Monday, November 30, 2015

भिखारी ...आगे चल ...

उसके पुरे कपडे मैले थे और धुल भरे बुरी तरह उलझे हुए बाल देख कर ऐसा लग रहा था की जैसे महीने से न नहाया हो। हाथ में एक बड़ा पहिये वाला का बेग भी था जिसकी चैने खराब होने की वजह से उसने उसे रस्सी से बाँध रखा था। बैग की हालात भी उसके कपड़ो जैसी ही थी,मैला और काला।उसे देख कोई भी यह अंदाज लगा सकता था की वो भिखारी है। आज उसका कसूर ये था की वो रेल के रिजर्वेशन वाले डिब्बे के दरवाजे के पास जमीन पर बैठने की कोशिश कर रहा था| पर क्या हिन्दुस्तान में रूपए वालो की भीड़ के बीच भिखारी को इंसान जैसा समझा जाएगा? या उसके साथ होने वाले व्यवहार में कुछ वैसा ही अंदाज होगा जो किसी जानवर के साथ किया जाए? उसकी जरूरत थी एक ऐसे डिब्बे में जमीन पर बैठके फ्री में सफ़र करने की की जिसमे संपन्न लोग रूपए देकर सफ़र करते हैं। इसलिए वो भी समाज के निचले से निचले संभव प्राणी की तरह ही व्यवहार कर रहा था। किसी ने दुतकारा तो पीछे हट गया। किसी ने गाली दी तो चुपचाप सुन ली। किसी ने धक्का दिया तो धक्का सह लिया। समाज के न्यूनतम में भी सबसे न्यूनतम जैसा उसका व्यवहार था। किसी डिब्बे में चढ़ता तो लोग दुत्कार कर भगा देते ...हट बे ..जा यहाँ से...कहाँ चला जा रहा है? ...डंडा मँगाओ दीवान साहब से... फेंक दो इसे ट्रेन से, जा कही और जा...
वो भी सुनता रहा और डिब्बे बदलता रहा और जैसे ही ट्रेन चली एक डिब्बे में दरवाजे से चिपककर उसने दरवाजा बंद कर दिया।अपने बेग से फटा मैला कम्बल निकाला। बैग को सर के नीचे रखा और कम्बल से पूरा शरीर ढक कर सो गया। लोग अभी भी कुछ देर तक कुछ कहते रहे वो अनसुना करता रहा। जब भी कोई वाशरूम के लिए उसके पास से गुजरता वो कम्बल हटा कर खाने के लिए कुछ मांगता और लोग या तो उसकी तरफ नज़र को जाने ही नहीं देते या नाक मुह सिकोड़कर उसे न कह देते। खाने की मांग जवाब में उसे चल बे ...हट बे...नहीं है...ये सब सुनना होता ,और वो भी सुनता रहता।
फिर स्टेशन आया और लोगो को उसकी जरूरत पड़ी की वो दरवाजा खाली कर दे जिससे दरवाजा खोला जा सके और लोग उतर सके। लोगो ने फिर उसे वैसे ही उसी व्यवहार के साथ कहना शुरू किया की चल बे दरवाजा छोड़...हट जा जरा...अरे सुन रहा है की बहरा है...हटता है की फेक दें....हट यहाँ से....
और वो जो अभी तक न्यूनतम से न्यूनतम था अब अचानक अपना स्वाभिमान खोजना लगा। और उसने लोगो की बातो को वैसे ही अनसुना कर दिया जैसा पहले वो उन्हें अनसुना कर रहा है। लोग कहते रहे की पागल है क्या... सुनता क्यों नहीं...कौन इन्हें चढ़ने देता है...फेक दो इसे....और वो अनसुना करता रहा और मजबूर होकर लोग अगले डिब्बे के दरवाजे की तरफ चले गए। आगे जाते जाते भीड़ में कोई कह रहा था की ये सब समझता है पर पागल होने का नाटक कर रहा है।
पर सब तो वो भिखारी तब भी समझता होगा जब उसे डिब्बे में चढ़ने से रोका जा रहा था, जब उससे कहा जा रहा था की यहाँ क्यों बैठा है आगे जा.....

बारात की लाईट

बारात का जश्न जारी था ,लोग जमकर नाच रहे थे ,कुछ लोगो के लिए पीने पिलाने का इंतज़ाम भी था। बैंड वाला बिना सुर के लोगो की फरमाइश के गाने गा और बजा रहा था।कोई फरमाइश 2 मिनट से ज्यादा नहीं चलती थी क्यूंकि फिर नयी फरमाइश आ जाती थी। कुछ उम्रदराज लोग बरात को तेज चलाना चाहते थे और जश्न मनाते नौजवान आगे जाते बैंड को रोक लेते थे और नाच फिर फिर शुरू हो जाता था। नाचने वालो पर कुछ लोग रूपए लुटाते थे जिन्हें लूटने के लिए कई बच्चे भी मौजूद थे। ये बरात में आये बच्चे नही थे बल्कि बेढंग साधारण कपडे पहने आस पड़ोस के बच्चे लगते थे। और इन रूपए लूटते बच्चों को वो बहुत गौर से देख रहा था। वो भी उन्ही की उम्र का बच्चा ही था। उसकी उम्र भी 12 -13 साल रही होगी। उसने अपनी हाइट से भी बड़ी बैंड की लाइट अपने सर पर रख रखी थी। बमुश्किल ही वो सीधा खड़ा हो पा रहा था। लाइट पकड़ने वाले और भी बच्चे ही थे पर उसकी उम्र शायद सबसे कम थी। कुछ उसकी तबियत भी ठीक नहीं थी, इतनी ठण्ड में उसने एक पुराना हाल्फ स्वेटर ही पहन रखा था,और हर दो मिनट में खांस रहा था। मैं बहुत देर तक उसे देखता रहा। वो बड़ी सी लाइट को अपने सर पर रखा उसे दोनों हाथो को ऊपर कर पकड़ा हुआ पिछले आधे घंटे से खड़ा था। स्कूल में टीचर अगर 10 मिनट भी हाथ ऊपर करा दे तो वो कितनी भारी सजा लगती थी।पर इस बच्चे को किस बात की इतनी कड़ी सजा मिल रही थी? ये बच्चा तो शायद जानता भी नहीं हो की खाली हाथ ऊपर करना भी सजा होती है। खैर वो बच्चा उन बच्चों को रुक रुक कर देख रहा था जो लुटाए गए रूपए लूट रहे थे। मुझे उस बच्चे पर कुछ दया आई, और मैं उस बच्चे को कुछ रूपए देने के लिए आगे बड़ा।
मैं उसके पास पहुचने वाला था की भीड़ में से एक रूपए लूटने वाला बच्चा उस बच्चे के पास आया, बच्चे के सर पर रखी लाईट भीड़ में से आये नए बच्चे ने अपने सर पर ले ली और जिस बच्चे को मैं दया से देख रहा था वो मुस्कुराते हुए भीड़ में रूपए लूटने चला गया। अब रूपए लूटने की बारी उसकी थी।

Sunday, November 8, 2015

आगरा का पेठा

मथुरा स्टेशन पर ट्रेन में पेठा बेचने वाला आवाज लगा रहा था। आगरा का पेठा ...आगरा का पेठा..... इस आवाज को सुन हमारे केबिन में बैठा एक नौजवान हैरान होने लगा। और हैरत भरी कुछ अजीब सी नज़रो से पेठा बेचने वाले को केबिन के साइड से झाँक कर देखने लगा। बाकी किसी यात्री को चलती ट्रेन में किसी प्राइवेट आदमी के पेठा बेचने पर कोई हैरानी नहीं थी। क्यूंकि मथुरा आगरा के पास ट्रेन में बाहर के लोग पेठा बेचने आते ही हैं। पर ये नौजवान बहुत हैरान भी था और कुछ परेशान भी। फिर भी हम में से कोई भी ये नहीं सोच रहा था की कही इसकी परेशानी सिर्फ इस बात से तो नहीं होगी ,की सरकारी ट्रेन में ये प्राइवेट आदमी किसकी परमिशन से पेठा बेच रहा है? ऐसा सवाल तो मन की गहराइयो में तभी दफ़न हो जाता है की जब हम किसी गुमनाम कंपनी की पानी की बोतल किसी गरीब मजदूर बच्चे से बीस रूपए में खरीदते हैं।
खैर जैसे ही पेठा बेचने वाला हमारे केबिन पर आया। नौजवान उसे देख गुस्से में बोला ,कौन है तू,कहाँ से आया है?
पेठे वाला- क्यों तुझे क्या?
नौजवान-तेरा मालिक कौन है,किसके यहाँ का पेठा है?
पेठे वाला-तुझे क्या मतलब है भाई? बढ़िया पेठा है|
नौजवान- ....... नाम क्या है बे तेरा , तेरी बात कराता हूँ अभी यादव जी से।
पेठे वाला- कौन यादव जी।
नौजवान- आर पी ऍफ़ वाले यादव जी।
पेठे वाला- कर ले जिसे फ़ोन करना है। विजय नाम है मेरा ... संजय जी के यहाँ से पेठा आया है।
नौजवान यादव जी को फ़ोन करता है।
नौजवान- साहब ये जम्मू मेल में संजय के यहाँ का पेठा बिक रहा है। कोई विजय लड़का बेच रहा है बात करो जरा इससे।
यादव जी ने उधर से कुछ कहा होगा ।
नौजवान- पर साहब ये वेस्टर्न लाइन की ट्रेन है। और निजामुद्दीन भी जायेगी।
फिर यादव जी ने उधर से कुछ कहा होगा और फ़ोन रख दिया गया। अब पेठा बेचने वाले का सीना और चौड़ा हो गया।
पेठा बेचने वाला- क्यों हो गयी तसल्ली। क्या कहा यादव जी ने............ वो क्या कहेगा ........रोज के हमारे 1500 रूपए जाते हैं थाने में, संजय साहब के माल को ट्रेन में कोई नहीं रोकता । तू कहाँ से आया रोकने|
अब नौजवान कुछ नरम और अचरज में पड़ा। फिर बोला माफ़ करो भाई हमारी तुमसे लड़ाई नहीं है पर यहाँ दो ही लाइन है। ईस्टर्न लाइन और वेस्टर्न लाइन , ईस्टर्न लाइन पर पेठे का काम शर्मा जी के पास है और वेस्टर्न लाइन के लिए हमारे यहाँ से भी रोज 1000 रूपए यादव जी के यहाँ जाते है आगे थाने में देने के लिए। मैं ही रोज शाम पेठे बेचने आता हूँ। आज काम से दिल्ली जाना था। तुम अभी बेच लो ...हमारे लोग बात कर लेंगे थाने में ।
कुछ सोचते सोचते पेठा बेचने वाला भी आगे चला गया |
कहानी के नाम झूठे हैं पर सभी जानते हैं की कहानी ऐसी हज़ारो कहानियो की तरह ही झूठी नहीं ,इतने छोटे छोटे करप्शन भी हमारी व्यवश्था का अटूट हिस्सा हैं , जहाँ करप्शन करने वाले सौ , हज़ार रूपए को अपना अधिकार ही समझते हैं ! .... सिस्टम में जब सौ हज़ार रूपए के लालची लोगो की भीड़ हो तो ला एंड आर्डर सही होने की उम्मीद ही बेईमानी लगती है !

अच्छे दिन

घर के पास एक मेडिकल की दुकान है जिसे ३०-३५ साल का एक इंसान चलता है ! क्यूंकि दुकान इंडस्ट्रियल एरिया में है जहाँ बहुत सारे मजदूर काम करते हैं तो लिहाज़ा ये मजदूर ही मेडिकल की दूकान के सबसे बड़े खरीददार हैं | मैं भी कभी कभी उस दूकान पर एक दो आम दवाइयां लेने चला जाता हूँ | और हर बार ही दूकान पर दुःख में भरने वाला नज़ारा मिलता है | दूकान पर भीड़ रहती है क्यूंकि मजदूर लोगो को अच्छे दिनों में भी इतनी तनख्वाह नहीं मिलती की वो डॉक्टर को दिखा कर दावा ले सके , डॉक्टर सब समाज सेवक है और कोई २०० -३०० से कम का परचा नहीं बनाता ,फिर वो जो दावा लिखता है वो इनती महंगी होती है की मजदूर की ४ -५ दिन की कमाई एक बुखार में ही चली जायेगी | इसलिए गरीब मजदूर मेडिकल पर दुःख बता कर ही दवा ले लेता है ! मेडिकल की दुकान पर कुछ ऐसा नज़ारा ओता है !
पहला ग्राहक - कितने रूपए की दावा हुई मेरी ?
मेडिकल वाला - ५० रूपए की ..
पहला ग्राहक - तो ३० रूपए की कर दो ..एक दो दिन कम कर दो ...
मेडिकल वाला - तो पूरी नहीं होगी ...सही नहीं होगे ..
पहला ग्राहक - तो फिर दो दिन बाद और ले जाऊंगा . अभी तीस की ही दे दो ..
दूसरा ग्राहक - चार दिन से बुखार है ..बिलकुल उठा नहीं जा रहा ..बहुत कमज़ोरी है ..
मेडिकल वाला - चार दिन की दावा दे देता हूँ ..सही हो जाओगे ..
दूसरा ग्राहक - सही है दे दो अपने हिसाब से .
मेडिकल वाला - १०० रूपए बनेंगे |
दूसरा ग्राहक - कम नहीं हो सकता क्या ?
मेडिकल वाला - नहीं ..,ऐसा करो तुम इंजेक्शन लगवा लो ,वो सही रहेगा | ३० रूपए का है ..एक कल लगवा लेना |
दूसरा ग्राहक - हाँ लगा दो ...
मेडिकल वाला- तो अन्दर आ जाओ ..मैं इंजेक्शन लगा देता हूँ |
तीसरा ग्राहक : इन्हें देखना ये मेरी वाइफ हैं ..इन्हें पीठ में कुछ दाने से हो गए हैं ..कई दिनों से खुजली है ?
मेडिकल वाला - इन्हें अन्दर भेजो ...
मेडिकल वाला परदे के पीछे चेक करता है और कुछ दवाइया और क्रीम देता हैं | फिर १५० रूपए मांगता है
ग्राहक - क्रीम काफी नहीं है ..ये गोली किसलिए ? ऐसा करो बस क्रीम ही दे दो |
ऐसे ही कितने हिन्दुस्तानी रोजाना इस मेडिकल से दावा लेते हैं | एक दिन वहां मैंने एक गर्भवती महिला को भी देखा , पूछने पर पता चला की वो ७ महीने के गर्भ से है और मेडिकल वाले से नियमित इलाज कराती है |
फिर सोचा की ये सब बिना अच्छे दिनों में होता तो कोई बात नहीं पर अच्छे दिनों में इन मजदूरों की ज़िन्दगी में क्या फर्क पड़ा ? क्या अच्छे दिनों का मतलब ये नहीं था की मजदूरों की तनख्वाह बढेगी ? क्या अच्छे दिनों का मतलब ये नहीं था की मजदूरों गरीबो के लिए और नए सरकारी अस्पताल बनेगे ? क्या अच्छे दिनों का मतलब ये नहीं था की गरीब की थाली में अब और खाना आएगा ..महंगाई कम हो जायेगी ? क्या अच्छे दिनों का मतलब ये नहीं था की जरूरी दवाईया सस्ती मिलेंगी ? क्या अच्छे दिनों के मतलब ये नहीं था की आम इंसान को जो रोज मर्रा की जिन्दगी में सरकारी आफिसो में भ्रस्टाचार झेलना पड़ता है उसे कम करने के लिए बड़े कदम उठाये जायेंगे ( जो कदम उठते नहीं दिखे ),क्या अच्छे दिनों का ये मतलब नहीं था की मजदूरों को गरीबो नए रोजगार मिलेंगे , क्या अच्छे दिनों का ये मतलब नहीं था की कॉन्ट्रैक्ट लेबर के नाम पर होने वाले शोषण को छोड़कर क्लास सी और डी की स्थायी नौकरिया निकाली जायेंगी ? आखिर क्या था अच्छे दिनों का मतलब ? अच्छे दिनों में किसान की फसल के एम् एस पी ( मिनिमम सपोर्ट प्राइस ) कितने बदाये गए ? इस साल सिर्फ ५ परसेंट तक दाम बड़े और पिछले साल इससे भी कम | दो साल में १० % , और ये १० % भी आउटपुट पर मिलने वाली रकम का बदना है ..इनपुट का खर्चा कही ज्यादा बढता है तो कमाई १० % से भी कम बड़ी होगी दो सालो में शायद ७-८ %! जबकि सरकारी कर्मचारियों का डी ए ही ६ महीने में १० % बड़ा दिया जाता है ..बेसिक अलग ३ % बदती है | एम् एन सी में कार्यरत भारतीयों का अगर कम्पनी द्वारा डीए न बढाया जाए और दो साल में सिर्फ ५-५ % से भी कम हाइक हो, मेडिकल फैसिलिटी ,एजुकेशन फैसिलिटी, अच्छी ग्रोथ कुछ अलग से न मिले तो वो भी कम्पनी बदल देते हैं ....... बिहार में जनता ने भी नेता बदल दिए ..१.५ साल पहले जो सब बीजे पी के साथ थे ,उनमे से बहुत से उनके साथ नहीं रहे ! मुझे १.५ साल पहले बी जे पी के जीतने की जितना ख़ुशी थी उसका १% भी गम आज उसके हारने से नहीं है !

Wednesday, July 22, 2015

व्यापम कल्चर है।

मध्य प्रदेश में कही किसी ट्रेन के स्लीपर कोच में।
अजय-यार कही कोई सरकारी नौकरी का जुगाड़ बता दे । दो लाख रूपए तक तो खर्च कर सकता हूँ।
विजय-अरे भाई मुझे पता होता तो मैंने खुद की नौकरी न लगवा ली होती 2 लाख देके। भाई तू दो लाख कह रहा है यहाँ तो दस दस लाख देने को लोग तैयार है सिपाही की नौकरी के लिए।
अजय- यार तेरे मामा भी तो पुलिस में है उनके थ्रू कोई जुगाड़ निकाल।
विजय- यार मामा जी ने अपने लड़के का कराया तो है सरकारी अस्पताल में बाबू के लिए।
अजय-मोटा पैसा लगा होगा।
विजय-राम जाने, खुद से तो यही कहते हैं की कोई पैसा नही लगा पर सुना यही है की 12 लाख तक रुपया चला है।
अजय-क्या यार गरीब के लिए क्या है। एम् ए करके सिर्फ सिपाही की नौकरी मिलके भी खुश हैं ...कही से जुगाड़ कर दो लाख रूपए देने को तैयार भी है और तू कहता है की 10 लाख चल रहे हैं। अरे मेरे बाप के पास 10 लाख होते तो मैं एम् ए क्यूँ करता किसी प्राइवेट कॉलेज में मैं भी बी टेक कर लेता।
विजय- ये तो है। पर यार जब नौकरी देने वाले ने रूपए देकर ही नौकरी देनी है और लोग 10 लाख खुद ही बिना मांगे देने को तैयार है तो कोई 10 लाख छोड़कर तेरे 2 लाख क्यूँ लेगा?
अजय-वो देख टी टी आ रहा है।
विजय-आने दे ।
टी टी- टिकट दिखाइए।
विजय-पुलिस स्टाफ हैं।
टी टी- आई डी दिखाओ।
विजय- (आस्तीन ऊपर करते हुए) आई डी नहीं है ,फोन पे बात कर लो।
विजय-हैलो मामा जी ...जरा बात करना ये टिकट मांग रहे हैं।
(टी टी ने फ़ोन पर कुछ बात की और आगे चला गया)
अजय-यार ये व्यापम घोटाला क्या है?
विजय-कोई घोटाला नहीं है।
अजय-मतलब।
विजय-अरे व्यापम घोटाला नहीं कल्चर है। व्यापम हिंदुस्तान का कल्चर है। वो कल्चर जहाँ छोटी बड़ी हर नौकरी के लिए रूपए लिए जाते हैं वो कल्चर जहाँ ईमानदार बस वही है की जिसे बेईमानी का मौका नहीं मिला। वो कल्चर जहाँ रूपए देने वाले खुद आगे बढ़कर रूपए खिलाते है ,वो कल्चर जहाँ जिसकी जितनी मांगने की औकात है वो उतना मांग ही रहा है। वो कल्चर जहाँ चपरासी भी फ़ाइल को एक टेबल से उठा दुसरी टेबल पर रखने के लिए रूपए मांगता है और बड़े हक़ के साथ माँगता है ।जैसे रूपए खाना उसका हक़ हो। व्यापम घोटाला नहीं हमारा कल्चर है। फर्क बस ये है की व्यापम में सेंट्रली रिक्रूटमेंट थी तो सारा करप्शन एक नाम के नीचे आ गया और व्यापम बड़ा नाम हो गया।
अजय-इतनी मौत क्यों हो रही है कौन करा रहा है?
विजय-कौन करा रहा है तो पता नहीं पर बचपन में सुना था की एक झूठ बोलने पर उसे छुपाने के लिए 100 झूठ बोलने पड़ते है। शायद इसी तरह एक मर्डर करने पर भी 100 मर्डर करने पड़ते हैं। अभी कितने हो गए......?
अजय- अच्छा जो हमने टी टी को मामा से फोन कराके भगा दिया। क्या ये भी व्यापम कल्चर है।
विजय-...
....
...
...
.हाँ शायद.. :)  :) 

हम जीत गए................ भाईजान !

हम जीत गए................ भाईजान !


बजरंगी भाईजान देख कर ख्याल आ रहा था की क्या ये फिल्म हिट होगी ? क्या इस फिल्म को भारत के लोग पसंद करेंगे ? इसकी गहरी वजह थी , वजह ये की फिल्म में दिखाया था पकिस्तान के लोग अच्छे भी होते हैं , पकिस्तान में इंसानियत  की मदद करने वाले लोग भी रहते है, पर भारत के न्यूज़ चैनल और नेताओ के बयानों की नजरो से देखो तो भारत की जनता के ख्याल कुछ इस तरह के हैं :
भारत के लोगो को न्यूज़ चैनल की नजरो से देखा जाए तो उन्हें सिर्फ पाकिस्तान की बुराई देखना पसंद है , न्यूज़ चैनल वालो की समझ से भारत की जनता बस ये सुनना चाहती है की सरहद पर सारे बम गोले पहले पाकिस्तान वाले ही बरसाते है ,भारतवासी  सीधे सादे लोग तो बस जवाबी कार्यवाही करते  हैं ! भारत की जनता न्यूज़ चैनलो   में पाकिस्तान को  लीग मैच में हरा लेने पर  ही वर्ड कप जीतने के बराबर हे ख़ुशी मनाती दिखती है , आये दिन जनता के नेता अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए  पाकिस्तान को करारे जवाब वाले बयान  जारी करते रहते है  ! जनता के नेताओ को लगता है की उन्होंने पाकिस्तान के साथ अगर बातचीत भी कर ली तो कही हमारी जनता नाराज़ न हो जाए ! नेताओ और मीडिया वालो दोनों को ही ऐसा लगता है की कही उन्होंने पाकिस्तान की हमदर्दी में दो शब्द भी कह दिए तो जनता उन्हें देशद्रोही मानने लगेगी   ! यहाँ सबका सीधा सा उसूल है की देशभक्त कहलाना है तो पकिस्तान की बुराई करते रहना है वहां कोई अच्छाई या हमदर्दी  नहीं दिखनी चाहिए ! तभी तो जनता के  नेता अपने देश के  देशद्रोहियो को पाकिस्तान जाने की सलाहे भरे स्टेज से देते रहते हैं !  जब कोई पकिस्तान का राष्ट्रपति अजमेर की दरगाह पर आता है और भारत का विदेशमंत्री उसके साथ लंच कर लेता है तब जनता  बड़े गुस्से में दिखाई देती है ? और न्यूज़ चेनलो पर पूछती  है की बिरयानी क्यूं खिलाई ? राज्यविदेशमंत्री पाकिस्तान की एम्बेस्सी में किसी कार्यक्रम में चले जाएँ तो सफाई देनी पड़ती है की क्यूं गए थे ?


मुझे शक था की जिस जनता को मैंने मीडिया और नेताओ की नजरो से ऐसा देखा है क्या वो जनता ऐसी फिल्म को पसंद करेगी की जिसका हीरो एंटी सनी देओल है जो पाकिस्तान की कोई बुराई नहीं करता , क्या जनता ऐसी फिल्म को पसंद करेगी की जिसमे ये दिखाया गया हो की सरहद के उस पार  भी इंसानियत में भरोसा करने वाले इंसान ही रहते है , वहां भी अच्छे लोग है , मैं सोचता था की न्यूज़ चैनल वाले घंटो तक  दिखा-दिखा के नहीं थकते की पाकिस्तान के बॉर्डर से पाकिस्तानी जवान  बम गोले फेक रहे है और फिल्म में देखने मिल रहा है की वो जवान भी इंसान हैं  और सलमान को लड़की के साथ बॉर्डर पार करने की परमिसन दे देते हैं , भारत के न्यूज़ चैनल पर जो पाकिस्तान के पत्रकार बुलाये जाते हैं हैं वो सब क्या क्या कहते हैं इंडिया को, लगता ही नहीं की कोई इंसानियत हैं और फिल्म का पत्रकार चाँद नवाब तो बेईमानी से पाकिस्तान में घुसे हिन्दुस्तानी की मदद में लग जाता हैं , इंसानियत के लिए (सलमान को एजेंट बताने की ) एक बड़ी स्टोरी  छोड़ देता हैं अपनी पोलिस से भी पंगा ले लेता है , एक मौलवी साहब भी हैं वो तो धर्म का भी ख्याल नहीं रखते  उनकी मस्जिद के दरवाजे भी कभी किसी के लिए  बंद नहीं होते ! हद है की आम पाकिस्तानी भी सलमान की सपोर्ट में चला आता है ,एक ऐसे इंसान की जो हिंदुस्तान से आया है चोरी छुपे ! पूरी बस में कोई पाकिस्तानी पोलिस की मदद नहीं करता जबकि सलमान बस के ऊपर ही होते हैं !

अब अगर पाकिस्तान के लोगो की इतनी अच्छाई दिखाने वाली फिल्म को जनता पसंद कर ले तो ये न्यूज़ चैनल वालो की हार ही है जिनको मसालेदार एंटी पाकिस्तान स्टोरी चलाने से फुर्सत  नहीं  !

न्यूज़ चैनल और देश के नेता दोनों को ही समझना चाहिए की किसी देश की  हाय हाय के नारे लगाने से उनकी देशभक्ति साबित नहीं होती ! दोनों ही देशो में  में ज्यादातर लोग ऐसे ही हैं जो  दोनों देशो में मोहब्बत चाहते हैं ! दोनों तरफ के लोग ही नफरत से ज्यादा इंसानियत में भरोसा रखते हैं !


बजरंगी भाईजान हिट हुई तो हम भी जीत गए ! भारतीयों की इंसानियत जीत गयी ! बजरंगी भाईजान का हिट होना मोहब्बत की जीत है उन चंद लोगो पर जो सिर्फ नफरत फैलाने  की बात करते हैं ! बजरंगी भाईजान का हिट  होना हम सब में छुपे मोहब्बत भरे दिल की  जीत है !

Saturday, May 2, 2015

लड्डू वाली लड़की ....माँ !

गाँव में एक शादी से पहले लगुन् का कार्यक्रम चल रहा था। कई जगह जिसे तिलक भी कहते हैं। नाम कुछ भी दो असल में ये दहेज़ का कार्यक्रम होता है। और कार्यक्रम में शिरकत करने वालो के दिमाग में एक ही सवाल घूमता है की "कितने लाख ?"
मुझे इस सवाल से मतलब था नहीं तो मैं सबसे पीछे जाकर बैठ गया। पास में एक 3-4 साल की छोटी सी प्यारी सी लड़की बैठी थी वो भी लेन देन की लालची प्रवृत्ति को धार्मिक चादर उड़ा देने वाले इस झूठे तामझाम के वातावरण से अनजान थी। मैं उस लड़की से ही बात करने लगा।
मैं-कहाँ से आई हो?
लड़की-इसी गाँव से|
मैं-कहाँ रहती हो।
लड़की।-वो जमनी का पेड़ है न। उसी के नीचे हमारा घर है।
मैं-जमनी पर तो बहुत फल आते होंगे।मुझे भी देना।
लड़की-नहीं उस पर फूल आते हैं।
मैं-नहीं फल भी आते होंगे।
लड़की- नहीं उस पर फूल ही आते हैं।फूल ही आये हैं बस।

मैं समझ गया की लड़की ने अभी अपने होश में फल उगते देखे ही न होंगे ...शायद अगले बरस ये ऐसा न कहे।
ऐसे ही कुछ कहते सुनते कार्यक्रम ख़त्म हुआ और सबको लड्डुओं का डिब्बा बांटा जाने लगा। एक डिब्बे में चार लड्डू थे।मुझे चार लड्डू खाने नहीं थे तो मैंने उस छोटी बच्ची से कहा ..
मैं-तू मुझे अपने डिब्बे में से एक लड्डू दे दे मैं तुझे अपना पूरा डिब्बा दे दूंगा
लड़की-नहीं चाहिए।
मैं-अरे तेरा घर इसी गाँव में है तू दोनों डिब्बे घर ले जाना ...बाद में खा लेना।
लड़की- नहीं चाहिए।
मैं-अरे देख दूसरे बच्चे भी कितने डिब्बे लिए घूम रहे हैं।सबने पुराने डिब्बे छिपा कर और ले लिये।
लड़की- तुम डिब्बा दोगे ही नहीं।
मैं- नहीं ...मैं दूंगा...तू एक लड्डू तो दे।
लड़की- तुम भाग जाओगे।
मैं -नहीं मैं नहीं भागूंगा।
लड़की-नहीं तुम भाग जाओगे...
लड़की फिर कुछ नहीं बोली।थोड़ी देर में मैंने खुद ही अपना डिब्बा लड़की को देकर कहा की तू ऐसे ही रख ले ...मुझे तेरा लड्डू नहीं चाहिए। लड़की ने मेरा डिब्बा जमीन पर फेका और पैर से ठोकर मारने लगी।मुझे कहा की नहीं चाहिए... मुझे समझ ही नहीं लगा की ऐसा क्या करा मैंने।
उसी पल एक और गाँव की छोटी लड़की उसे बुलाने आई और मुझसे बोली की ....पता है की इसकी तो माँ ही नहीं है...इसकी माँ इसे छोड़कर भाग गयी......
उसने लड़की से कहा की चल तेरे पापा ढूंढ रहे हैं...
मुझे लड़की पर कुछ दया सी आई लगा की शायद माँ के जाने का इतना असर है की लड़की अब किसी से भी कुछ नहीं चाहती इसकी जामुनी के पेड़ पर आये फूल अब जामुनी नही बनते.....मैं खाने के पंडाल की तरफ मुड़ गया।
लड़की के बारे मैं कुछ सोचता हुआ मै पंडाल तक पहुच नहीं पाया था की फिर किसी ने पीछे से मेरा हाथ छुआ। मुड़ कर देखा तो वो ही लड़की थी हाथ में एक लड्डु लिए हुए। सारे विचार खो से गए। हल्की सी नम आँखों से मैंने उस लड्डु को हाथ में लिया और तुरंत वो लड़की ....वापस भाग गयी.....
उस लड़की ने मेरे लड्डु तो लिए नहीं अब मैं उसका लड्डु कैसे खाता..... पर लड़की इतनी मासूम थी की उसका ये कर मैंने रख लिया और इस दुआ के साथ ही लड्डु खाया ....की इसकी माँ वापस आ जाए। कोई तो भगवान से कहे की ये लड़की बिना माँ के खुद ही माँ जैसी हो गयी है। दुसरो के लड्डू नहीं लेती अपने ही बाटें चली जाती है।...

किसान का मुआवजा..... किसका ?

राहगीर -ऐ भैया सुना है की तुम्हारे गाँव में तो चैक बंट भी गए।बढ़िया मुवावजा मिला सबको। इस रास्ते से जब भी गुजरता था तुम्हे भी बड़ी मेहनत करते देखता था इस खेत में।तुम्हारी फसल बर्बाद हुई तो बड़ा दुःख हुआ था मुझे भी।खेर जाने दो अब मुआवजे के चैक मिल रहे हैं तो कुछ मदद तो हो ही गयी। तो कितना मुआवजा मिला तुम्हे।
किसान- कहाँ साहब। मुआवजा हमारे लिए कहाँ। हमें कोई मुआवजा नहीं मिलना।
राहगीर -क्यूँ भाई?
किसान- सरकार ने मुआवजा किसानो को दिया है और सरकारी खाते में हम किसान हैं ही नहीं।
राहगीर-ऐसा क्यूँ कहते हो भाई।
किसान-सही ही तो कहे हैं। जमीन पर हल चलाने से या बीज बोने से किसान नहीं बनते। सरकारी हिसाब में किसान वही है की जो जमीन का मालिक है।
राहगीर- ये तुम्हारी जमीन नहीं है।
किसान - हमने तो बटाई पर ली है। जमीन पर हम मेहनत करते हैं और फसल की कमाई का आधा हिस्सा मालिक को दे देते हैं।
राहगीर- अच्छा तो मुआवजा जमीन के मालिक को मिला ।
किसान-हाँ ..सरकार के बहीखाते में वही किसान हैं हमारी कोई गिनती नहीं।
राहगीर- मालिक क्या करते हैं?कहाँ रहते हैं?
किसान- बड़े रूपए वाले हैं,शहर में रहते हैं रेलवे में बड़े अफसर हैं। पिछले साल ही ये जमीन खरीदे हैं 20 लाख में।
राहगीर- अरे उन्हें मुआवजे की क्या जरूरत।
किसान-पर किसान तो वो ही हैं।हम तो सुने हैं की अमिताभ जी भी किसान हैं और अपने नेता जी भी।
राहगीर-अच्छा तो नेताजी को भी मुआवजा मिला होगा।
किसान-हाँ मिला ही होगा।
राहगीर-तो तुम जमीन क्यूँ नहीं खरीद लेते। तुम भी बन जाओ किसान।
किसान-क्यूँ मज़ाक करते हो साहब। हमारी खेती की कमाई में तो हमारे बच्चे पढ लिख ले वो ही संभव नही हो पा रहा। जमीन तो सारा जीवन की कमाई जोड़ कर भी नही आ पाएगी। हम किसान नही मज़दूर है साहब।इस जमीन पर मजदूरी करते हैं और ये जमीन हमे इतना नहीं देती की हम सरकारी बहीखाते में मज़दूर से किसान बन जाए। जमीन तो बड़े रूपए वाले ही खरीदते हैं।
राहगीर- तुम्हारे पास कभी कोई ज़मीन नहीं रही।
किसान-थी साहब 10 बीगा ज़मीन।पहले बच्चों की पढाई फिर पत्नी की बिमारी ,बच्चों की शादी ,बैंक का लोन ,फिर कभी बाढ़ कभी सुखा ..और फसल की खराबी धीरे धीरे कर 8 बिगा बिक गयी। अब 2 बीगा बची है दूसरे गाँव में।
राहगीर-तो तुम्हारी 8 बीगा ज़मीन तुम्हारे जैसे खेतो में काम करने वाले किसान ने खरीदी या किसी शहर के बड़े साहब ने।
किसान-क्यूँ फिर फिर मज़ाक करते हो साहब। हमारे जैसे लोगो की अब ये औकात कहाँ की जमीन खरीदे। जमीन की कीमते अब हमारी पहुच में नहीं। मैंने चार साल पहले 2 बीगा 4 लाख में एक बड़ी बैंक के मेनेजर को बेचीं थी सुना है की अब वो उसी जमीन को 6 लाख में बेच रहे हैं। जमीन अब किसान की खेती से ज्यादा बड़े लोगो के प्रॉपर्टी के धंधे के काम आ रही है।
राहगीर-हाँ ये तो है। पर तुमने कहा की दो बीगा जमीन अभी भी तुम्हारे पास है उस पर तो मुआवजा मिला ही होगा।
किसान- वो गेहू तो मुझे इस मालिक वाली जमीन से ही मिल जाते हैं न तो मैं अपनी 2 बीगा ज़मीन पर अपने घर के खाने के लिए दाल और सब्ज़ी ऊगा लेता हूँ। पर मुआवजा तो गेहू का ही मिला है न साहब। इसलिए उसका भी मुआवजा नहीं मिला।

Thursday, April 23, 2015

नेता जी हाय हाय ..

जय- यार केजरीवाल की सभा में एक इंसान ने आत्महत्या कर ली।
विजय- अच्छा, जरूर कॉन्ट्रैक्ट लेबर होगा। नौकरी का कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म हो रहा होगा। केजरीवाल ने पक्का करने का वादा पूरा नहीं किया। .....केजरीवाल हाय-हाय। केजरीवाल हाय -हाय।
जय- नहीं भाई।मैंने खबर सुनी है की वो तो किसान था।
विजय- अच्छा , तब भूमी अधिग्रहण हो रही होगी उसकी इसलिए आत्म हत्या की होगी। मोदी जी ने किसान विरोधी कानून बनाया है। ...मोदी हाय हाय....बी जे पी हाय हाय ।
जय- अरे नहीं। कोई बता रहा था की वो तो फसल बर्बाद होने की वजह से परेशान था। फसल पर ओले पड़ गए।
विजय- हां हां ...ये ही बात होगी, इस बार बड़ी फसल बर्बाद हुई है और किसानो को मुवावजा नहीं दिया जा रहा।
जय- पर इस बार तूने किसी की हाय हाय नहीं की।
विजय- अरे पहले ये तो जान लूं की किस राज्य का था। मुआवजा तो किसी राज्य ने नहीं दिया। एक आदमी के लिए सबकी हाय हाय की मेहनत क्य्यों करना ?
जय- चाचा बता रहे थे की राजस्थान का था।
विजय- बी जे पी हाय हाय....वसुंधरा राजे हाय हाय....
जय- यु पी का भी हो सकता है शायद !
विजय - नेता जी हाय हाय ..समाजवादी पार्टी हाय हाय हाय ...
जय - अरे तू बस मौका देख कर हाय हाय ही करेगा या कुछ और भी ...
विजय - भाई इस देश में सेक्युलर होने का मतलब ...बस गैर सेक्युलर की खिलाफत है ...पक्के हिन्दू होने का मतलब मुस्लमान की खिलाफत है .... महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता दिखानी है तो किसी महिला के मुजरिम को ढूँढो और उसकी की हाय हाय कर दो बस .... बच्चो के प्रति प्रेम दिखना है तो बच्चो को मजदूर बनाने वाले को दूंदो और चिल्लाओ हाय हाय ..... किसानो के लिए प्रेम दिखाना है तो मौका ढूँढो कहाँ कोई किसान परेशान है और चिल्लाओ हाय हाय ..... हाय हाय .............इस मुल्क में .किसी की मदद करके नहीं बस हाय हाय हाय हाय चिल्लाकर ही संवेदनशीलता दर्शायी जाती है .............. सब यही कर रहे है तो तब मैं संवेदनाहीन कैसे रहूँ ..मुझे भी दर्द हुआ है ...नेता जी हाय हाय ....हाय हाय ..

Tuesday, April 14, 2015

ज्योतिषाचार्य पंडित जी का ऑफिस

ज्योतिषाचार्य पंडित जी का ऑफिस :
एक महिला पंडित जी से ..पंडित जी मेरा बेटा कोटा में आई आई टी की कोचिंग कर रहा है ..इस बार दूसरा एटेम्पट है ..उसकी अच्छी रैंक आएगी न ! ये मैं कुडली लायी हूँ इसे देख कर बताओ !
पंडित जी : हाँ दिखाओ ...
फिर पंडित जी अपने लैपटॉप में डिटेल भरते हैं ! और 5 मिनट देखने के बाद :
पंडित जी : देखो जैसी इसकी गृह दशा है इसको पास हो जाना चाहिए !
महिला : पंडित जी पास तो हो ही जाएगा ..ये बताओ की रैंक कितनी आएगी ? कुंडली सही से देख कर बताओ ?
पंडित जी : देखो मैंने कहा न की अभी जैसी इसकी गृह दशा है , इसके पास होने की ही फ़िक्र करो ..पास हो जाएगा ..वो ही काफी है !
महिला : क्या पंडित जी ..रैंक बताओ न ..अच्छी रैंक नहीं आ रही है क्या ?
पंडित जी फिर 5 मिनट अपने लैपटॉप में झांकते हैं !
पंडित जी : देखो इससे पूछो की ये इन्टरनेट कितनी देर करता है ?
महिला : क्यूं पंडित जी ..ज्यादा नेट करता है क्या ?
पंडित जी : इसके मंगल की दशा सही नहीं है ..इसका मन भटकता है ..भटकाव है इसके मन में !
महिला : तो क्या पंडित जी इस बार अच्छी रैंक नहीं आयेगी ?
पंडित जी : अब मैं ज्यादा क्या कहू ? आपको इनडाइरेक्ट वे में बता ही दिया ..इससे पूछो की इन्टरनेट कितनी देर करता है ? जब पदाई में ध्यान नहीं लगेगा तो रैंक कैसे आ पायेगी ..आप अभी पास होने की फ़िक्र ही करो ,वो ही काफी है !
महिला : मैं आपकी फ़ोन पर बात कराऊ ? आप पूछ लेना ..
पंडित जी : नहीं उसे मेरे सामने लाओ ..फ़ोन पर बात नहीं हो पाती है ..मैं कहूँगा की तू नेट करता है वो कह देगा की नही करता ..
महिला : सही कह रहे हो पंडित जी ...हमसे कहता रहता ही की पड़ रहा हूँ और इन्टरनेट करता रहता है ..अब हम क्या कर सकते हैं !
पंडित जी : हाँ यही बात है उसे मेरे सामने लाओ ...तब सच सामने आएगा !
महिला : पंडित जी फिर कोई उपाय बताओ ..अच्छी रैंक कैसे आये ...लड़का भटक क्यूं रहा है ?
पंडित जी फिर 5 मिनट लैपटॉप में झांकते है ..
पंडित जी : मुझे तो तुम्हारे घर में किसी स्त्री का साया दिख रहा है ..किसी स्त्री का बुरा प्रभाव आ रहा है ..
महिला : क्या मतलब पंडित जी!
पंडित जी : अब इतना तो इन इनडाइरेक्ट कह रहा हूँ ..लड़के के मन को भटकाने से बचाने के लिए राहू के उपचार की जरूरत है ..राहू लड़के के मन को कहीं और ले जा रहा है ..मैं उपचार लिख देता हूँ ..
फिर 5 मिनट पंडित जी कागज़ पर 4-5 टोटके लिख देते हैं
महिला : पंडित जी ये सारे उपचार करने हैं की कोई 1 कर लें !
पंडित जी : अरे डॉक्टर भी तो एक मर्ज की चार गोली लिखता है एक सुबह एक दोपहर एक शाम एक रात ..ऐसे ही राहू के उपचार भी कई एक साथ होते हैं ..सारे उपचार राहू से सम्बंधित ही हैं ..अब जो भी गृह को पसंद आ जाये और गृह शांत हो जाए ..इसलिए सारे उपचार एक साथ करने पड़ते हैं ..
महिला : पंडित जी इसके बाद भटकाव बंद तो हो जाएगा ..इसके बाद स्त्री का साया तो नहीं रहेगा ..
पंडित जी : अरे जब आप डॉक्टर के पास जाते हो तो क्या कोई डॉक्टर गारंटी लेता है की मरीज ठीक हो ही जायेगा ..मुझे तो आज तक कोई ऐसा डॉक्टर मिला नहीं ..फिर आपको पक्का इलाज चाहिए तो एक अंगूठी बनवा देता हूँ ..वो पहनवा दो ..वो हमेशा का इलाज हो जाएगा ..एक पुखराज या हीरे की अंगूठी पहनवा दो ....क्य्योंकी राहू की दशा तो 2025 तक चलेगी !
महिला : अच्छा जी पंडित जी ..कौन से अंगूठी ...
पंडित जी : मैं तुम्हारे भले की बात कहता हूँ ..हीरे के रूपए खर्चा क्यूं करना जब पुखराज से काम चल ही जायेगा ,पुखराज की अंगूठी बनवा लो ..
महिला :जी पंडित जी ..जब वो यहाँ आएगा तो मैं उसे आपके पास लाऊंगी ..और ये जो पर्चे पर आपने उपचार लिखे हैं ये करती हूँ पहले ...पर उसका एग्जाम तो हो चुका है ..अब उसकी रैंक कैसे आयेगी ?
पंडित जी : पहले राहू का उपचार करो फिर रैंक भी आ जायेगी, लाभ न हो फिर बताना !
देश के दुर्भाग्य से कहानी की महिला अद्ध्यापिका हैं .......... कहानी पंडित जी के सम्मान में कही गयी जो कुंडली मिला कर बता देते हैं की ये विवाह अच्छा है और वो नहीं !

Monday, April 6, 2015

my choice... my choice...

एक चिड़िया जो अपने जन्म से ही एक पिंजरे में रहती है , उसका मालिक उसे टाइम पर खाना पानी देता रहता था। चिड़िया ने घर के बाहर कुछ कभी नहीं देखा। उसके लिए उसका मालिक ही उसका भगवान् था जो उसे खाना पानी दे रहा था। चिड़िया इस बात से भी बेखबर थी की उड़ना भी कुछ होता है , चिड़िया इस बात से अनजान थी को आज़ादी भी उसका हक़ है। उसकी जानकारी और समझ में तो उसकी दुनिया पूरी थी। वो ये ही समझती थी की दुनिया इतनी ही है इस पिंजरे जैसी और जो मालिक उसे खाना पानी दे रहा है वो उसका भगवान है।
चिड़िया के दिन शांति से गुजर रहे थे।
फिर एक दिन आसमान से गुजरते कुछ चिड़ियों के झुण्ड ने उसे देख लिया। मालिक को कही आस पास न देखकर झुण्ड से कुछ चिड़िया उसके पिंजरे के चारो तरफ बैठकर पिंजरे में कैद चिड़िया को समझाने लगी को तेरी दुनिया झूठी और अधूरी है, जिसे तू संसार समझती है वो तो एक क़ैद है और जिसे तू भगवान समझती है वो शैतान है और उसने ही तो तुझे गुलाम बना रखा है। तेरा जन्म इस कैद में मरने के लिए नहीं हुआ तुझे भी असली भगवान ने पंख दिए है तुझे भी आजाद उड़ने की आज़ादी है। अभी अभी कुछ अरमान उस कैद चिड़िया के मन में जागने शुरू हुए थे की मालिक के आने की आहट हुई और जो चिड़िया आजादी की बाते कैद चिड़िया को बता रही थी वो सब उड़ गयी। फिर उस झुण्ड में से कोई कोई चिड़िया मालिक को घर न पाकर पिंजरे में कैद चिड़िया के पास आ जाती और अपने उड़ने के रोमांच के किस्से सुनाती। कभी दूर देश की सुंदरता का बयां सुनाया जाता तो कभी बाग़ के मीठे फलो की बाते पर जैसे ही मालिक की आहट होती सारी चिड़िया उड़ जाती।

इन आज़ाद चिड़ियों के पास उस कैद चिड़िया को उसके पिंजरे से छुड़ाने का कोई इंतज़ाम न था। न ही उनके पास उस कैद चिड़िया के मालिक से लड़ने झगड़ने की हिम्मत ही थी। सारे झुण्ड में कोई भी बेचारी चिड़िया की आज़ादी में कुछ भी मदद देने में कुछ नहीं नहीं कर रहा था। बस वो आते थे और चिड़िया को समझाते थे की तेरा ये कैद वाला जीवन एक नर्क है ,ये भी कोई जीना है ,हमें देखो हमसे सीखो,हम उड़ते हैं अपने परो से ,हम अपनी मर्ज़ी से कही भी आते जाते है ,अपना भोजन खुद ढूँढ़ते है और हम किसी पर निर्भर नहीं है । यही तुम्हारा भी हक़ है तुम्हे भी ऐसे ही जीना चाहिए।


पर वो कैद में बंद चिड़िया जिसके कैद से आज़ाद होने का अभी कोई इंतज़ाम नहीं है जिसे सारी ज़िन्दगी बिना उड़ान भरे ही गुजारनी है उसके लिए क्या ये ही अच्छा न था की अगर उसे आजाद न करना था तो उसके दिल में आजादी के अरमाँ जगाये ही न जाते उसे बताया ही न जाता की दूर देश की खूबसूरती क्या है...हवाओ में पंख फैलाकर आजादी से बहे चले जाना क्या है। कैद वो पहले भी थी ,पर शांत थी आज ये कैद उसके मन में गहरे सवाल पैदा करती है जिसके जवाब उसे कोई भी न देगा।जो जिंदगी पहले चिड़िया को ठीक ही लगती थी वो अब नर्क लगती है।अब वो पल पल घुटती है और उसे उसकी घुटन का कोई हल भी भी नहीं मिलता। अब उसे नफरत हो गयी है अपनी ज़िन्दगी से।




मन को परेशान करने वाला सवाल ये है की हिंदुस्तान के गाँव में, छोटे शहरो और कस्बो में रहने वाली लडकिया जब दीपिका पादुकोण का माय चॉइस वीडियो देखती होंगी तो उनके मन की हालात इस कैद में बंद चिड़िया से कितनी अलग होगी?

Thursday, March 5, 2015

कैंपस के कुत्ते और लड़की

परसो जब नोएडा से रात को 9 बजे ट्रेनिंग सेंटर पंहुचा तब ट्रेनिंग सेण्टर के अंदर चार कुत्ते मेरे पीछे लग गए। मैं थोडा डरा और धीरे धीरे दबे पाओं हॉस्टल की तरफ बढ़ता रहा और कुत्ते भी कुछ धीमी आवाज में भो भो करते हुए मेरे पीछे चलते रहे। हॉस्टल के गेट के पास पहुच कर कुत्तो ने मेरा साथ छोड़ दिया और मेरी भी तसल्ली हुई। फिर मैं सोचता रहा की कौन इन कुत्तो को ट्रेनिंग कैंपस में रहने देता है। यहाँ अधिकतर बाहर के लोग आते है ऐसे में कुत्तो को कैंपस के बाहर क्यूँ नहीं करते पर मैं जानता था की मेरी कंपनी को खुद की चिंता तो है नहीं तो इन कुत्तो के मसले पर फ़िक्र कौन करेगा। फिर भी ये सवाल तो था ही की इन कुत्तो को खाना कौन देता है। कौन इनके लिए दाना पानी जुगाड़ता है यहाँ। ऐसा कुछ सोचकर मैं इस मसले को भूल गया।
फिर आज सुबह मॉर्निंग वाक् पर जाते समय एक अलग नज़ारा दिखा। वास्केटबॉल ग्राउंड के बीच में चार कुत्तो में से एक कुत्ता मरा पड़ा था और तीन कुत्ते उसको घेरे एक दम शांति के साथ खड़े थे। कोई भी कुत्ता मुझे देख कर भौका नहीं। शायद आज उन्होंने मुझे देख कर भी अनदेखा कर दिया था क्यूंकि आज उनके लिए किसी अजनबी की उपस्थिति से बड़ा सवाल किसी अपने की अनुपस्थिति का था। मेरे पास भी रुकने की वजह न थी ,मैं अपनी मौज में चल रहा था की अचानक से रुकने की वजह मिल गयी। एक 15-18 साल की लड़की हाथ में कुछ खाना लेकर कुत्तो के पास आई। कुत्तो ने एकदम खामोशी से उस लड़की के लिए जगह बनायीं और लड़की बैठ कर एक हाथ में खाना लिए हुए दूसरे हाथ से उस मरे हुए कुत्ते का सिर सहलाने लगी। तीनो कुत्ते  लड़की के बगल में खड़े बड़ी गौर से लड़की के उस हाथ को देखते रहे जो मरे हुए कुत्ते का सर सहला रहा था। इस समय कुत्तो का ध्यान भी लड़की के उस हाथ की तरफ बिलकुल नहीं गया की जिसमे खाना था। या ध्यान गया भी हो तो उन्होंने उसे इस समय अपने दोस्त से कीमती नही माना। लड़की मरे कुत्ते का सिर सहलाती जा रही थी और बगल में खड़े कुत्ते बहुत उम्मीद भरे भाव से एक दम शांत ये देखे जा रहे थे। शायद कुत्तो को उम्मीद थी की जो हाथ उन्हें खाना देते आये हैं वही हाथ उनके साथी को जिंदगी भी दे पाएंगे।शायद उन्हें खाना देने वाली लड़की ही उनके लिए भगवान डॉक्टर सब कुछ थी जिससे वो अपनी सारी मांगे और सारी प्रार्थनाएं करते होंगे। और आज उनकी मांग सिर्फ खाने की नहीं थी , अपने साथी की ज़िदगी की मांग के लिए वो आये हुए खाने को नकार चुके थे।
पर लड़की तो जानती ही थी की वो न तो डॉक्टर है और न भगवान,इसलिये उसने अपने भगवान से कुछ कहने के लिए सर उठा कर कुछ देर आसमान की तरफ देखा। फिर दाए बाए कुछ परेशान नज़रो से देखने लगी। इसी देखने में एक छण के लिए लड़की की नज़रे मेरी नज़रो से मिली और मैंने नज़रे चुरा ली।मैं उससे नज़रे मिलाता भी कैसे क्यूंकि मेरी नज़रे उन कुत्तो को कैंपस से भगाने की ख्वाइश वाली थी और उस लड़की की नज़रे कुत्ते को दुसरी दुनिया से वापस इस जहाँ में लाने की उम्मीद वाली थी। मैं उस लड़की से एक बड़े मार्जिन से हार चूका था।

Friday, February 13, 2015

हैप्पी वेलेंटाइन टू आल लवर्स : पेड़, बच्चा और प्यार

हैप्पी वेलेंटाइन टू आल लवर्स :

बहुत समय पहले एक बहुत ही खूबसूरत कहानी पड़ी थी एक बड़े से पेड़ और छोटे बच्चे की कहानी ! वेलेंटाइन डे पर शेयर करने का ख़याल आया !
एक  बड़ा ऊंचा और घना पेड़ था ,जिसकी लम्बी लम्बी टहनिया थी ,जिसमे दूर दूर से चिड़िया आकर रहती थी ,सुन्दर सुन्दर फूल पेड़ पर आते थे और मीठे फल भी ! एक छोटा बच्चा अक्सर उस पेड़ के पास आकर  खेलता था और धीरे धीरे उस बड़े से पेड़ को उस छोटे से बच्चे से प्यार हो गया ! बड़े और छोटे के बीच में प्यार संभव है अगर बड़े को ये जागरूकता न हो की वो बड़ा है ! पेड़ को तो  अपने बड़े होने का ज्ञान था नहीं ,ऐसा ज्ञान तो बस इंसानों में ही होता है ! लिहाजा पेड़ और बच्चे में प्यार संभव हो पाया ,फिर प्यार के लिए कोई छोटा बड़ा होता भी नहीं !
बच्चा पेड़ की ऊंची टहनियों से खेलता था  और पेड़ बच्चे के लिए अपनी ऊंची  टहनियों को झुका देता था ,जिससे वो आसानी से फूल और फलो को तोड़ सके ! प्यार हमेशा ही झुकने के लिए तैयार रहता है ! और अहम् झुकाने के लिए ! अहम् हमेशा ही मांग पर आधारित है , वो उधर ही चलेगा जिधर मांग पूरी होगी ! प्यार की कोई मांग नहीं ,प्यार अपना इनाम खुद ही है !
हसता खेलता बच्चा पेड़ के पास आता, पेड़ अपनी टहनियों को झुका देता , पेड़ बहुत ही खुश होता और प्रेम से भर जाता  जब बच्चा उसके फूल और फलो को तोड़ता , प्यार है ही ऐसा जो की वो तब खुश होता है की जब कुछ दे सके ,जबकि अहम् तब खुश होता है जब वो कुछ ले सके !बच्चा धीरे धीरे बड़ा होता गया और पेड़ बच्चे को और प्यार देता गया , वो खुश होता जब बच्चा पेड़ की शाखों पर आराम करता ,उसकी पत्तियों का ताज बनाकर घूमता ! पेड़ से मिलते  प्यार की  वजह से बच्चा और खुशियों के साथ बड़ा होता रहा !

पर समय गुजरता गया , बच्चे के और दोस्त भी  हो गए ,अब  बच्चे को अपने एग्जाम देने होते थे ,अपने और दोस्तों से बातें  करनी होती थी लिहाज़ा  बच्चे ने  पेड़ के पास जाना कम कर दिया , पर पेड़ इंतज़ार करता रहता था ! प्यार दिन रात इंतज़ार करता है ,पूरे  मन  से इंतज़ार करता है और पुकारता है अपने प्रेमी को ! पेड़ उदास रहता था, जब बच्चा खेलने  नहीं आता था ! प्यार उदास हो ही जाता है जब वो बाँट न सके ,प्यार उदास होता है  जब वो  किसी को कुछ दे न सके ,जबकि अहम् उदास होता है जब वो किसी से कुछ ले न सके !
समय गुजरता गया बच्चा और बड़ा होता गया और  पेड़ के पास और भी कम आने लगा , जो बड़े हो जाते है उनकी आशाएं भी बड  जाती  है , बड़ी आशाओं के बीच प्यार के लिए समय कम ही रह जाता है !
एक बार पास से गुजरते समय पेड़ ने उस लड़के  को रोककर कहा की मैं तुम्हारा रोज इंतज़ार करता हूँ तुम आते नहीं !
लड़का  कहता है की तुम्हारे पास क्या है ? मुझे तुम्हारे पास क्यूं आना चाहिए ? मुझे रूपए की तलाश है ? तुम मुझे रूपए तो दे नहीं सकते !
पेड़ ने कुछ परेशानी से कहा की क्या जब मैं कुछ दे सकूंगा तब ही तुम मेरे पास आओगे ! ये तो प्रेम न हुआ! प्रेम तो बेहिसाब और बिना शर्त देना  है , हम पेड़ तो इस रूपए को नहीं समझते और शायद इसीलिये हमें इंसानों की तरह प्रेम और शांति की खोज के लिए धर्म और मंदिरों में नहीं भटकना पड़ता ! नहीं हम पेड़ रुपयों को नहीं समझते !
लड़के  ने कहा तो फिर मैं तुम्हारे पास क्यूं आऊं ? मुझे रूपए की जरूरत है और मैं वहीं जाऊँगा जहाँ रूपए मिलेंगे ! पेड़ ने कुछ देर सोचा और कहा की प्रिय तुम कहीं मत जाओ , तुम्हे रूपए की जरूरत है तो मेरे सारे फल तोड़ लो ,उन्हें बेच कर तुम्हे रूपए मिल जायेंगे !

लड़का तुरंत खुश हो गया ,और उसने उछल उछल कर सारे ही फल तोड़ लिए, जो कच्चे फल थे वो भी तोड़ लिए गए कुछ टहनिया भी टूट गयी ! अपनी शाखाएं टूट जाने पर भी पेड़ खुश था ! प्यार हमेशा ही कुछ देकर खुश रहता है और अहम् कुछ लेकर भी खुश नही रह पाता  ,उसकी मांग कभी भरती ही नहीं ! पेड़ ने तो इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया की लड़के ने मुड़कर उसे धन्यवाद भी नहीं किया , क्यूंकि उसका धन्यवाद तो इस बात में ही छुपा है की उसके प्रेमी ने उसकी भेट को स्वीकार तो किया ! वो इतने में ही पूरा खुश है !

फिर लड़का बहुत बहुत समय तक वापस नहीं आया ! उसे रूपए मिल गए थे और वो मिले हुए रूपए से और रूपए बनाने में व्यस्त था , इस व्यस्तता में वो पेड़ को भूल ही गया ! कई  बरस बीत गए और लड़का वापस  नहीं आया , पेड़ दुखी रहने लगा था ! वो दुखी मन से पुकार और प्राथना करता था अपने प्रेमी के लौट आने के लिए !
कई बरसो बाद लड़का ,पूरा आदमी बन कर  एक दिन वापस आया , उसे देखते ही पेड़ ने कहा की आओ मुझसे लिपट जाओ !
बच्चे ने कहा की ये सब भावनात्मक बातें बंद करो , वो सब बचपन की नादानी बातें थी , पर अब मैं  बच्चा नहीं हूँ ! अहम् को प्रेम सदा ही नादानी और पागलपन की बात ही समझता  है !
फिर भी पेड़ उससे कहता है की आओ मेरे साथ खेलो ,मेरी शाखो पर आराम करो मेरी छाँव में नाचो और गाओ !

आदमी कहता है की ये व्यर्थ की बातें बंद करो मुझे घर बनाना है , क्या तुम मुझे घर दे सकते हो ?
पेड़ कहता है की हम पेड़ो को घर की जरूरत नहीं होती इसलिए हमारे  पास घर नहीं होते ,घर की जरूरत तो सिर्फ इंसानों को ही होती है फिर इंसानों को घरो से क्या मिला है घर जितने बड़े हुए हैं इंसान का मन उतना ही छोटा हो गया है ! पर प्रिय  तुम परेशान  न हो ,तुम मेरी शाखाएं और टहनियां काट कर उनसे घर बना सकते हों !
आदमी बिना कोइ  समय व्यर्थ किये आरी लाया और पेड़ की सारी शाखाएं काट दी , पेड़ में सिर्फ एक मोटा ताना रह गया ! फिर भी पेड़ का प्रेम अपने प्रेमी के लिए कुछ भी कर कर खुश ही  था !
आदमी ने इस बार भी कोई धन्यवाद न दिया , वो घर बना कर रहने लगा और फिर से बरसो तक पेड़ के पास नहीं आया !
उधर पेड़ में कोई शाखें और पत्तियां नहीं बचे थे , जिससे वो कमज़ोर होता गया , पेड़ की आत्मा अपने प्रेमी को पुकारती रही ,पर कुछ न हुआ !

समय गुजरा , आदमी अब बुडा हो गया और एक दिन पेड़ के पास आकर खड़ा हुआ ! पेड़ ने पुछा की मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ ?तुम इतने समय के बाद आये ?

आदमी ने कहा की तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो , मुझे तो समुन्दर पार जाना है ,वहां से धन कमा  कर लाना है ,मुझे नाव की जरूरत है !
पेड़ ये सुन बहुत ही ख़ुशी से बोला की इसमें तो कोई समस्या नहीं हैं ,प्रिय तुम मेरा मोटा तना काट कर उसकी नाव बना सकते हो !मुझे बहुत ख़ुशी मिलेगी जो मैं तुम्हारे इस काम में मदद कर सकूं , बस ये याद रखना की इस बार जल्दी लौट कर आना , मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगा !
आदमी तुरंत एक आरी लाया और उसने पेड़ का ताना काट कर एक नाव बनाई और विदेश चला गया , फिर लौट कर नहीं आया ! पेड़ में अब बस जड़ ही रह गयी थी ! पेड़ इंतज़ार करता रहा पर आदमी न लौटा , अहम् सिर्फ वहीं  जाता है, की जहाँ से कुछ मिलने की उम्मीद हो ,पेड़ के पास तो अब कुछ बचा नहीं था देने के लिए वो तो बस एक जड़ ही था अब ! अहम् कभी  ख़त्म न होने वाली मांग है और प्यार दान है , प्रेम सम्राट है और अहम् भिखारी !
और एक दिन जब एक विदेशी राहगीर उस जड़ के पास आराम करने के लिए ठहरा तो उस जड़ बन चुके पेड़ ने उससे अपने दिल की बात कही की ....
मेरा एक प्रेमी विदेश गया था और वो अभी तक लौटा नहीं , मुझे उसकी बहुत चिंता रहती है , कही वो सफ़र में बह तो नहीं गया होगा , कही वो विदेश में भटक तो नहीं गया होगा , क्या विदेश में उसके साथ सब कुशल मंगल होगा की नहीं , पता नही वो जिन्दा भी होगा या नहीं ? मुझे उसका कोई समाचार कैसे मिले ? अब जब मेरा अंतिम समय भी आने वाला है तो ,अगर मुझे उसका कोई समाचार मिल जाता तो दिल को कुछ सुकून मिलता  और मैं चैन से मर सकता !
 पर मैं अपने प्रेमी को बुलाऊ  भी तो कैसे , वो मेरे बुलाये आएगा भी तो नहीं , मेरे पास तो अब कुछ देने के लिए हैं नहीं और वो सिर्फ लेने की ही भाषा समझता है !

Sunday, January 11, 2015

अंगूर और लोमड़िया


बचपन में हम सुनते थे की लोमडी कहती थी की अंगूर खट्टे है। अब लगता है की कुछ और भी तो कहती हैं लोमड़िया,कई प्रकार की लोमड़िया हैं जो अलग अलग बाते कहती है ।

एक जंगल में लोमड़ियों का झुण्ड अंगूर तोड़ रहा है। कुछ लोमड़ियो ने उछल उछल कर कई गुच्छे तोड़ लिए है। बहुत सी लोमडियो की छलांग अंगूर तक पहुच नहीं पा रही। ऐसे में पहले तरह की चालक लोमड़ीया जो हमें बचपन में स्कूल की किताबो में मिली थी ,उन्होंने मान लिया  हैं की अंगूर खट्टे हैं।दुसरे तरह की ज्यादा चालाक लोमड़ीयो ने तो खुद को मनाना शुरू कर दिया है की उन्हें तो भूख ही नहीं है वो तो बस ऐसे ही साथ देने आ गयी। तीसरे तरह की और भी ज्यादा चालाक  लोमड़िया मान रही है की उनसे अंगूर नहीं टूटेंगे तो वो तय्यारी कर रही है दूसरो के अंगूर चुराने की। चौथे तरह की आम लोमड़ियो जिन्हें अपने काम के लिए अपने स्वाभिमान से मतलब नहीं है ,उन्होंने अंगूर के लालच में जो लोमड़िया अंगूर तोड़ पा रही थी उनके आगे पीछे घूमना शुरू कर दिया है वो उन लोमड़ियों के समर्थन में बहादुरी के नारे लगा रही हैं।पांचवे तरह की स्वाभिमानी पर गैर साहसी लोमड़िया मान गयी है की अंगूर उनसे टूटेंगे नहीं इसलिए आज वो झूंड छोड़ अपने हिसाब का छोटा मोटा कुछ खाना पीना ढूँढने जा रही है ,उन्होंने अंगूर की रेस छोड़ दी है। छठे तरह की अभिमानी पर गैर साहसी लोमड़िया भी तो है जो न रेस छोड़ पा रही हैं और अभिमान की वजह से ये भी नहीं मानती की उनसे अंगूर नहीं टूटेंगे फिर साहस भी नहीं कर पाती ऊंची छलांग का,ये सब डिप्रेसन का शिकार हो गयी है,सबसे बुरी हालत इन्ही लोमड़ियों की है। सबसे मजे में हैं वो सातवे तरह की लोमड़िया जो स्वाभिमानी भी है और साहसी भी और समझदार भी ये तय्यारी कर रही हैं ऊंची छलांग की इन्हें उम्मीद नहीं वरन विश्वाश है की किसी छलांग में तो अंगूर उनकी बाजुओं में भी आ ही जायेंगे।

Thursday, January 8, 2015

नयी उम्मीदों का बोलने वाला राजा ....

एक जंगल में शेरो का बहुत बड़ा झुण्ड था | शेरो का एक राजा था औरकई सेनापती ,मंत्री , खजांची भी थे ! सेनापती के साथ शेर अलग अलग टुकड़ियों में शिकार करने जाते और सारा शिकार जो जमा होता उसे सारे शेरो के परिवारों में व्यवस्था के अनुसार बांटा जाता था | परा राजा एक दम मौन था उसका किसी व्यवस्था पर कोई भी नियंत्रण नहीं था ! सारे आम शेर उसकी व्यवस्था में परेशान थे , सेनापति शेरो से ८ घंटे की बजाये १२ घंटे काम कराते थे ! सेनापति शिकार करने शेरो के ही भेजते थे और शेरो के फंस जाने पर कोई मदद भी नहीं होती थी , जहाँ ३ शेरो को भेजा जाना चाहिए वहां अकेले शेर को भी भेज दिया जाता था ! खजांची जो शिकार का बटवारा करते थे वो ज्यादा हिस्सा खुद के लिए और राजा के हिस्से में रख देते थे , शेरो को उनके अधिकार से आधा ही मिलता था ..कईं राते शेरो के घरवालो को आधे पेट ही गुजारनी पड़ती थीं ! इसके बाद भी सेनापति ,मंत्री, खजांची कोई भी शेरो की किसी भी जायज मांग को नहीं सुनते थे ! और राजा मौन था !
ऐसी ही कठिनाई में सबका जीवन गुजर रहा था की चुनाव आये ! एक नए उमीदवार ने सभी शेरो में उम्मीद जगाई अच्छे दिनों की ..ये उमीदवार पुराने राजा की तरह मौन नहीं था ! ये बोलता था और हर समस्या का हल सुनाता था ! नयी उमीदो के बीच सभी शेरो ने नए उमीदवार को भरी मतों से राजा बनाया ! इतने भारी मतों से जीतने के बाद सारे जंगल को लगा की अब अच्छे दिन आयेंगे ! पर व्यवस्था वैसी ही रही ..बस मौन राजा के स्थान पर एक बोलने वाला राजा था ..पर सेनापति आज भी शेरो से ८ के बजाए १२ घंटे काम कराते हैं ! मंत्री आज भी उनकी बहादुरी का इनाम सेनापतियो को दे देते हैं ! खाजाची आज भी उनके हिस्से का शिकार राजा को या खुद को देते हैं !.
इसके बाद धीरे धीरे जंगल में नये राजा के खिलाफ भी आवाज उठाना शुरू हुई ! गुपचुप दो चार शेर महफ़िल में ,नुक्कड़ो पर नए राजा के खिलाफ भी बातें करने लगे ! पर नए राजा के पूर्ण समर्थक और वो शेर जो नए राजा पर आँख बंद भरोसा करते हैं वो कहने लगे हैं की देखो राजा जी क्या कहते हैं राजा जी सही ही कहते हैं ..नए राजा जी ने सरकार बनते ही कह दिया था की व्यवस्था सरकार से नहीं बदलेगी शेरो को ही व्यवस्था बदलने के लिए आवाज उठानी ही होगी ! शेरो को पहले खुद उस सेनापति का विरोध करना होगा जो नाजायज काम करता है , शेरो को खुद उठकर कहना होगा की हम ८ घंटे के बाद काम नहीं करेंगे ! शेरो को खुद आवाज उठानी होगी की वो मंत्रिओं की ज्यादती बर्दाश्त नहीं करेंगे ! देखो राजा जी मन की बात कह रहे हैं ..बार बार कह रहे हैं ..नए नए तरीके से कह रहे हैं की आप खुद आवाज उठाओ ..खुद मांग करो ..अकेले सरकार और राजा कुछ नहीं कर पायेंगे !
पर शेरो को खुद ही करना होता तो क्या वो मौन राजा के समय भी कर सकते थे?, या नया राजा अपनी बातो से शेरो को जगा पायेगा और समझा पायेगा की व्यवस्था वो बदले ,व्यवश्था सरकार से नहीं बदलेगी ? या शेर नए राजा से भी पुराने मौन राजा की तरह नाउम्मीद हो जायेंगे और विरोध बढता रहेगा ..ये सब समय बतायेगा ..देखिये आगे क्या होता है !

Thursday, January 1, 2015

सास बहु और त्रासदी

सास बहु और त्रासदी।
पिछले दो दशको में भारतीय मध्यम वर्ग मे आयी महिलाओ  की आजादी से सबसे कठिन विडंबना और परीक्षा उन माताओं के साथ खड़ी हुई है जो इस दशक में सास बन रही हैं।
भारतीय समाज में हमेशा  से ही सास बहु का रिश्ता एक जैसा ही रहा है, सास भी घर में ही शोषित रहती थी और बहु भी,पुरानी बहु जब सास बनती थी तो उसकी नयी बहु भी घर में शोषित होने की व्यवश्था में ही जीती थी। तो किसी सास के मन में गहरे सवाल उठने की संभावना ही न थी। क्यूंकि जो उसके साथ हुआ वही महिलाओं  का धर्म बना दिया गया। सबने मान लिया था की पति परमेश्वर है और पति के घर के भीतर ही सारी जिन्दगी पति के परिवार की सेवा करना महिलाओं का धर्म है।
पर इस दशक में पहली बार बहु कुछ आज़ाद है वो वैसा गुलामी का जीवन जीने को राजी नहीं जैसा उसकी सास ने अपनी सास से सीखा और जिया।
आज की सास के साथ ये बडी त्रासदी है ,उनकी बहु की आजादी उनके सामने बहुत गहरे सवाल खड़े कर देती है। उनके पास दो ही विकल्प है या तो वो ये मान लें की जिस तरह उन्होंने अपने पति और उसके माँ बाप की सेवा,घर की साफ़ सफाई ,किचन और बच्चो पालने में ही सारा जीवन गुज़ार दिया और अपनी बहु की तरह न किसी काम से इंकार किया और न इतने सुख,आराम और आजादी ही  मिली जो बहू को मिल रही हैं, ऐसा जीवन जीकर उन्होंने अपना सारा जीवन ही व्यर्थ गवां दिया ...पर ये उनका मन और अहम् दोनों ही नहीं मानने देंगे।
दूसरा विकल्प ये मानने का है की बहु का जीने का तरीका ही गलत है उसे उनसे कुछ सीखना चाहिए उनकी भी कुछ सुनना चाहिए। पर ये उन्हें कोई कहने ही नहीं देगा।फिर इसे मानना  असम्भव ही है और गलत भी है। ऐसे में इस दशक की सास के पास भीतर ही भीतर घुटने की त्रासदी ही बचती है।
इस त्रासदी से बचना है तो उन्हें ये समझना होगा की जीवन में आपने जो कुछ भी किया ,मुल्य उसका नहीं हैं, हो सकता है की जो चौका चूल्हा और सेवा आपने जीवन भर की आपकी बहु उस तरह के काम को  किसी नौकर से करा जीवन के और रूपों को निभाती हो कुछ मौज भी करती हो जो हर किसी को करनी भी चाहिए पर आपने कभी नहीं की....फिर भी आपकी असली पहचान आपका काम नहीं आपके काम का निष्काम होना है। आपने जो भी किया जैसा भी किया और जब भी किया हमेशा ही बिना बदले में कुछ चाहे किया। आप सारा जीवन ही निष्काम रहे यही आपको जीवन की पहचान और उपलब्धि है न की ये की आपने क्या किया? आपका बिना किसी चाह और शिकायत के परिश्रम करना ही आपके जीवन का सौंदर्य है और बस यही वो अनमोल बात है जो आपकी बहु को आपसे सीखनी भी चाहिए, न की ये की क्या किया जाए और कैसे किया जाए, क्या कैसे क्यूं का जवाब हर पीड़ी और समय के साथ बदलता ही रहेगा