Thursday, January 1, 2015

सास बहु और त्रासदी

सास बहु और त्रासदी।
पिछले दो दशको में भारतीय मध्यम वर्ग मे आयी महिलाओ  की आजादी से सबसे कठिन विडंबना और परीक्षा उन माताओं के साथ खड़ी हुई है जो इस दशक में सास बन रही हैं।
भारतीय समाज में हमेशा  से ही सास बहु का रिश्ता एक जैसा ही रहा है, सास भी घर में ही शोषित रहती थी और बहु भी,पुरानी बहु जब सास बनती थी तो उसकी नयी बहु भी घर में शोषित होने की व्यवश्था में ही जीती थी। तो किसी सास के मन में गहरे सवाल उठने की संभावना ही न थी। क्यूंकि जो उसके साथ हुआ वही महिलाओं  का धर्म बना दिया गया। सबने मान लिया था की पति परमेश्वर है और पति के घर के भीतर ही सारी जिन्दगी पति के परिवार की सेवा करना महिलाओं का धर्म है।
पर इस दशक में पहली बार बहु कुछ आज़ाद है वो वैसा गुलामी का जीवन जीने को राजी नहीं जैसा उसकी सास ने अपनी सास से सीखा और जिया।
आज की सास के साथ ये बडी त्रासदी है ,उनकी बहु की आजादी उनके सामने बहुत गहरे सवाल खड़े कर देती है। उनके पास दो ही विकल्प है या तो वो ये मान लें की जिस तरह उन्होंने अपने पति और उसके माँ बाप की सेवा,घर की साफ़ सफाई ,किचन और बच्चो पालने में ही सारा जीवन गुज़ार दिया और अपनी बहु की तरह न किसी काम से इंकार किया और न इतने सुख,आराम और आजादी ही  मिली जो बहू को मिल रही हैं, ऐसा जीवन जीकर उन्होंने अपना सारा जीवन ही व्यर्थ गवां दिया ...पर ये उनका मन और अहम् दोनों ही नहीं मानने देंगे।
दूसरा विकल्प ये मानने का है की बहु का जीने का तरीका ही गलत है उसे उनसे कुछ सीखना चाहिए उनकी भी कुछ सुनना चाहिए। पर ये उन्हें कोई कहने ही नहीं देगा।फिर इसे मानना  असम्भव ही है और गलत भी है। ऐसे में इस दशक की सास के पास भीतर ही भीतर घुटने की त्रासदी ही बचती है।
इस त्रासदी से बचना है तो उन्हें ये समझना होगा की जीवन में आपने जो कुछ भी किया ,मुल्य उसका नहीं हैं, हो सकता है की जो चौका चूल्हा और सेवा आपने जीवन भर की आपकी बहु उस तरह के काम को  किसी नौकर से करा जीवन के और रूपों को निभाती हो कुछ मौज भी करती हो जो हर किसी को करनी भी चाहिए पर आपने कभी नहीं की....फिर भी आपकी असली पहचान आपका काम नहीं आपके काम का निष्काम होना है। आपने जो भी किया जैसा भी किया और जब भी किया हमेशा ही बिना बदले में कुछ चाहे किया। आप सारा जीवन ही निष्काम रहे यही आपको जीवन की पहचान और उपलब्धि है न की ये की आपने क्या किया? आपका बिना किसी चाह और शिकायत के परिश्रम करना ही आपके जीवन का सौंदर्य है और बस यही वो अनमोल बात है जो आपकी बहु को आपसे सीखनी भी चाहिए, न की ये की क्या किया जाए और कैसे किया जाए, क्या कैसे क्यूं का जवाब हर पीड़ी और समय के साथ बदलता ही रहेगा

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