एक माँ ,एक एक्सीडेंट और “रेफेर प्रणाली “
२९ मार्च -
एक पैर मैं तीन फ्रैक्चर और शरीर पर अनगिने घाव लिए सारी रात वो १० साल का बच्चा अपनी चाची से घर जाने की जिद्द कर रहा था | .
एक रात पहले अपने घर के मुखिया को खो चुके और कई गहरे घावों के साथ अपने-अपने ओपरेशन का इंतज़ार कर रहे दो बेटो और एक “माँ” के लिए सुबह की चाय का कोई महत्व नहीं फिर भी मुझे वहां चाय लेकर ही जाना था , अपने उन दूर के रिश्तेदारों के लिए मैं एक ऐसे अजनबी जैसा ही रहा हूँगा जो की चाय और कुछ फल लाया है और शायद ये खबर भी की उन दो बच्चो के पिता का क्या हाल है जो की असल में उस रात उनका साथ छोड़कर किसी दूसरे संसार में चले गए थे |
डा असलम के अस्पताल के उस कमरे के तीन बिस्तरों में सबसे पहले वाले बिस्तर लेटी उस “माँ” ने मेरे पिता जी को देखते ही अपना चेहरा अपनी सारी के पल्लू से ढक लिया, पता नही कैसे और क्यूं इस त्रासदी में भी वो “पर्दा ‘ को “मर्यादा” समझ कर निभा रही थी | साडी में छिपे चेहरे को देखकर मन में ऐसे सवाल उठ रहे थे की आखिर किस वजह या किस नियम से से ऊपर वाले ने इसी “माँ’ को चुना है इस कठिन परीक्षा के लिए, अपने कमर के फ्रैक्चर के दर्द से ज्यादा अपने बच्चो के पैर के फ्रैक्चर के दर्द को महसूस करना है और फिर रात में उसके परिवार के ऊपर से गुजरे हुए काल के साथ उसके पति के चले जाने की खबर भी तो उसे जल्दी ही सुननी है |
उसके कुछ करीबी रिश्तेदार जिनके ऊपर बच्चो के पालन पोषण की जिम्मेदारी आने वाली थी, उनमे ये बहस चल रही थी की , क्यूं न इस “माँ” को इसके पति के गुजरने की कोई खबर दी ही ना जाये क्यूंकि फिर शायद ये अपने बच्चो को शायद खुद को भी न संभाल पाए ... कह देंगे की इलाज़ चल रहा है किसी दूसरे बड़े शहर में|
कमरे के दूसरे बिस्तर पर लेटे दस साल के बच्चे ने अपनी चाची की गोद में रोने का नहीं थमने वाला सिलसिला चालू रखा था , मेरे पिता जी के कहने पर एक नर्स के कमरे में आते ही “माँ” ने दर्द भरी आवाज में नर्स से लगभग गिडगिडाते हुए कहा की ...
“ अरे डॉक्टर मेरे लल्ला को नीदं की गोली दे दे , सारी रात से सोया नहीं है “
पर नर्स तो दर्द का इंजेक्शन लायी थी जो उस बच्चे की नज़र में उस दर्द से भी बड़ा दर्द था कि जिससे वो गुजर रहा था ,उसकी यही दरखास्त थी जो वो रोते रोते दबे शब्दों में कह रहा था ...
” ना इंजेक्शन ना , गोरी - ना इंजेक्शन ना , गोरी “
पर इस दरखास्त को करुणा के सिवा क्या मिल सकता था ,उस बच्चे को इंजेक्शन मिला मुझे उसके हाथ पकड़ने की जिम्मेदारी |
इंजेक्शन के असर से आने वाली चीखो से बीच के बिस्तर पर सोता उस “माँ” का दूसरा ८ साल का बेटा “पानी – पानी “ करता हुआ जागा| पता चला की रात से ही धरती के भगवन यानि की डॉक्टर साहब ने पानी की मनाही कर रखी है क्यूंकि शाम को निर्धारित ओप्रेशन की सफलता में पानी रुकावट बन सकता है |
अब तक मेरे पिताजी जी जा चुके थे और उस “माँ’ ने अपने चेहरे से दुपट्टा सरकाकर इस उम्मीद से मेरी तरफ देखा कि शायद मैं उसके जिगर के आधे भाग को कुछ पानी पिलाऊँगा | उसके चेहरे पर भावनाओं का सागर था जिसे उसने बहुत हिम्मत से अपने अन्दर समेट कर रखा था ,अगर कोई थोडा भी बहने का रास्ता दे दे तो गंगा –यमुना बह जाएँ | इस समय उसकी किसी भी दरखास्त को अनसुना करने के लिए जरूरी कठोर हिर्दय मेरे पास नहीं था ,लिहाजा मैंने पानी की बोतल के ढक्कन से दो चार बूँद पानी उसके बेटे को पिला ही दिया ,पर उस बच्चे के घाव भरे हांथो से पानी की बोतल को छुड़ाना भी बहुत साहस का काम था |
एक दिन पहले – २८ मार्च
हमारे शहर में राष्ट्रीय राज मार्ग पर एक बाइक पर पति ,पत्नी और दो बच्चो का चलना बहुत ही साधारण बात है ,फिर इस परिवार के मुखिया के पास ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं था ,शहर की व्यवस्था में ये जरूरी भी नहीं की चलाने वाले के पास ड्राइविंग लाइसेंस हो ही , पहले तो कोई पूछेगा नहीं और पूछा तो जेब मैं रूपए तो हैं ही |
बाइक चलाने का कम अनुभव, उधार की बाइक ,और जेब में बिना ड्राइविंग लाइसेंस के एक बाइक पर सवार परिवार के चार लोगों के लिया काल सामने से एक ऐसे बाइक सवार के रूप मैं आया जो होली का त्यौहार शराब के नशे से मनाता हैं |
दुर्घटना हुई तो १०८ यानि सरकारी एम्बुलेंस सेवा को बुलाया गया , सरकार का नियम हैं की सरकारी एम्बुलेंस सिर्फ सरकारी अस्पताल जायेगी ,जहाँ एक्सीडेंट केस की कागज़ी कारवाही पूरी करने पुलिस विभाग के कुछ नुमाइंदे आते हैं |
छोटे और मध्यम दर्जे के शहरों के सरकारी अस्पताल में “रेफेर” पे “रेफेर” मिलता हैं पर आकस्मित इलाज़ नहीं मिलता और इसी तरह इन शहरो से बड़े शहरो के बीच की डगर रोजाना किसी न किसी की साँसों से जंग की गवाह बनती है !
हमारे पास खबर आई की इस परिवार का मुखिया की साँसों ने उसे बड़े शहर पहुचने तक की इजाज़त नहीं दी और गुस्सा आया की किसलिए हैं सरकारी डॉक्टर जिन्होंने न एक्स रे किया, न ब्लड दिया और ना ही कोई विशेष एंटी बायोटिक , रेफेर करने से पहले कोई लाइफ सेविंग एंटी बायोटिक दी जा सकती थी की साँसे आधे घंटे और चलती और शायद वो बड़े शहर के बड़े अस्पताल तक पहुच पाते |
खबर का असर था की बच्चो और “माँ’ को एक प्राइवेट अस्पताल में शिफ्ट किया गया ,जहाँ उनका एक्सीडेंट के १४ घंटे बाद पहला एक्सरे हुआ |
फिर सोचता हूँ की कौन दोषी है तो कई ख्याल आते हैं – जिन्हें अपने क्रमांक अनुसार लिख रहा हूँ
१) सरकार जिसने लाखो की आबादी वाले शहरों के मुख्य अस्पतालों में भी रात में सिर्फ एक डॉक्टर रखा और गंभीर दशा वाले मरीजो के लिए कोई व्यवस्था अस्पताल में नहीं रखी |
२) सरकारी डॉक्टर खुद जो व्यवस्था में इतने ढल गए हैं की किसी मौत से लड़ते मरीज पर भी कोई विशेष ध्यान नहीं देते , और “रेफेर” कर जिम्मेदारी विमुक्त हो जाते हैं |
३) ट्रैफिक पुलिस , जिसके रहते हुए भी चार लोग एक बाइक पर बिना ड्राइविंग लाइसेंस के बेख़ौफ़ चल सकते है ,बस जेब मैं रूपए होने चाहिए |
४) वो व्यवस्था जहाँ हर एक्सीडेंट केस को सिर्फ “रेफेर” होने के लिए सरकारी अस्पताल जाकर कागज़ी कार्यवाही पूरी करनी होती है |
५) कुछ लोगो का होली मानाने का तरीका ,जिनके लिए त्यौहार नशा और हुडदंग है , आखिर बाइक को टक्कर देने वाला इसी नशे में तो था !
६) वो दोस्त जिसने अपने कम अनुभवी दोस्त को राष्ट्रीय राज मार्ग पर चलने के लिए अपनी बाइक दे दी पर उसकी नाराज़गी नहीं सही |
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