Saturday, May 2, 2015

किसान का मुआवजा..... किसका ?

राहगीर -ऐ भैया सुना है की तुम्हारे गाँव में तो चैक बंट भी गए।बढ़िया मुवावजा मिला सबको। इस रास्ते से जब भी गुजरता था तुम्हे भी बड़ी मेहनत करते देखता था इस खेत में।तुम्हारी फसल बर्बाद हुई तो बड़ा दुःख हुआ था मुझे भी।खेर जाने दो अब मुआवजे के चैक मिल रहे हैं तो कुछ मदद तो हो ही गयी। तो कितना मुआवजा मिला तुम्हे।
किसान- कहाँ साहब। मुआवजा हमारे लिए कहाँ। हमें कोई मुआवजा नहीं मिलना।
राहगीर -क्यूँ भाई?
किसान- सरकार ने मुआवजा किसानो को दिया है और सरकारी खाते में हम किसान हैं ही नहीं।
राहगीर-ऐसा क्यूँ कहते हो भाई।
किसान-सही ही तो कहे हैं। जमीन पर हल चलाने से या बीज बोने से किसान नहीं बनते। सरकारी हिसाब में किसान वही है की जो जमीन का मालिक है।
राहगीर- ये तुम्हारी जमीन नहीं है।
किसान - हमने तो बटाई पर ली है। जमीन पर हम मेहनत करते हैं और फसल की कमाई का आधा हिस्सा मालिक को दे देते हैं।
राहगीर- अच्छा तो मुआवजा जमीन के मालिक को मिला ।
किसान-हाँ ..सरकार के बहीखाते में वही किसान हैं हमारी कोई गिनती नहीं।
राहगीर- मालिक क्या करते हैं?कहाँ रहते हैं?
किसान- बड़े रूपए वाले हैं,शहर में रहते हैं रेलवे में बड़े अफसर हैं। पिछले साल ही ये जमीन खरीदे हैं 20 लाख में।
राहगीर- अरे उन्हें मुआवजे की क्या जरूरत।
किसान-पर किसान तो वो ही हैं।हम तो सुने हैं की अमिताभ जी भी किसान हैं और अपने नेता जी भी।
राहगीर-अच्छा तो नेताजी को भी मुआवजा मिला होगा।
किसान-हाँ मिला ही होगा।
राहगीर-तो तुम जमीन क्यूँ नहीं खरीद लेते। तुम भी बन जाओ किसान।
किसान-क्यूँ मज़ाक करते हो साहब। हमारी खेती की कमाई में तो हमारे बच्चे पढ लिख ले वो ही संभव नही हो पा रहा। जमीन तो सारा जीवन की कमाई जोड़ कर भी नही आ पाएगी। हम किसान नही मज़दूर है साहब।इस जमीन पर मजदूरी करते हैं और ये जमीन हमे इतना नहीं देती की हम सरकारी बहीखाते में मज़दूर से किसान बन जाए। जमीन तो बड़े रूपए वाले ही खरीदते हैं।
राहगीर- तुम्हारे पास कभी कोई ज़मीन नहीं रही।
किसान-थी साहब 10 बीगा ज़मीन।पहले बच्चों की पढाई फिर पत्नी की बिमारी ,बच्चों की शादी ,बैंक का लोन ,फिर कभी बाढ़ कभी सुखा ..और फसल की खराबी धीरे धीरे कर 8 बिगा बिक गयी। अब 2 बीगा बची है दूसरे गाँव में।
राहगीर-तो तुम्हारी 8 बीगा ज़मीन तुम्हारे जैसे खेतो में काम करने वाले किसान ने खरीदी या किसी शहर के बड़े साहब ने।
किसान-क्यूँ फिर फिर मज़ाक करते हो साहब। हमारे जैसे लोगो की अब ये औकात कहाँ की जमीन खरीदे। जमीन की कीमते अब हमारी पहुच में नहीं। मैंने चार साल पहले 2 बीगा 4 लाख में एक बड़ी बैंक के मेनेजर को बेचीं थी सुना है की अब वो उसी जमीन को 6 लाख में बेच रहे हैं। जमीन अब किसान की खेती से ज्यादा बड़े लोगो के प्रॉपर्टी के धंधे के काम आ रही है।
राहगीर-हाँ ये तो है। पर तुमने कहा की दो बीगा जमीन अभी भी तुम्हारे पास है उस पर तो मुआवजा मिला ही होगा।
किसान- वो गेहू तो मुझे इस मालिक वाली जमीन से ही मिल जाते हैं न तो मैं अपनी 2 बीगा ज़मीन पर अपने घर के खाने के लिए दाल और सब्ज़ी ऊगा लेता हूँ। पर मुआवजा तो गेहू का ही मिला है न साहब। इसलिए उसका भी मुआवजा नहीं मिला।

No comments:

Post a Comment