Sunday, January 11, 2015

अंगूर और लोमड़िया


बचपन में हम सुनते थे की लोमडी कहती थी की अंगूर खट्टे है। अब लगता है की कुछ और भी तो कहती हैं लोमड़िया,कई प्रकार की लोमड़िया हैं जो अलग अलग बाते कहती है ।

एक जंगल में लोमड़ियों का झुण्ड अंगूर तोड़ रहा है। कुछ लोमड़ियो ने उछल उछल कर कई गुच्छे तोड़ लिए है। बहुत सी लोमडियो की छलांग अंगूर तक पहुच नहीं पा रही। ऐसे में पहले तरह की चालक लोमड़ीया जो हमें बचपन में स्कूल की किताबो में मिली थी ,उन्होंने मान लिया  हैं की अंगूर खट्टे हैं।दुसरे तरह की ज्यादा चालाक लोमड़ीयो ने तो खुद को मनाना शुरू कर दिया है की उन्हें तो भूख ही नहीं है वो तो बस ऐसे ही साथ देने आ गयी। तीसरे तरह की और भी ज्यादा चालाक  लोमड़िया मान रही है की उनसे अंगूर नहीं टूटेंगे तो वो तय्यारी कर रही है दूसरो के अंगूर चुराने की। चौथे तरह की आम लोमड़ियो जिन्हें अपने काम के लिए अपने स्वाभिमान से मतलब नहीं है ,उन्होंने अंगूर के लालच में जो लोमड़िया अंगूर तोड़ पा रही थी उनके आगे पीछे घूमना शुरू कर दिया है वो उन लोमड़ियों के समर्थन में बहादुरी के नारे लगा रही हैं।पांचवे तरह की स्वाभिमानी पर गैर साहसी लोमड़िया मान गयी है की अंगूर उनसे टूटेंगे नहीं इसलिए आज वो झूंड छोड़ अपने हिसाब का छोटा मोटा कुछ खाना पीना ढूँढने जा रही है ,उन्होंने अंगूर की रेस छोड़ दी है। छठे तरह की अभिमानी पर गैर साहसी लोमड़िया भी तो है जो न रेस छोड़ पा रही हैं और अभिमान की वजह से ये भी नहीं मानती की उनसे अंगूर नहीं टूटेंगे फिर साहस भी नहीं कर पाती ऊंची छलांग का,ये सब डिप्रेसन का शिकार हो गयी है,सबसे बुरी हालत इन्ही लोमड़ियों की है। सबसे मजे में हैं वो सातवे तरह की लोमड़िया जो स्वाभिमानी भी है और साहसी भी और समझदार भी ये तय्यारी कर रही हैं ऊंची छलांग की इन्हें उम्मीद नहीं वरन विश्वाश है की किसी छलांग में तो अंगूर उनकी बाजुओं में भी आ ही जायेंगे।

Thursday, January 8, 2015

नयी उम्मीदों का बोलने वाला राजा ....

एक जंगल में शेरो का बहुत बड़ा झुण्ड था | शेरो का एक राजा था औरकई सेनापती ,मंत्री , खजांची भी थे ! सेनापती के साथ शेर अलग अलग टुकड़ियों में शिकार करने जाते और सारा शिकार जो जमा होता उसे सारे शेरो के परिवारों में व्यवस्था के अनुसार बांटा जाता था | परा राजा एक दम मौन था उसका किसी व्यवस्था पर कोई भी नियंत्रण नहीं था ! सारे आम शेर उसकी व्यवस्था में परेशान थे , सेनापति शेरो से ८ घंटे की बजाये १२ घंटे काम कराते थे ! सेनापति शिकार करने शेरो के ही भेजते थे और शेरो के फंस जाने पर कोई मदद भी नहीं होती थी , जहाँ ३ शेरो को भेजा जाना चाहिए वहां अकेले शेर को भी भेज दिया जाता था ! खजांची जो शिकार का बटवारा करते थे वो ज्यादा हिस्सा खुद के लिए और राजा के हिस्से में रख देते थे , शेरो को उनके अधिकार से आधा ही मिलता था ..कईं राते शेरो के घरवालो को आधे पेट ही गुजारनी पड़ती थीं ! इसके बाद भी सेनापति ,मंत्री, खजांची कोई भी शेरो की किसी भी जायज मांग को नहीं सुनते थे ! और राजा मौन था !
ऐसी ही कठिनाई में सबका जीवन गुजर रहा था की चुनाव आये ! एक नए उमीदवार ने सभी शेरो में उम्मीद जगाई अच्छे दिनों की ..ये उमीदवार पुराने राजा की तरह मौन नहीं था ! ये बोलता था और हर समस्या का हल सुनाता था ! नयी उमीदो के बीच सभी शेरो ने नए उमीदवार को भरी मतों से राजा बनाया ! इतने भारी मतों से जीतने के बाद सारे जंगल को लगा की अब अच्छे दिन आयेंगे ! पर व्यवस्था वैसी ही रही ..बस मौन राजा के स्थान पर एक बोलने वाला राजा था ..पर सेनापति आज भी शेरो से ८ के बजाए १२ घंटे काम कराते हैं ! मंत्री आज भी उनकी बहादुरी का इनाम सेनापतियो को दे देते हैं ! खाजाची आज भी उनके हिस्से का शिकार राजा को या खुद को देते हैं !.
इसके बाद धीरे धीरे जंगल में नये राजा के खिलाफ भी आवाज उठाना शुरू हुई ! गुपचुप दो चार शेर महफ़िल में ,नुक्कड़ो पर नए राजा के खिलाफ भी बातें करने लगे ! पर नए राजा के पूर्ण समर्थक और वो शेर जो नए राजा पर आँख बंद भरोसा करते हैं वो कहने लगे हैं की देखो राजा जी क्या कहते हैं राजा जी सही ही कहते हैं ..नए राजा जी ने सरकार बनते ही कह दिया था की व्यवस्था सरकार से नहीं बदलेगी शेरो को ही व्यवस्था बदलने के लिए आवाज उठानी ही होगी ! शेरो को पहले खुद उस सेनापति का विरोध करना होगा जो नाजायज काम करता है , शेरो को खुद उठकर कहना होगा की हम ८ घंटे के बाद काम नहीं करेंगे ! शेरो को खुद आवाज उठानी होगी की वो मंत्रिओं की ज्यादती बर्दाश्त नहीं करेंगे ! देखो राजा जी मन की बात कह रहे हैं ..बार बार कह रहे हैं ..नए नए तरीके से कह रहे हैं की आप खुद आवाज उठाओ ..खुद मांग करो ..अकेले सरकार और राजा कुछ नहीं कर पायेंगे !
पर शेरो को खुद ही करना होता तो क्या वो मौन राजा के समय भी कर सकते थे?, या नया राजा अपनी बातो से शेरो को जगा पायेगा और समझा पायेगा की व्यवस्था वो बदले ,व्यवश्था सरकार से नहीं बदलेगी ? या शेर नए राजा से भी पुराने मौन राजा की तरह नाउम्मीद हो जायेंगे और विरोध बढता रहेगा ..ये सब समय बतायेगा ..देखिये आगे क्या होता है !

Thursday, January 1, 2015

सास बहु और त्रासदी

सास बहु और त्रासदी।
पिछले दो दशको में भारतीय मध्यम वर्ग मे आयी महिलाओ  की आजादी से सबसे कठिन विडंबना और परीक्षा उन माताओं के साथ खड़ी हुई है जो इस दशक में सास बन रही हैं।
भारतीय समाज में हमेशा  से ही सास बहु का रिश्ता एक जैसा ही रहा है, सास भी घर में ही शोषित रहती थी और बहु भी,पुरानी बहु जब सास बनती थी तो उसकी नयी बहु भी घर में शोषित होने की व्यवश्था में ही जीती थी। तो किसी सास के मन में गहरे सवाल उठने की संभावना ही न थी। क्यूंकि जो उसके साथ हुआ वही महिलाओं  का धर्म बना दिया गया। सबने मान लिया था की पति परमेश्वर है और पति के घर के भीतर ही सारी जिन्दगी पति के परिवार की सेवा करना महिलाओं का धर्म है।
पर इस दशक में पहली बार बहु कुछ आज़ाद है वो वैसा गुलामी का जीवन जीने को राजी नहीं जैसा उसकी सास ने अपनी सास से सीखा और जिया।
आज की सास के साथ ये बडी त्रासदी है ,उनकी बहु की आजादी उनके सामने बहुत गहरे सवाल खड़े कर देती है। उनके पास दो ही विकल्प है या तो वो ये मान लें की जिस तरह उन्होंने अपने पति और उसके माँ बाप की सेवा,घर की साफ़ सफाई ,किचन और बच्चो पालने में ही सारा जीवन गुज़ार दिया और अपनी बहु की तरह न किसी काम से इंकार किया और न इतने सुख,आराम और आजादी ही  मिली जो बहू को मिल रही हैं, ऐसा जीवन जीकर उन्होंने अपना सारा जीवन ही व्यर्थ गवां दिया ...पर ये उनका मन और अहम् दोनों ही नहीं मानने देंगे।
दूसरा विकल्प ये मानने का है की बहु का जीने का तरीका ही गलत है उसे उनसे कुछ सीखना चाहिए उनकी भी कुछ सुनना चाहिए। पर ये उन्हें कोई कहने ही नहीं देगा।फिर इसे मानना  असम्भव ही है और गलत भी है। ऐसे में इस दशक की सास के पास भीतर ही भीतर घुटने की त्रासदी ही बचती है।
इस त्रासदी से बचना है तो उन्हें ये समझना होगा की जीवन में आपने जो कुछ भी किया ,मुल्य उसका नहीं हैं, हो सकता है की जो चौका चूल्हा और सेवा आपने जीवन भर की आपकी बहु उस तरह के काम को  किसी नौकर से करा जीवन के और रूपों को निभाती हो कुछ मौज भी करती हो जो हर किसी को करनी भी चाहिए पर आपने कभी नहीं की....फिर भी आपकी असली पहचान आपका काम नहीं आपके काम का निष्काम होना है। आपने जो भी किया जैसा भी किया और जब भी किया हमेशा ही बिना बदले में कुछ चाहे किया। आप सारा जीवन ही निष्काम रहे यही आपको जीवन की पहचान और उपलब्धि है न की ये की आपने क्या किया? आपका बिना किसी चाह और शिकायत के परिश्रम करना ही आपके जीवन का सौंदर्य है और बस यही वो अनमोल बात है जो आपकी बहु को आपसे सीखनी भी चाहिए, न की ये की क्या किया जाए और कैसे किया जाए, क्या कैसे क्यूं का जवाब हर पीड़ी और समय के साथ बदलता ही रहेगा