Saturday, May 2, 2015

लड्डू वाली लड़की ....माँ !

गाँव में एक शादी से पहले लगुन् का कार्यक्रम चल रहा था। कई जगह जिसे तिलक भी कहते हैं। नाम कुछ भी दो असल में ये दहेज़ का कार्यक्रम होता है। और कार्यक्रम में शिरकत करने वालो के दिमाग में एक ही सवाल घूमता है की "कितने लाख ?"
मुझे इस सवाल से मतलब था नहीं तो मैं सबसे पीछे जाकर बैठ गया। पास में एक 3-4 साल की छोटी सी प्यारी सी लड़की बैठी थी वो भी लेन देन की लालची प्रवृत्ति को धार्मिक चादर उड़ा देने वाले इस झूठे तामझाम के वातावरण से अनजान थी। मैं उस लड़की से ही बात करने लगा।
मैं-कहाँ से आई हो?
लड़की-इसी गाँव से|
मैं-कहाँ रहती हो।
लड़की।-वो जमनी का पेड़ है न। उसी के नीचे हमारा घर है।
मैं-जमनी पर तो बहुत फल आते होंगे।मुझे भी देना।
लड़की-नहीं उस पर फूल आते हैं।
मैं-नहीं फल भी आते होंगे।
लड़की- नहीं उस पर फूल ही आते हैं।फूल ही आये हैं बस।

मैं समझ गया की लड़की ने अभी अपने होश में फल उगते देखे ही न होंगे ...शायद अगले बरस ये ऐसा न कहे।
ऐसे ही कुछ कहते सुनते कार्यक्रम ख़त्म हुआ और सबको लड्डुओं का डिब्बा बांटा जाने लगा। एक डिब्बे में चार लड्डू थे।मुझे चार लड्डू खाने नहीं थे तो मैंने उस छोटी बच्ची से कहा ..
मैं-तू मुझे अपने डिब्बे में से एक लड्डू दे दे मैं तुझे अपना पूरा डिब्बा दे दूंगा
लड़की-नहीं चाहिए।
मैं-अरे तेरा घर इसी गाँव में है तू दोनों डिब्बे घर ले जाना ...बाद में खा लेना।
लड़की- नहीं चाहिए।
मैं-अरे देख दूसरे बच्चे भी कितने डिब्बे लिए घूम रहे हैं।सबने पुराने डिब्बे छिपा कर और ले लिये।
लड़की- तुम डिब्बा दोगे ही नहीं।
मैं- नहीं ...मैं दूंगा...तू एक लड्डू तो दे।
लड़की- तुम भाग जाओगे।
मैं -नहीं मैं नहीं भागूंगा।
लड़की-नहीं तुम भाग जाओगे...
लड़की फिर कुछ नहीं बोली।थोड़ी देर में मैंने खुद ही अपना डिब्बा लड़की को देकर कहा की तू ऐसे ही रख ले ...मुझे तेरा लड्डू नहीं चाहिए। लड़की ने मेरा डिब्बा जमीन पर फेका और पैर से ठोकर मारने लगी।मुझे कहा की नहीं चाहिए... मुझे समझ ही नहीं लगा की ऐसा क्या करा मैंने।
उसी पल एक और गाँव की छोटी लड़की उसे बुलाने आई और मुझसे बोली की ....पता है की इसकी तो माँ ही नहीं है...इसकी माँ इसे छोड़कर भाग गयी......
उसने लड़की से कहा की चल तेरे पापा ढूंढ रहे हैं...
मुझे लड़की पर कुछ दया सी आई लगा की शायद माँ के जाने का इतना असर है की लड़की अब किसी से भी कुछ नहीं चाहती इसकी जामुनी के पेड़ पर आये फूल अब जामुनी नही बनते.....मैं खाने के पंडाल की तरफ मुड़ गया।
लड़की के बारे मैं कुछ सोचता हुआ मै पंडाल तक पहुच नहीं पाया था की फिर किसी ने पीछे से मेरा हाथ छुआ। मुड़ कर देखा तो वो ही लड़की थी हाथ में एक लड्डु लिए हुए। सारे विचार खो से गए। हल्की सी नम आँखों से मैंने उस लड्डु को हाथ में लिया और तुरंत वो लड़की ....वापस भाग गयी.....
उस लड़की ने मेरे लड्डु तो लिए नहीं अब मैं उसका लड्डु कैसे खाता..... पर लड़की इतनी मासूम थी की उसका ये कर मैंने रख लिया और इस दुआ के साथ ही लड्डु खाया ....की इसकी माँ वापस आ जाए। कोई तो भगवान से कहे की ये लड़की बिना माँ के खुद ही माँ जैसी हो गयी है। दुसरो के लड्डू नहीं लेती अपने ही बाटें चली जाती है।...

No comments:

Post a Comment