Thursday, November 7, 2013

आपसी समझ वाला भ्रष्टाचार।

एक बहुत बहुत बड़ा मंदिर,मंदिर के बाहर दूर तक दर्शन के लिए बहुत बहुत लम्बी कतार, मंदिर में कई पुजारी।
मंदिर के दरवाजे पर एक पुजारी खड़ा होकर बस लाइन को देख रहा है, इस उम्मीद में की कोई भक्त आये और जल्दी दर्शन करवाने के लिए कुछ दक्षिणा दे दे। साथ ही उसके मन में ये ख्याल भी है की वो और पुजारियो जैसा भ्रष्ट नहीं, वो खुद ही किसी भक्त के पास नहीं जाता,वो खुद तो किसी को रूपए देने के लिए मजबूर नहीं करता,पर कोई भक्त खुद ही आकर दक्षिणा दे रहा है तो इसमें तो कुछ आपतिजनक नहीं,फिर कुछ भक्त तो सचमुच जल्दी में हो सकते है कुछ के पास सचमुच समय की कोई मजबूरी हो सकती है, वो ऐसे भक्तो की मदद भी तो कर रहा है।

वही कतार में एक भक्त खुद चल कर उस पुजारी के पास आता है और जल्दी दर्शन के बदले कुछ दक्षिणा का सौदा पुजारी से तय करता है। अब ये भक्त भी विचार कर रहा है की वो दुसरे कुछ भक्तो की तरह गैरकानूनी नहीं की अपने रसूख या रिश्तेदारों के रसूख का इस्तेमाल कर नियम तोड़े , फिर वो और भक्तो जैसा भ्रष्ट भी नहीं की किसी पंडित से जबरदस्ती करे या किसी पंडित को उसकी मर्जी के खिलाफ गलत करने पर मजबूर करे,उसने तो पंडित जी से व्यवस्था के बारे में पुछा है अगर पंडित जी न कर देते तो वो भी कतार में खड़ा रहता, अरे वो तो भ्रष्टाचार के खिलाफ है इसीलिये तो उसने उस किसी पुजारी से बात भी नहीं की जो भक्तो के पास अपने आप दक्षिणा के बदले जल्दी दर्शन का प्रस्ताव लिए घूम रहे थे,उसने तो अपनी समझ से ऐसा ईमानदार पुजारी ढूँढा है जो अकेला दरवाजे पर खड़ा था।

ऐसा ही हो गया है भारत का अधिकतर भ्रष्टाचार ,- आपसी समझ वाला भ्रष्टाचार।

No comments:

Post a Comment