बचपन में हम सुनते थे की लोमडी कहती थी की अंगूर खट्टे है। अब लगता है की कुछ और भी तो कहती हैं लोमड़िया,कई प्रकार की लोमड़िया हैं जो अलग अलग बाते कहती है ।
एक जंगल में लोमड़ियों का झुण्ड अंगूर तोड़ रहा है। कुछ लोमड़ियो ने उछल उछल कर कई गुच्छे तोड़ लिए है। बहुत सी लोमडियो की छलांग अंगूर तक पहुच नहीं पा रही। ऐसे में पहले तरह की चालक लोमड़ीया जो हमें बचपन में स्कूल की किताबो में मिली थी ,उन्होंने मान लिया हैं की अंगूर खट्टे हैं।दुसरे तरह की ज्यादा चालाक लोमड़ीयो ने तो खुद को मनाना शुरू कर दिया है की उन्हें तो भूख ही नहीं है वो तो बस ऐसे ही साथ देने आ गयी। तीसरे तरह की और भी ज्यादा चालाक लोमड़िया मान रही है की उनसे अंगूर नहीं टूटेंगे तो वो तय्यारी कर रही है दूसरो के अंगूर चुराने की। चौथे तरह की आम लोमड़ियो जिन्हें अपने काम के लिए अपने स्वाभिमान से मतलब नहीं है ,उन्होंने अंगूर के लालच में जो लोमड़िया अंगूर तोड़ पा रही थी उनके आगे पीछे घूमना शुरू कर दिया है वो उन लोमड़ियों के समर्थन में बहादुरी के नारे लगा रही हैं।पांचवे तरह की स्वाभिमानी पर गैर साहसी लोमड़िया मान गयी है की अंगूर उनसे टूटेंगे नहीं इसलिए आज वो झूंड छोड़ अपने हिसाब का छोटा मोटा कुछ खाना पीना ढूँढने जा रही है ,उन्होंने अंगूर की रेस छोड़ दी है। छठे तरह की अभिमानी पर गैर साहसी लोमड़िया भी तो है जो न रेस छोड़ पा रही हैं और अभिमान की वजह से ये भी नहीं मानती की उनसे अंगूर नहीं टूटेंगे फिर साहस भी नहीं कर पाती ऊंची छलांग का,ये सब डिप्रेसन का शिकार हो गयी है,सबसे बुरी हालत इन्ही लोमड़ियों की है। सबसे मजे में हैं वो सातवे तरह की लोमड़िया जो स्वाभिमानी भी है और साहसी भी और समझदार भी ये तय्यारी कर रही हैं ऊंची छलांग की इन्हें उम्मीद नहीं वरन विश्वाश है की किसी छलांग में तो अंगूर उनकी बाजुओं में भी आ ही जायेंगे।
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