सरकारी संस्था में आज भी रोजाना कर्मचारी अपनी आधी से अधिक उर्जा सिर्फ ये समझाने में खर्च कर देते है कि जो काम उन्हें कहा जा रहा है वो असल में उनका नहीं है ! किसी भी नए काम की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के सामान समझा जाता है , क्यूंकि आप एक बार जोश में किसी नए काम को करेंगे और अगली बार आपके ही सभी साथी चिल्ला चिल्ला कर कहेंगे कि ये आपका ही काम है | इस तरह आपके द्वारा कभी संस्था की भलाई या किसी की मदद के लिए किया गया कोई भी नया कार्य आपकी हमेशा की मजदूरी बन सकता है |
मेहनत और ईमानदारी से किये गए काम से न तो पदोन्नति का कोई सम्बन्ध होता है और न ही वेतन में वृद्धि का | “बने रहो पगला ,काम करेगा अगला” की नीति का अनुशरण करने वाले भी वेतन और पदोन्नति के बराबर अधिकारी होते हैं साथ ही उन्हें अपना स्थानान्तरण करवाने में भी कोई बेवजह की कठिनाई नहीं होती |
ये भी मजाक ही है की पूरी लगन और ईमानदारी से संस्था के लिए १० साल से भी ज्यादा तक कार्य करने के बाद पदोन्नति मांगने पर संस्था आपसे एक ऐसी परीक्षा पास करने को कहती है की जिसका आपके द्वारा संस्था के लिए १० साल तक किये गए कार्य से कोई सम्बन्ध नहीं होता, वो परीक्षा काम न करने वाले व्यक्ति के लिए अधिक सुगम हो जाती है क्यूंकि वह अपना सारा मस्तिष्क और समय सिर्फ उस परीक्षा की तय्यारी में ही लागाता है |
अधिकतर मैनेजर शभ्य और शालीन होते है, कुछ मैनेजर मेहनती भी होते है पर लगभग सभी सरकारी मैनेजरों के पास इतनी ही संभावनाएं होती हैं कि वो सिर्फ उन्ही कर्मचारिओं से ही काम ले सकते है कि जो अपने आप से ही काम करते हों | काम करने का इनाम सिर्फ “काम” और काम न करने की सजा सिर्फ “आराम” मिलती हैं |
कर्मचारी खुद से सोचे तो सोच ले पर संस्था कभी नहीं सोचती की कर्मचारी द्वारा लिए गए वेतन और उसके द्वारा किये गए कार्य की कोई तुलना भी है या नहीं, मसलन इंजीनियर का वेतन लेने वाले बहुत से कर्मचारी सिर्फ माइक्रोसॉफ्ट वर्ल्ड ,माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल पर पत्र और रिपोर्ट्स टाइप करने का कार्य ही करते है जो की आजकल के १२वीं दर्जे के छात्र भी आसानी से कर सकते हैं | मजाक यह भी है की माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस को यहाँ ऐसा टेक्निकल कार्य समझा जाता है की जिसके लिए एक इंजिनियर की आवश्यकता होगी ही |
समय पर आना नियम तो हो गया है और जरूरी भी पर ऐसे लोगो की कमी नहीं है की जो मानते है की सिर्फ समय पर आने और समय पर जाने मात्र से ही वो नैतिक रूप से अपना पूरा वेतन पाने के अधिकारी हो जाते हैं! ये बहुत आम बात है की ठीक सुबह १०:१५ पर ही लोग सारे काम छोड़ कर लोग ये चर्चा करते पाए जाते हैं की हमारी संस्था फायदे में कैसे आये | कुल मिला कर ज्यादातर कर्मचारी दो तरह के कार्य ही करते हैं एक वो जो सिर्फ सुबह ऑफिस आकर शाम को समय से चले जाने का कार्य करते हैं और दुसरे वो जो ईटें उठाकर रखने जैसा कार्य करते है , कुछ इनोवेटिव, प्रोडक्टिव, फ्रूटफुल कार्य करने वाले कर्मचारी न के बराबर होते है |
गम ये है कि बहुत उच्च पदों पर बैठे लोग कभी जान ही नहीं पाते की क्या सही है और क्या गलत क्यूंकि उन्होंने अपने आस पास रहने वालो को अपनी बात काटने की कोई इज़ाज़त नहीं दी होती ,चाटुकारिता में ही सारा जीवन जीने वाले उनके नीचे कार्यरत व्यक्ति हमेशा उनके हर कथन से सहमती ही जताते हैं , “न खाता न बही जो साहब कहें वही सही” |
अलग अलग दर्जे की अलग अलग यूनियन भी होती हैं | जिनका मूल उद्धेश्य होता हे की किस तरह हमें कम से कम काम करना पड़े और साहब हमारी किसी भी गलती पर हम से कुछ न कह सकें तथा किस तरह हम अधिक से अधिक धन और आराम संस्था से ले सके | संस्था की भलाई के लिए किसी भी यूनियन द्वारा किया गया कोई भी संघर्ष देखने का अवसर मुझे प्राप्त नहीं हुआ क्यूकी “यूनियन तो बनती ही संस्था के खिलाफ है” |
फिर भी हर संस्था में हर दर्जे पर कुछ प्रतिशत ऐसे लोग होते ही हैं , जो सिर्फ काम करने के लिये काम करते हैं ! कर्म जिनके लिए आनंद है और हमेशा निश्वार्थ है , ऐसे व्यक्तियों के की वजह से ही संश्था में गति बनी रहती है |
Very rightly said....
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