आप कितने ही निर्बल, कितने ही दया के पात्र या मालिक के कितने ही प्रेम प्राप्त क्यूं न हो आपकी मदद तभी तक की जा सकती है की जब तक आप खुद मदद में सहयोग करने को राजी हैं। एक छोटा से सा बच्चा है जो जमीन पर खेलना चाहता है, हम जानते हैं की जमीन बहुत ठंडी है और बीमार हो जाना निश्चित है। आप दो ,चार , दस बार बच्चे को बिस्तर पर बिठाएंगे,पर अगर वो बिना जमीन तक पहुचे रोता ही रहे तो एक समय आ ही जाता है की आपका भी दिल कहता है की जाओ रहो जमीन पर ही । बच्चा नहीं जानता था क्या सही क्या गलत,वो ये भी नहीं जानता की उसका भला कहाँ पर है ,बिस्तर पर या जमीन पर ,पर फिर भी उसे जमीन ही अच्छी लग रही है, उसे पाने के लिए मिन्नतें कर रहा है,हर कोशिश कर रहा है ,उसके रोने से लगता है की मानो उसके साथ बड़ा अनयाय किया जा रहा हो।
शायद हम भी ऐसे ही करते हैं परम पिता के साथ,हमे नहीं पता की हमारा किसमे भला है और किसमे बुरा फिर भी मांगे चले जाते हैं ,मिन्नतें जारी हैं, भगवान् से मांग मांग कर किसी कॉलेज में एडमिशन पाते हैं फिर पता चलता है की अरे यहाँ तो अच्छी जॉब ही नहीं मिलती,,,फिर मांग मांग कर कोई नौकरी पाते हैं,और पता लगता हैं की यहाँ तो हमारे काम करने का कोई माहौल ही नहीं हैं....असल में ये सारी मांगे उस बच्चे के जमीन पर खेलने की मांगो जैसी ही हैं, अधूरे ज्ञान वाली मांगे। अब जमीन पर खेलने की जिद करेंगे तो खिलाने वाले का दोष कहाँ , हाँ अगर खुद को खिलाने वाले की मर्जी से चलने देते तो निश्चित ही किसी आराम भरे बिसतर पर होते।
बच्चे का पिता भी चाहता है की बच्चा आराम से ऊपर खेले ,जिसके लिए उसने कई खिलौनो के इंतजाम ऊपर कर रखे हैं, कई खाने पीने की चीज़े भी हैं जो ठंडी जमीन पर नहीं मिलेंगी ,बच्चे को खिलौने के इशारे भी किये जा रहे हैं,खाने की चीज़े दिखाई जा रही हैं, कई बार बच्चे को उठाकर ऊपर भी रख दिया गया हैं। फिर भी अगर बच्चा ठंडी जमीन में ही सुख की अनुभूती लेना चाहे और कई प्रयासों के बाद भी खुद को जमीन से हुए बेवजह प्रेम को तोड़ने में कोई सहयोग न करे तो शायद बच्चे को जमीन पर ही छोड़ दिया जायेगा। हम भी जब ये जान ही जाते हैं की हम शायद अपने हिसाब से किसी गलत आदत,या गलत नौकरी में फस गए है,पर खुद ही उसका आनंद भी लें ,और हमारी आत्मा को जगाने या सही मार्ग दिखाने वाले परमात्मा के इशारो को नज़रंदाज़ करते रहे ,और नए रास्ते पर चलने की खुद से कोई इमानदार कोशिश या पहल न करें तो निश्चित ही हम भी छोड़ दिए जायेंगे उसी दलदल में जहाँ की हम स्वेच्छा से पहुचे हैं।
पिता हो या परमपिता दोनों की ही मदद पाने के लिए पहले खुद से सहयोग देना ही होगा ,अगर आप ठंडी जमीन में ही नशा महसूस करते रहेंगे तो परम पिता आपको कब तक बचा बचा कर बिस्तर पर रखेगा, हाँ वो फिर भी करेगा इशारे अच्छे अच्छे खिलोने के ,पर वो भी कुछ समय तक....
Friday, November 15, 2013
उसकी मर्जी...
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