हड़ताल
९ दिन गुजर चुके हैं की ऑफिस नहीं गया, नहीं बीमार नहीं हूँ और न ही घर में किसी कार्यक्रम का आयोजन है, ये
दोनों ही कारण किसी भी संश्था के १२०००
कर्मचारियों के एक साथ काम से गायब हो जाने की
की वजह नहीं बन सकते | यहाँ तो
बहुत साधारण सा कारण है “हड़ताल “, साधारण सा इसलिए कहा क्यूंकि हर सरकारी संस्था में आए दिन कोई न कोई यूनियन
हड़ताल की धमकी देती रहती है , और अधिकांशतः हड़ताल की तिथि आने से एक दो दिन पहले
ही सारी मांगे मंजूर हो जाती हैं | अब पता नहीं , हो सकता है की यूनियन को पहले से
ही पता होता हो की इस बार मांगे पूरी होने
ही वाली हैं , इसीलिये बिना मौका गवाए अपने खाते में एक और उपलब्धि जोड़ने के लिए
हड़ताल का नोटिस मेनेजमेंट को थमा दिया
जाता हो | पर इस बार ऐसा नहीं हुआ ,मेरे कैडर के १२००० लोग एक साथ काम छोड़ कर चले गए हैं और
मेनेजमेंट ने अभी तक तो ऐसा ही दिखाया है की
जैसे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता , इस बार वो नहीं झुकेंगे, इस बार वो दिखा देंगे
की वो एक मजबूत मैनेजमेंट हैं जो किसी दवाब में नहीं आता |
सही है मेनेजमेंट ऐसी ही होनी चाहिए ,बिना किसी दवाब में निष्पक्ष निर्णय लेने
वाला , पर चुनाव करने वाली मेनेजमेंट नहीं होनी चाहिए की एक यूनियन की बात सुनेगे
दुसरे की नहीं सुनेगे , ५०००० लोग दवाब बनायेंगे तो सुनेगे, १२००० में अभी संख्या
कम है इतनी संख्या की सही बात भी नहीं
सुनेगे | वैसे अगर एक पारदर्शी तरीके से काम करने वाली मेनेजमेंट हो तो यूनियन की आवश्यकता
ही न पड़े ,पर यहाँ किसी जरूरतमंद की ट्रान्सफर एप्लीकेशन को सिर्फ यह कह कर फ़ाइल में लगाने से
भी मना कर दिया जाता है की स्टाफ बहुत कम है इसीलिये बड़े
साहब ने ट्रान्सफर फाइल मूव करने से मना किया
है और उन्ही बड़े साहब के हस्ताक्षर से ही हर हफ्ते किसी न किसी ऊंची जान पहचान वाले
का ट्रान्सफर होता ही है.....यहाँ किसी की पे रिविजन के बाद कम कर दी गयी तनख्वाह को सही करने की
मांग को ९ दिन की हड़ताल के बाद भी नहीं सुना जाता और किसी की पहले से ही बड़ी हुई
तनखाह को और बडाने की मांग बिना हड़ताल शुरू हुए ही पूरी कर दी जाती है !
ये भी एक हस्याद्पद सी बात है , की
यहाँ हड़ताल भी आधिकारिक और गैर आधिकारिक
होती हैं ..कहते हैं की हमारा काम पर न जाना गैर कानूनी यानि इल्लीगल है , यहाँ
ऐसी विधियाँ भी हैं जिनसे काम पर न जाने को भी अधिकारिक बनाया जा सकता है
जिनका इस्तेमाल हमारी यूनियन प्रायः नहीं करती | शायद इसलिए भी क्यूंकि हमारी यूनियन में सिर्फ वो
युवा हैं जिन्होंने पिछले दशक में ही संश्था का दामन थामा है , और युवा नियम से ज्यादा सच्चाई की ताकत में भरोषा रखते हैं और बातो को घुमा
फिरा कर कहने सुनने की बजाय सीधा और
तर्कसंगत कहते हैं , अगर आप को लगता है की आपकी मांग वाजिब है आप एक न्याय पूर्ण अधिकार के लिए जंग कर रहे
हैं तो मौके पर मैदान से बचाकर निकाल लेने वाले नियमो का इन्तजाम क्यूं किया जाए ?
यूनियन के नेताओं को मैं कभी नहीं समझ पाया , सोचने सी बात
हैं इतनी ऊर्जा और समय ये यूनियन के लिए क्यूं देते हैं इससे इनका क्या लाभ, आखिर
अगर यूनियन का सघर्ष सफल होता हैं तो इसका उन्हें कोई अलग से विशेष लाभ तो होता नहीं , आखिर कोई भी सदस्य अपने बड़े हुए वेतनमान में से कोई भी हिस्सा यूनियन के
नेता जी के नाम तो करेगा नहीं और न ही
पूरे देश भर में में बटें हुए १२-१५००० लोगो में लोक प्रिय हो जाने से उनके ऍम एल ए या एम् पी बनने का रास्ता खुलता है ,और एक तरह से सोचो तो पुण्य
भी शायद कम ही मिलता हो क्यूंकि उतराखंड की बाड़ में फसे लोगो , या कुछ अनाथ गरीब बच्चो की मदद
करना अलग बात है, यहाँ तो वो ऐसे लोगो की मदद कर रहे हैं की जो पहले से ही अच्छा
खा पी रहे हैं , हाँ हो सकता हैं कुछ
अन्याय उनके साथ हो रहा हो पर ये अन्याय उस अन्याय के सामने कुछ भी नहीं जो गरीबो
के साथ अस्पतालों में या त्रासदी में फसे लोगो के साथ केदारनाथ में होता हैं, ऐसे
जरूरत मंद लोगो की मदद में अपनी उर्जा लगात्ते तो भी मैं समझ पाता पर अपने साथ काम करने वालो के लिए अपना सारा तन मन धन देना वो भी तब जब उन्ही में
से कुछ लोग उनकी निंदा करने का कोई मौका न छोड़ते हो ,ये यूनियन के नेता लोग मेरी
समझ के परे हैं ! हाँ इतना जरूर समझता हूँ की अगर कोई अपने इस लोक और दुसरे लोक दोनों में हे कोई लाभ न होने पर भी मेरी मदद के लिए आगे खड़ा है तो एक
मायने में वो मुझे अपना कर्जदार तो बना ही
देता है | और इस कर्ज को बिना कुछ दिए भोगना भी नैतिक नहीं कहा जा सकता |
समझ में ये भी नहीं आता की वो १ प्रतिशत लोग सही होते हैं या गलत जो अपने ९९
प्रतिशत साथियों के हड़ताल पर जाने के बाद भी काम करते रहते है और संश्था को
अपनी सेवाएं देते रहते है , कभी लगता है की यही लोग सही है, सही ही नहीं ये सचमुच
संत हैं , क्य्योंकी जिस संश्था का नमक खाते हैं उसका नुकसान नहीं होने देते , और
किसी से कुछ मांगते नहीं, जो भगवान ने दिया है उसी में संतुष्ट रहते हैं,सिर्फ अपना
कर्म करते रहे , कुछ असंतोष नहीं है जो मिला, जितना मिला उतने में खुश रहे , कुछ भी तो गलत नहीं
है हड़ताल पर न जाने में ! और लाभ ये है की अगर कहीं यूनियन का संघर्ष विफल हुआ तो
हड़ताल पर न जाने वालों को किसी भी विपरीत परिणाम को नहीं झेलना पड़ेगा |
पर ये भी समझना होगा की जिस तरह संश्था से हर माह तनख्वाह लेने पर हम संस्था के कर्जदार हो जाते है और जिस वजह से हमारी संश्था को नुकसान पहुचाने की कोई भी कोशिश अनैतिक हो जाती है , उसी तरह यूनियन के सघर्ष में बिना शामिल हुए
संघर्ष से मिलने वाले लाभ को भोगने से भी तो हम यूनियन के कर्ज़दार हो ही जाते है ,
फिर क्या संघर्ष के बाद वेतनमान बदने पर हड़ताल पर न जाने वाले ये कह पाएंगे की
क्यूंकि मैं इस संघर्ष का हिस्सा नहीं था इसलिए मुझे इस लाभ का हिस्सा भी नहीं
बनना मुझे मेरा पुराना वेतनमान ही चाहिए | फिर हड़ताल पर न जाने वाले न चाहते हुए
भी यूनियन का नुक्सान तो करते ही हैं हो सकता है की वो चाहते हो की उन्हें यूनियन
से कोई मतलब नहीं ,वो न यूनियन का लाभ चाहते हैं और न ही नुक्सान ..पर उनके ऐसा
कहने के बावजूद यूनियन का नुक्सान तो होता ही है ,आखिर यूनियन का अर्थ ही संख्या
बल और संश्था के समस्त कार्यों को रोक देने की ताकत है जिसमे हड़ताल पर न जाने
वाले न चाहते हुए भी बाधा बनते हैं ,
अच्छा हो की कोई ऐसा तरीका हो की जिसे संश्था से अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभानी है उसके लिए हड़ताल के बाद कुछ दिन ओवरटाइम का प्रावधान भी हो !