई भी सामाजिक बदलाव लाने में असमर्थ रहा ?

क्यूं दहेज़ के खिलाफ सबसे कठोर कानून होने पर भी दहेज़ प्रथा नहीं  हट सकी  और क्यूं कानूनी रूप से पिता की संपत्ति में बेटी और बेटे को सामान अधिकार होने पर भी  सम्पति सिर्फ बेटों में ही बांटी जाती रही  है ? क्या कानून गलत है या उसे निभाने वाले लोग ?

देश में हर २२ मिनट में  कोई एक बलात्कार हो रहा है और हर दो चार महीने में कोई ऐसी  रेप की घटना भी होती है जो मीडिया की नज़र में  खबर बनने के काबिल  होती है , हर समाचार चैनल घटना के बारे में घंटों के प्रोग्राम चलाता है, पुलिस पर सवाल उठाये जाते हैं , नेताओं को भी चर्चा के कटघरे में लिया जाता है, देश के बड़े विचारक लम्बी चर्चाएँ  करते हैं , इन लम्बी चर्चाओं में जब कोई रूडिवादी विचारक ,अपनी पुरानी समझी  जाने वाली सोच से महिलाओं को तन ढकने वाले कपडे पहनने या देर रात को घर से न निकलने या डांस बार्स में न जाने जैसी  सलाहे  देता है तो सभी चैनलों के नयी सोच वाले  विचारक एकमत  से  उसकी इस सोच को ही  महिलाओं की  बदहाली  का कसूरवार सिद्ध कर देते हैं | 
अब पता नहीं कौन सही कौन गलत क्यूंकि क्या होना चाहिए इसका उत्तर बहुत  आसान होता है और क्या किया जा  सकता है इसका उत्तर बहुत कठिन !

होना चाहिए की हर किसी को अपनी पसंद के कपडे पहने की आजादी हो , होना चाहिए की हर किसी को किसी भी समय निर्भय घर से निकलने की आजादी हो , होना चाहिए की हर किसी को  अपनी पसंद की जगह अकेले जाने की आजादी हो फिर चाहे वो डांस बार्स हों या समुद्र का किनारा | इस तरह   समाचार चैनलो  के कार्यक्रम इस विचार के साथ ख़त्म हो जाते हैं की देश की सोच बदलनी होगी “..

और  इस दिशा में भारत ने कितने कदम बढायें  हैं ये ऐसे पता चलता है की "गूगल ट्रेंड्स" द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार sex शब्द गूगल सर्च करने वाले दुनिया के टॉप 10 शहरों  में से 7 भारत से  हैं , और टॉप 5 में से 5 | चिकनी चमेली और जलेबी बाई   जैसे गाने जनता द्वारा इतने पसंद किये जाते है की इन्हें फिल्म की सफलता के लिए जरूरी माना जाता है , यहाँ 50 उम्र पार कर चुके अधेड़ सरकारी अधिकारी भी अपने केबिन को बंद कर पोर्न देखते पाए जाते हैं ,पार्लियामेंट चलती रहती है और एम् ल ऐ साहब मोबाइल पोर्न में व्यस्त रहते हैं, 4 - 5 बच्चो के पिता भी यहाँ बलात्कार करने वालों में होते हैं  और ५-६  साल की बच्चियों को भी हवस  का शिकार बनाया जाता है,  इन सब बातो से जाहिर  है की , India is a mentally ill  &  sexually unsatisfied country!
देश की इस बीमारी का इलाज़ किये बिना रेप को को देश से ख़त्म करना  मुश्किल होगा, वैसे भी  ये एक ऐसा देश है  जहाँ आदमी अकेले मैं कुछ है और भीड़ मैं कुछ और ,अँधेरे  में कुछ है और उजाले में कुछ और , कमरे में कुछ है और बाहर  कुछ और, एक के साथ कुछ है और दुसरे के साथ कुछ और........

Wednesday, July 31, 2013

हड़ताल



हड़ताल

९ दिन गुजर चुके हैं की ऑफिस नहीं गया, नहीं बीमार नहीं हूँ और  न ही घर में किसी कार्यक्रम का आयोजन है, ये दोनों ही कारण किसी भी  संश्था के १२००० कर्मचारियों के एक साथ काम से गायब हो जाने की  की वजह नहीं बन सकते |  यहाँ तो बहुत साधारण सा कारण है हड़ताल “, साधारण सा इसलिए कहा क्यूंकि हर सरकारी संस्था में आए दिन कोई न कोई यूनियन हड़ताल की धमकी देती रहती है , और अधिकांशतः हड़ताल की तिथि आने से एक दो दिन पहले ही सारी मांगे मंजूर हो जाती हैं | अब पता नहीं , हो सकता है की यूनियन को पहले से ही पता होता हो की इस बार  मांगे पूरी होने ही वाली हैं , इसीलिये बिना मौका गवाए अपने खाते में एक और उपलब्धि जोड़ने के लिए हड़ताल का नोटिस मेनेजमेंट को थमा  दिया जाता हो | पर इस बार ऐसा नहीं हुआ ,मेरे कैडर  के १२००० लोग एक साथ काम छोड़ कर चले गए हैं और मेनेजमेंट ने अभी तक तो ऐसा ही  दिखाया है की जैसे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता , इस बार वो नहीं झुकेंगे, इस बार वो दिखा देंगे की वो एक मजबूत मैनेजमेंट हैं जो किसी दवाब में नहीं आता |
सही है मेनेजमेंट ऐसी ही होनी चाहिए ,बिना किसी दवाब में निष्पक्ष निर्णय लेने वाला , पर चुनाव करने वाली मेनेजमेंट नहीं होनी चाहिए की एक यूनियन की बात सुनेगे दुसरे की नहीं सुनेगे , ५०००० लोग दवाब बनायेंगे तो सुनेगे, १२००० में अभी संख्या कम है इतनी संख्या की सही बात भी  नहीं सुनेगे | वैसे अगर एक पारदर्शी तरीके से काम करने वाली मेनेजमेंट हो तो यूनियन की आवश्यकता ही न पड़े ,पर यहाँ किसी जरूरतमंद की ट्रान्सफर  एप्लीकेशन को सिर्फ यह कह कर फ़ाइल में लगाने से भी मना  कर  दिया जाता है की स्टाफ बहुत कम है इसीलिये बड़े साहब ने ट्रान्सफर फाइल मूव करने से मना  किया है और उन्ही बड़े साहब के  हस्ताक्षर  से ही हर हफ्ते किसी न किसी ऊंची जान पहचान वाले का ट्रान्सफर होता ही है.....यहाँ किसी की पे रिविजन  के बाद कम कर दी गयी तनख्वाह को सही करने की मांग को ९ दिन की हड़ताल के बाद भी नहीं सुना जाता और किसी की पहले से ही बड़ी हुई तनखाह को और बडाने की मांग बिना हड़ताल शुरू हुए ही पूरी कर दी  जाती है !
ये भी एक हस्याद्पद सी  बात है , की यहाँ  हड़ताल भी आधिकारिक और गैर आधिकारिक होती हैं ..कहते हैं की हमारा काम पर न जाना गैर कानूनी यानि इल्लीगल है , यहाँ ऐसी विधियाँ  भी हैं जिनसे  काम पर न जाने को भी अधिकारिक बनाया जा सकता है जिनका इस्तेमाल हमारी यूनियन प्रायः नहीं करती |  शायद  इसलिए भी क्यूंकि हमारी यूनियन में सिर्फ वो युवा हैं जिन्होंने पिछले दशक में ही संश्था का दामन  थामा  है , और युवा नियम से ज्यादा सच्चाई  की ताकत में भरोषा रखते हैं और बातो को घुमा फिरा कर कहने सुनने की बजाय  सीधा और तर्कसंगत कहते हैं , अगर आप को लगता है की आपकी मांग वाजिब  है आप एक न्याय पूर्ण अधिकार के लिए जंग कर रहे हैं तो मौके पर मैदान से  बचाकर निकाल  लेने वाले नियमो का इन्तजाम क्यूं किया जाए ?
यूनियन के नेताओं को मैं कभी नहीं समझ पाया , सोचने  सी  बात हैं इतनी ऊर्जा और समय ये यूनियन के लिए क्यूं देते हैं इससे इनका क्या लाभ, आखिर अगर यूनियन का सघर्ष सफल होता हैं तो इसका उन्हें कोई अलग से विशेष लाभ तो होता  नहीं , आखिर कोई भी सदस्य  अपने बड़े  हुए वेतनमान में से कोई भी हिस्सा यूनियन के नेता जी के नाम तो करेगा  नहीं और न ही पूरे  देश भर में  में बटें हुए १२-१५००० लोगो में  लोक प्रिय हो जाने से उनके ऍम एल ए  या एम् पी बनने  का रास्ता खुलता है ,और एक तरह से सोचो तो पुण्य भी शायद कम ही मिलता हो क्यूंकि उतराखंड की बाड़  में फसे लोगो , या कुछ अनाथ गरीब बच्चो की मदद करना अलग बात है, यहाँ तो वो ऐसे लोगो की मदद कर रहे हैं की जो पहले से ही अच्छा खा पी  रहे हैं , हाँ हो सकता हैं कुछ अन्याय उनके साथ हो रहा हो पर ये अन्याय उस अन्याय के सामने कुछ भी नहीं जो गरीबो के साथ अस्पतालों में या त्रासदी में फसे लोगो के साथ केदारनाथ में होता हैं, ऐसे जरूरत मंद लोगो की मदद में अपनी उर्जा लगात्ते  तो भी मैं  समझ पाता पर अपने साथ काम करने वालो के लिए  अपना सारा तन मन धन देना वो भी तब जब उन्ही में से कुछ लोग उनकी निंदा करने का कोई मौका न छोड़ते हो ,ये यूनियन के नेता लोग मेरी समझ के परे हैं ! हाँ इतना जरूर समझता हूँ की अगर कोई अपने इस लोक और दुसरे लोक  दोनों में हे कोई लाभ  न होने पर भी मेरी मदद के लिए आगे खड़ा है तो एक मायने में वो मुझे  अपना कर्जदार तो बना ही देता है | और इस कर्ज को बिना कुछ दिए भोगना भी नैतिक नहीं कहा जा सकता  |
समझ में ये भी नहीं आता की वो १ प्रतिशत लोग सही होते हैं या गलत जो अपने ९९ प्रतिशत साथियों के  हड़ताल पर जाने के बाद भी काम करते रहते है और संश्था को अपनी सेवाएं देते रहते है , कभी लगता है की यही लोग सही है, सही ही नहीं ये सचमुच संत हैं , क्य्योंकी जिस संश्था का नमक खाते हैं उसका नुकसान नहीं होने देते , और किसी से कुछ मांगते नहीं, जो भगवान ने दिया है उसी में  संतुष्ट रहते हैं,सिर्फ अपना कर्म करते रहे , कुछ असंतोष नहीं है जो मिला, जितना मिला उतने में खुश रहे , कुछ भी तो गलत नहीं है हड़ताल पर न जाने में ! और लाभ ये है की अगर कहीं यूनियन का संघर्ष विफल हुआ तो हड़ताल पर न जाने वालों को  किसी भी  विपरीत परिणाम को नहीं झेलना पड़ेगा |
पर ये भी समझना होगा की जिस तरह संश्था से हर माह  तनख्वाह लेने पर हम संस्था के  कर्जदार हो जाते है और जिस वजह से हमारी  संश्था को नुकसान पहुचाने  की कोई भी कोशिश  अनैतिक हो जाती  है , उसी तरह यूनियन के सघर्ष में बिना शामिल हुए संघर्ष से मिलने वाले लाभ को भोगने से भी तो हम यूनियन के कर्ज़दार हो ही जाते है , फिर क्या संघर्ष के बाद वेतनमान बदने पर हड़ताल पर न जाने वाले ये कह पाएंगे की क्यूंकि मैं इस संघर्ष का हिस्सा नहीं था इसलिए मुझे इस लाभ का हिस्सा भी नहीं बनना मुझे मेरा पुराना वेतनमान ही चाहिए | फिर हड़ताल पर न जाने वाले न चाहते हुए भी यूनियन का नुक्सान तो करते ही हैं हो सकता है की वो चाहते हो की उन्हें यूनियन से कोई मतलब नहीं ,वो न यूनियन का लाभ चाहते हैं और न ही नुक्सान ..पर उनके ऐसा कहने के बावजूद यूनियन का नुक्सान तो होता ही है ,आखिर यूनियन का अर्थ ही संख्या बल  और संश्था के समस्त कार्यों  को रोक देने की ताकत है जिसमे हड़ताल पर न जाने वाले  न चाहते हुए भी बाधा बनते हैं , अच्छा हो की कोई ऐसा तरीका हो की जिसे संश्था से अपनी  नैतिक  जिम्मेदारी  निभानी है उसके लिए हड़ताल  के बाद कुछ दिन ओवरटाइम का प्रावधान भी  हो !




Tuesday, June 18, 2013

केदारनाथ के पहलू !

केदारनाथ के पहलू !
मानव की इच्छाओं का अम्बार बहुत अधिक है और जरूरतों की संख्या असीमित ! केदारनाथ में  इतने लोगो की मौत भी वहां जाने वाले की संख्या कम नहीं कर पायेगी | जाते रहेंगे लोग वहां कुछ न कुछ मांगने | मांगते रहो ,मांगते रहो, और जब मिल जाये तो बदले मैं भगवान से जो  देना तय किया था वो दे दो , समाज मैं लेन देन  करते करते हमें विश्वाश हो चला है कि भगवान  भी कोई लेन देन  करने वाला ही है जहाँ जितना ज्यादा देंगे  उतना ज्यादा मिलेगा | भारत देश का छात्र भी भगवान से इतना भ्रष्टाचार करने में कुछ असहज महसूस नही करता कि  , जब परीक्षा की तय्यारी  पूरी मेहनत से न की हो और फिर भी अच्छा  परिणाम चाहिए तो भगवान ५ रुपये के प्रसाद और ५ मंगलवार की हाजरी के बदले अच्छा परिणाम दिला सकते है | यही प्रसाद  देना  और जी हजूरी अगर शिक्षक के साथ की जाती तो भ्रष्टाचार और भगवान के साथ की गयी तो भक्ति | क्या भगवान ऐसा है , भ्रष्ट  अद्ध्यापक जैसा जो मिठाई के डिब्बे के बदले किसी भी छात्र को पास करवा  दे ?
समाज के बड़े लोगो द्वारा सिर्फ उनके जानने-मानने वाले  लोगो की मदद किये जाते देख   हमें ये भी लगने लगा है की ,भगवान भी पक्षपाती  ही होगा  ,मतलब कि  जो लोग  भगवान  के दरबार मैं माथा टेकने जायेंगे उन पर भगवान की अलग से  कृपा होगी,  और  भगवान  के दरबार में माथा नहीं टेकने वाले व्यक्ति को अपनी इमानदार मेहनत का उचित फल दिलवाने  में भी भगवान कोई विशेष सहयोग नहीं करेंगे |   क्या भगवान ऐसा है, यू पी के किसी  नेता जी जैसा , सिर्फ अपने वोट बैंक की चिंता करने वाला  ?
मांगते रहो मागते रहो और जब जो माँगा था वो न मिले तब ,  तब क्या करें ? मान लो तुम्हारी भक्ति में कमी थी और भगवान पर कोई सवाल खड़ा न करो , मत पूछो की भगवान हैं भी या नहीं क्यूंकि भगवान नाराज हो सकते हैं , कुछ गलत न कहो कुछ  गलत न करो , भगवान से डरो , भगवान से डरो| , ...समाज में उच्च पदों पर आसीन लोगो के व्यवहार को देख कर हम ये भी सीख गये  हैं की भगवान कोई डराने वाला ही होगा  , जिसे  खुश रखने के लिए हमेशा प्रयासरत रहना  चाहिए, जैसे भगवान भी बदला लेता हो, भगवान भी लोगो को डराने और सजा देने में आनंद  पाता हो | क्या भगवान ऐसा  है सरकारी  संश्था के निदेशक जैसा ,सबको डराकर  अपनी इज्जत करवाने  वाला ?
किसकी लाशें हैं जो बिछी है केदारनाथ के मंदिर मैं, भगवान से मिलने आये प्रेमियों की या इच्छाओं और सांसारिक मांग से भरे भिखारिओं की | कहां पड़ी हैं ये लाशें किसी निरंकार अनदेखे  अप्रत्यक्ष असीमित बल और आनंद देने  वाले परमात्मा के दरबार में , या महज़ ईट पत्थर की चारदीवारी मे ! अगर मरने वाले भगवान के प्रेमी थे और  प्रेमी के रूप में ही  मिलने आये थे, पर  भगवान के स्थान पर म्रत्यु  मिली तो भी कोई शिकायत न करेंगे क्यूंकि प्रेम तो हिसाब किताब रखता ही नहीं , बस देता ही चला जाता है , जाओ दे दी जान अपने प्रेमी के लिए ,अगर  प्रेमी कहीं है तो उनका  जीवन स्वीकार करे और प्रेमी कहीं है ही नहीं तो सारा जीवन ही व्यर्थ है किसके लिए जियें ? 
हाँ अगर मरने वाले ख्वाइशों का कटोरा लेकर भगवान से कुछ बहुत मांगने  आये थे, तब मांगने आये थे सांसारिक चीज़ और मिली मौत तो बड़ी कठिनाई हो गयी, अब भगवान हो भी तो वो सांसारिक चीज़े किसे देगा ? जिस शरीर से सांसारिक चीजों को भोगते वो तो अब रहा ही नहीं |, और भगवान नहीं है और वो सिर्फ साधारण चारदीवारी के बीच कुछ मांगते मांगते मर गए तो भी तो वो ही गलत रहे , इतनी उर्जा मांगने  के स्थान पर इच्छित वस्तु को अर्जित करने में लगाते तो अच्छा होता |
पर  कठिन सवाल ये हैं  की  क्या मरने वाले भगवान के दरबार में भगवान की मौजूदगी मैं भगवान के द्वारा ही मारे  गए? क्या उनके मरने में भगवान का हाथ है?  नहीं भी है तो भगवान ने अपने दरबार में  ऐसा होने ही कैसे दिया ?क्य्यों  उसने अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर उन लोगो को बचाया नहीं ?, क्य्यों सबके  सामने अपनी महानता सिद्ध करने का एक अवसर जाने दिया और लोगो को मरने दिया?... इन सब सवालो का  एक ही जवाब है अभी हमारे पास    पता नहीं

Sunday, June 16, 2013

कार्य और सरकारी संस्था


सरकारी संस्था में आज भी रोजाना कर्मचारी  अपनी आधी से अधिक  उर्जा सिर्फ ये समझाने में खर्च कर देते है कि जो काम उन्हें कहा जा रहा है वो असल में उनका नहीं है ! किसी भी नए काम की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेना अपने पैर  पर कुल्हाड़ी मारने के सामान समझा जाता है , क्यूंकि आप एक बार जोश में किसी नए  काम को करेंगे और अगली बार आपके ही  सभी साथी चिल्ला चिल्ला कर कहेंगे कि ये आपका  ही काम है | इस तरह आपके द्वारा कभी संस्था की भलाई या किसी की मदद के लिए किया गया कोई भी  नया कार्य  आपकी हमेशा की  मजदूरी  बन सकता है |
मेहनत और ईमानदारी से किये गए काम से न  तो पदोन्नति का कोई सम्बन्ध होता है और न ही वेतन में वृद्धि का | बने रहो पगला ,काम करेगा अगला की नीति का अनुशरण करने वाले भी वेतन और पदोन्नति के बराबर  अधिकारी होते हैं  साथ ही  उन्हें अपना स्थानान्तरण करवाने  में भी कोई बेवजह की  कठिनाई नहीं होती | 
ये भी मजाक ही है की पूरी लगन और ईमानदारी से संस्था  के लिए १० साल से भी ज्यादा तक कार्य करने के बाद पदोन्नति मांगने पर संस्था आपसे एक ऐसी  परीक्षा पास करने को कहती है की जिसका आपके द्वारा संस्था  के लिए १० साल तक  किये गए  कार्य से कोई सम्बन्ध नहीं होता, वो परीक्षा काम न करने वाले व्यक्ति के लिए अधिक सुगम हो जाती है क्यूंकि वह अपना सारा मस्तिष्क और समय सिर्फ उस परीक्षा की तय्यारी में ही लागाता  है | 
अधिकतर मैनेजर शभ्य और शालीन होते है, कुछ मैनेजर मेहनती भी होते है पर लगभग सभी  सरकारी मैनेजरों  के पास इतनी ही संभावनाएं होती हैं  कि  वो  सिर्फ उन्ही कर्मचारिओं से ही  काम ले सकते है कि  जो अपने आप से ही काम करते हों | काम करने का इनाम सिर्फ काम और काम न करने की सजा  सिर्फ आराम मिलती हैं |
कर्मचारी खुद से सोचे तो सोच ले पर संस्था कभी नहीं सोचती की कर्मचारी द्वारा लिए गए वेतन और उसके द्वारा किये गए कार्य  की कोई तुलना भी है या नहीं, मसलन इंजीनियर का वेतन लेने वाले बहुत से कर्मचारी  सिर्फ माइक्रोसॉफ्ट वर्ल्ड ,माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल पर पत्र और रिपोर्ट्स टाइप करने का कार्य ही करते है जो की आजकल के  १२वीं दर्जे के छात्र भी आसानी से कर सकते हैं | मजाक यह भी है की माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस को यहाँ ऐसा टेक्निकल कार्य समझा जाता है की जिसके लिए एक इंजिनियर की आवश्यकता होगी ही |
समय पर आना नियम तो  हो गया है और जरूरी भी पर ऐसे लोगो की कमी नहीं है की जो मानते है की सिर्फ समय पर आने और समय पर जाने मात्र से ही  वो नैतिक रूप से अपना पूरा वेतन पाने के अधिकारी हो जाते हैं! ये बहुत आम बात है की ठीक सुबह १०:१५ पर ही लोग सारे काम छोड़ कर लोग ये चर्चा करते पाए जाते हैं की हमारी संस्था फायदे में कैसे आये | कुल मिला कर ज्यादातर कर्मचारी दो तरह के कार्य ही करते हैं एक वो जो सिर्फ सुबह ऑफिस आकर शाम को समय से चले जाने का कार्य करते हैं और दुसरे वो जो ईटें उठाकर रखने जैसा कार्य करते है , कुछ इनोवेटिव, प्रोडक्टिव, फ्रूटफुल कार्य करने वाले  कर्मचारी न के बराबर होते है |
गम ये है कि बहुत उच्च पदों पर बैठे लोग कभी जान ही नहीं पाते  की क्या सही है और क्या गलत क्यूंकि उन्होंने अपने आस पास रहने वालो को अपनी  बात काटने की कोई इज़ाज़त नहीं दी होती ,चाटुकारिता में ही सारा जीवन जीने वाले  उनके नीचे कार्यरत व्यक्ति हमेशा उनके हर कथन से सहमती ही जताते हैं , न खाता न बही जो साहब कहें वही सही |
अलग अलग दर्जे की अलग अलग यूनियन भी  होती हैं | जिनका मूल उद्धेश्य होता हे की किस तरह हमें कम से कम काम करना पड़े और साहब हमारी  किसी भी गलती पर हम से कुछ न कह सकें  तथा  किस तरह हम अधिक से अधिक धन और आराम  संस्था से ले सके | संस्था की भलाई के लिए किसी भी यूनियन द्वारा किया गया कोई भी संघर्ष देखने का अवसर मुझे प्राप्त नहीं हुआ क्यूकी यूनियन तो बनती ही संस्था के खिलाफ है |
फिर भी हर संस्था  में हर दर्जे  पर कुछ प्रतिशत ऐसे लोग होते ही हैं , जो सिर्फ काम करने के लिये काम करते हैं ! कर्म जिनके लिए आनंद है और हमेशा निश्वार्थ है , ऐसे व्यक्तियों के की वजह से ही संश्था में गति बनी रहती है |