Tuesday, December 24, 2013
आप-की सरकार
Friday, November 15, 2013
उसकी मर्जी...
आप कितने ही निर्बल, कितने ही दया के पात्र या मालिक के कितने ही प्रेम प्राप्त क्यूं न हो आपकी मदद तभी तक की जा सकती है की जब तक आप खुद मदद में सहयोग करने को राजी हैं। एक छोटा से सा बच्चा है जो जमीन पर खेलना चाहता है, हम जानते हैं की जमीन बहुत ठंडी है और बीमार हो जाना निश्चित है। आप दो ,चार , दस बार बच्चे को बिस्तर पर बिठाएंगे,पर अगर वो बिना जमीन तक पहुचे रोता ही रहे तो एक समय आ ही जाता है की आपका भी दिल कहता है की जाओ रहो जमीन पर ही । बच्चा नहीं जानता था क्या सही क्या गलत,वो ये भी नहीं जानता की उसका भला कहाँ पर है ,बिस्तर पर या जमीन पर ,पर फिर भी उसे जमीन ही अच्छी लग रही है, उसे पाने के लिए मिन्नतें कर रहा है,हर कोशिश कर रहा है ,उसके रोने से लगता है की मानो उसके साथ बड़ा अनयाय किया जा रहा हो।
शायद हम भी ऐसे ही करते हैं परम पिता के साथ,हमे नहीं पता की हमारा किसमे भला है और किसमे बुरा फिर भी मांगे चले जाते हैं ,मिन्नतें जारी हैं, भगवान् से मांग मांग कर किसी कॉलेज में एडमिशन पाते हैं फिर पता चलता है की अरे यहाँ तो अच्छी जॉब ही नहीं मिलती,,,फिर मांग मांग कर कोई नौकरी पाते हैं,और पता लगता हैं की यहाँ तो हमारे काम करने का कोई माहौल ही नहीं हैं....असल में ये सारी मांगे उस बच्चे के जमीन पर खेलने की मांगो जैसी ही हैं, अधूरे ज्ञान वाली मांगे। अब जमीन पर खेलने की जिद करेंगे तो खिलाने वाले का दोष कहाँ , हाँ अगर खुद को खिलाने वाले की मर्जी से चलने देते तो निश्चित ही किसी आराम भरे बिसतर पर होते।
बच्चे का पिता भी चाहता है की बच्चा आराम से ऊपर खेले ,जिसके लिए उसने कई खिलौनो के इंतजाम ऊपर कर रखे हैं, कई खाने पीने की चीज़े भी हैं जो ठंडी जमीन पर नहीं मिलेंगी ,बच्चे को खिलौने के इशारे भी किये जा रहे हैं,खाने की चीज़े दिखाई जा रही हैं, कई बार बच्चे को उठाकर ऊपर भी रख दिया गया हैं। फिर भी अगर बच्चा ठंडी जमीन में ही सुख की अनुभूती लेना चाहे और कई प्रयासों के बाद भी खुद को जमीन से हुए बेवजह प्रेम को तोड़ने में कोई सहयोग न करे तो शायद बच्चे को जमीन पर ही छोड़ दिया जायेगा। हम भी जब ये जान ही जाते हैं की हम शायद अपने हिसाब से किसी गलत आदत,या गलत नौकरी में फस गए है,पर खुद ही उसका आनंद भी लें ,और हमारी आत्मा को जगाने या सही मार्ग दिखाने वाले परमात्मा के इशारो को नज़रंदाज़ करते रहे ,और नए रास्ते पर चलने की खुद से कोई इमानदार कोशिश या पहल न करें तो निश्चित ही हम भी छोड़ दिए जायेंगे उसी दलदल में जहाँ की हम स्वेच्छा से पहुचे हैं।
पिता हो या परमपिता दोनों की ही मदद पाने के लिए पहले खुद से सहयोग देना ही होगा ,अगर आप ठंडी जमीन में ही नशा महसूस करते रहेंगे तो परम पिता आपको कब तक बचा बचा कर बिस्तर पर रखेगा, हाँ वो फिर भी करेगा इशारे अच्छे अच्छे खिलोने के ,पर वो भी कुछ समय तक....
Thursday, November 7, 2013
दंगे
फिर भी इतना तो चाहा ही जा सकता है की दोनों तरफ के धार्मिक लोग परस्पर विवाद न करके , मिलकर मानवता के कठिन सवालो का जवाब ढूंढें , जैसे की जो लोग तथाकथिक धार्मिक दंगो में मारे गए, जिनका घर,व्यवसाय सब जला दिया गया उन्होंने इश्वर का क्या बिगाड़ा था , जिन लोगो ने दंगे करवाए और फिर भी बच गए और सत्ता सुख भोग रहे हैं इश्वर की उनपर ये कृपा क्यूं हैं ?
हर धर्म के जानने वाले आगे आएं और मिलकर समझाएं की क्यूं किसी निर्भया को इतना असहनीय दर्द झेलना पड़ा , क्यूं उसका अपराधी सिर्फ तीन साल की सजा काट कर छोड़ दिया जाएगा, क्यूं केदारनाथ में धर्म की तलाश में गए लोगो को मौत मिली आदि-आदि ....,
जरूरत है की हम विचारो के मेलजोल से धर्मों को समृद्ध करें ! वरना दंगो में सिर्फ लोग ही नहीं मरते धर्म भी मरता है !
आपसी समझ वाला भ्रष्टाचार।
मंदिर के दरवाजे पर एक पुजारी खड़ा होकर बस लाइन को देख रहा है, इस उम्मीद में की कोई भक्त आये और जल्दी दर्शन करवाने के लिए कुछ दक्षिणा दे दे। साथ ही उसके मन में ये ख्याल भी है की वो और पुजारियो जैसा भ्रष्ट नहीं, वो खुद ही किसी भक्त के पास नहीं जाता,वो खुद तो किसी को रूपए देने के लिए मजबूर नहीं करता,पर कोई भक्त खुद ही आकर दक्षिणा दे रहा है तो इसमें तो कुछ आपतिजनक नहीं,फिर कुछ भक्त तो सचमुच जल्दी में हो सकते है कुछ के पास सचमुच समय की कोई मजबूरी हो सकती है, वो ऐसे भक्तो की मदद भी तो कर रहा है।
वही कतार में एक भक्त खुद चल कर उस पुजारी के पास आता है और जल्दी दर्शन के बदले कुछ दक्षिणा का सौदा पुजारी से तय करता है। अब ये भक्त भी विचार कर रहा है की वो दुसरे कुछ भक्तो की तरह गैरकानूनी नहीं की अपने रसूख या रिश्तेदारों के रसूख का इस्तेमाल कर नियम तोड़े , फिर वो और भक्तो जैसा भ्रष्ट भी नहीं की किसी पंडित से जबरदस्ती करे या किसी पंडित को उसकी मर्जी के खिलाफ गलत करने पर मजबूर करे,उसने तो पंडित जी से व्यवस्था के बारे में पुछा है अगर पंडित जी न कर देते तो वो भी कतार में खड़ा रहता, अरे वो तो भ्रष्टाचार के खिलाफ है इसीलिये तो उसने उस किसी पुजारी से बात भी नहीं की जो भक्तो के पास अपने आप दक्षिणा के बदले जल्दी दर्शन का प्रस्ताव लिए घूम रहे थे,उसने तो अपनी समझ से ऐसा ईमानदार पुजारी ढूँढा है जो अकेला दरवाजे पर खड़ा था।
ऐसा ही हो गया है भारत का अधिकतर भ्रष्टाचार ,- आपसी समझ वाला भ्रष्टाचार।